
जब कोई पदार्थ अकेले ही या किसी अन्य पदार्थ के साथ क्रिया करके एक या अधिक भीड़ गुण वाले ने पदार्थों का निर्माण करता है तो वह क्रिया रासायनिक अभिक्रिया कहलाती हैI
रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेने वाले पदार्थों के संकेतों एवं चित्रों की सहायता से रासायनिक अभिक्रिया का निरूपण , रासायनिक समीकरण कहलाता है।
जिस रासायनिक अभिक्रिया में प्रतिफल के साथ-साथ ऊष्मा- उर्जा भी निकलती है, उसे ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया कहते है।
अम्ल - ACID
ACID शब्द लैटिन भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है खट्टा
हमले स्वाद में खट्टे होते हैं
यह नीले लिटमस को लाल में बदल देते हैं
यह जलीय विलियन में H+ आयन देते हैं
अम्ल के उदाहरण
HCl, H2 SO4, HNO3, CH3COOH आदि
सान्द्र अम्ल - जिससे हम अधिक मात्रा में और जल अल्प मात्रा में होता है तो उसे सांद्र अम्ल कहा जाता है
तनु अम्ल- जिसमें अम्ल अल्प मात्रा में और जल अधिक मात्रा में होता है तो उसे तनु अम्ल कहा जाता है
क्षारक - BASE
यह स्वाद में कड़वे होते हैं
यह लाल लिटमस को नीला में बदल देते हैं
यह जलीय विलियन में OH- आयन देते है
क्षारक के उदाहरण,
NaOH, KOH, Ca (OH)2
क्षार - जल में घुलनशील क्षारक को क्षार कहां जाता है जैसे - NaOH, KOH आदि
लवन - लवण, अम्ल व क्षारक की परस्पर अभिक्रिया से प्राप्त होता है
धातु एवं अधातु
पृथ्वी पर पाये जाने वाले सभी पदार्थ तत्वों के बने होते हैं। अभी तक लगभग 112-15 तत्व ज्ञात हैं जो पृथ्वी पर लगभग सभी पदार्थो को बनाते हैं इनमें लगभग 80 तत्व धातु हैं तथा बाकि अधातु या उपधातु है।
धातु
सामान्यतः धातु विधतु एवं उष्मा के सुचालक, आघातवर्धनिय एवं तन्य होते हैं। तथा कमरे के ताप पर ठोस अवस्था में होते है। केवल पारा ही एक मात्र ऐसा धातु है जो कमरे के ताप पर द्रव अवस्था में होता है।
रासायन शास्त्र के अनुसार धातु वे तत्व है जो सरलता से इलेक्ट्रान त्याग कर धनायन बनाते है। और धातुओं के परमाणुओं के साथ धात्विक बंध बनाते है।
सामान्यतः धातु रासायनिक रूप से सक्रिय होते हैं। अर्थात वे मुक्त रूप में नहीं मिलते वे अन्य तत्वों के साथ क्रिया कर लेते हैं और संयुक्त रूप में (यौगिक) पाये जाते हैं। जिन्हें खनिज कहते हैं। कुछ धातु मूल रूप या धात्विक रूप में पाये जाते हैं। जैसे - सोना, चांदी प्लेटिनम आदि। कभी-कभी शु़़़द्ध धातु ढेर के रूप में पायी जाती है जिन्हें नगेट कहते हैं।
प्राकृतिक पदार्थ जिनमें धातु पृथ्वी में पायी जाती है खनिज कहलाते हैं। खनिज जिनसे आर्थिक महत्व के धातु आसानी से अलग किये जा सकते हैं। उन्हें अयस्क कहते हैं।
अधातु
सामान्यः अधातुएं विधुत व उष्मा की कुचालक, अतन्य होती हैं। ये धातुओं कि तरह कठोर न हो कर भंगुर होती हैं। सामान्यः आधातवध्र्य नहीं होती। तथा इनका गलनांक धातुओं से अपेक्षाकृत कम होता है।
कार्बन और इसके यौगिक
यह रसायन विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत कार्बन यौगिकों का अध्ययन किया जाता है। कार्बनिक यौगिकों के बिना की संभावना नहीं है। जंतुओं और वनस्पतियों के निर्माण में कार्बनिक यौगिक ही प्रमुख हैं। कार्बनिक यौगिकों के कुछ अति प्रमुख उपयोग निम्न हैं:
हमारा भोजन: सभी भोज्य पदार्थ प्राय: कार्बनिक यौगिकों से निर्मित हैं जैसे-चावल, आटा, चीनी, प्रोटीन, विटामिन आदि सभी कार्बनिक पदार्थ हैं।
हमारे दैनिक उपयोग के पदार्थ: हमारे सूती कपड़े सेलुलोज के बने हैं। नायलोन, टेरीलीन, रेयॉन आदि के कपड़े सांश्लेषिक कार्बनिक यौगिकों से निर्मित हैं। पेन, स्याही, जूते आदि कार्बनिक यौगिक ही से बने हैं। साबुन, बेसलीन, क्रीम लकड़ी, कोयला, घरेलू गैस, मिट्टी का तेल आदि कार्बनिक यौगिक ही हैं।
औषधियाँ: निषचेतक पदार्थ क्लोरोफार्म, स्ट्रेप्टोमाइसिन, ऐस्पिरिन, पेनसिलिन आदि कार्बनिक यौगिक ही हैं। कीटाणुनाशक जैसे-डी.डी.टी., गेमेक्सीन, बी. एच.सी. आदि कार्बनिक यौगिक हैं।
यातायात: पेट्रोल, तेल, रबर, टायर आदि कार्बनिक पदार्थ हैं।
प्रसाधन तथा विलास सामग्री: क्रीम, पेन्ट, साबुन, तेल, फोटो फिल्म तथा प्लास्टिक के खिलौने आदि कार्बनिक यौगिक हैं।
विस्फोटक पदार्थ: डायनामाइट, नाइट्रोग्लिसरीन, टी. एन. टी. आदि कार्बनिक यौगिक हैं।
तत्वों के आवर्त वर्गीकरण
आवर्ती वर्गीकरण (Periodic Classification): किसी मौलिक गुण को आधार बनाकर की गई पदार्थों की ऐसी व्यवस्था जिसमें निश्चित अंतराल के बाद समान गुण वाले पदार्थ पुनः उपस्थित हों, आवर्ती व्यवस्था या आवर्ती वर्गीकरण कहलाती है। तत्वों के वर्गीकरण का मुख्य उद्देश्य समान गुणों वाले तत्वों को एक वर्ग में रखकर रसायनशास्त्र के अध्ययन को सरल, सुविधाजनक, सुस्पष्ट एवं क्रमबद्ध बनाना है।
तत्वों के वर्गीकरण का इतिहास: 19वीं शताब्दी में तत्वों के वर्गीकरण के कई प्रयास किये गए जिनमें प्राउट की परिकल्पना, डोबरेनर का त्रिक सिद्धांत, डूमा की सममूलक श्रेणी, न्यूलैण्डस का अष्टक नियम, लोथर-मेयर का परमाणु आयतन तथा परमाणु भार वक्र, मेडलीफ का आवर्त नियम आदि प्रमुख हैं। तत्वों के वर्गीकरण के इन प्रारम्भिक प्रयासों में तत्वों के परमाणु भार (Atomic weight) को वर्गीकरण का आधार बनाया गया।
लेकिन डोबरेनर का त्रिक सिद्धांत कुछ ही तत्वों तक सीमित रहने के कारण विश्वव्यापी मान्यता प्राप्त नहीं कर सका। अतः कुछ समय पश्चात् तत्वों के वर्गीकरण की यह पद्धति त्याग दी गई। डूमा के विचार को भी व्यापक मान्यता नहीं मिल सकी और अंततः इसे भी त्याग दिया गया। न्यूलैंड्स द्वारा किए गए तत्वों के वर्गीकरण की पद्धति में अनेक त्रुटियाँ सामने आई जिस कारण यह नियम अधिक प्रचलित नहीं हो सका और आगे चलकर इसे त्याग दिया गया।
प्राकृतिक संसाधन
भौतिक जगत के समस्त प्राणियों की उत्पत्ति एवं सृजन पंच महाभूतों यथाक्षिति, जल, पावक, गगन, समीर से हुई है। इन पंच महाभूतों को ही ‘‘भगवान‘‘ की संज्ञा भी दी जा सकती है, क्योंकि भगवान शब्द चार व्यंजन एवं एक स्वर के योग से बना है। यथा भ-भूमि, ग-गगन, व-वायु, अ-अग्नि एवं न-नीर। इन पंचतत्वों में जीवन के मुख्य आधार भूमि, जल एवं वनस्पति को प्रमुखता देते हुये मनीषियों ने इसे प्रथम तीन स्थानों पर रखा है जो क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से जितना समृद्ध होगा वह उतना ही विकसित होगा।
मुख्य रूप से पाँच प्राकृतिक संसाधन है, 1-जमीन, 2-जल, 3-जंगल, 4-जानवर, 5-जन।
1- जमीन-
मनुष्य मिट्टी से ही पैदा हुआ है और मिट्टी में ही मिल जायेगा। कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल 242 लाख हेक्टेयर समस्याग्रस्त 120 लाख हेक्टेयर। विभिन्न क्षेत्रों (पर्वतीय, मैदानी, बीहड़) में 05 टन से 70 टन प्रति हे0 प्रति वर्ष की दर से मृदा कटाव होता है।
2- जल -
‘‘ जल ही जीवन है ‘‘ उपलब्ध जल का 90 प्रतिशत सिंचाई में 4 प्रतिशत उद्योग में 3 प्रतिशत पीने के लिये उपयोग होता है। वर्षा जल का 90 प्रतिशत पानी भूमि जल संरक्षण के अभाव में बेकार चला जाता है। जल वृद्धि स्तर लगातार घट रहा है।
3- जंगल -
वर्षा जल में वन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान होता है प्रदेश में वन आच्छादित क्षेत्रफल 33 प्रतिशत के स्थान पर मात्र 10 प्रतिशत है।
4 -जानवर
प्रदेश में कुल पशुधन लगभग 07 करोड़ हैं जिसमें ज्यादातर अनुत्पादक है। रोजगार एवं टिकाऊ खेती हेतु मिश्रित खेती/ कार्बनिक खेती को प्राथमिककता देनी होगी।
5-जन -
प्रदेश की जनसंख्या लगभग 17 करोड़ है, जो संसाधनों के मुकाबले बहुत अधिक है। प्रदेश की जनसंख्या एक सम्पत्ति है न कि विपत्ति। इसलिये जनसंख्या नियोजन किये जाने की आवश्यकता है और अधिक उत्पादन अधिकतम हाथों में होना चाहिये।
परावर्तन का नियम-
प्रकाश वस्तुओं को दृश्य बनाता है | सूर्य का प्रकाश दिन के समय वस्तुओं के देखने में मदद करता है |
हम किसी वस्तु को कैसे देख पाते है ?
वस्तु पर पड़ने वाले प्रकाश को वस्तु परावर्तित कर देती है, यह परावर्तित किरण जब हमारी आँखों के द्वारा ग्रहण किया जाता है तो यह परावर्तन वस्तु को आँखों के द्वारा देखने योग्य बनाता है |
प्रकाश की किरण : जब प्रकाश अपने प्रकाश के स्रोत से गमन करता है तो यह सीधी एवं एक सरल रेखा होता है | प्रकाश के स्रोत से चलने वाले इस रेखा को प्रकाश की किरण कहते है |
छाया: जब प्रकाश किसी अपारदर्शी वस्तु से होकर गुजरता है तो यह प्रकाश की किरण को परावर्तित कर देता है जिससे उस अपारदर्शी वस्तु की छाया बनती है |
प्रकाश का विवर्तन : यदि प्रकाश के रास्ते में राखी अपारदर्शी वस्तु अत्यंत सूक्ष्म हो तो प्रकाश सरल रेखा में चलने की अपेक्षा इसके किनारों पर मुड़ने की प्रवृति दिखता है - इस प्रभाव को प्रकाश का विवर्तन कहते है |
प्रकाश का अपवर्तन-
प्रकाश का अपवर्तन : जब प्रकाश की किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाती हैं तो यह अपने मार्ग से विचलीत हो जाती हैं। प्रकाश के किरण को अपने मार्ग से विचलीत हो जाना प्रकाश का अपवर्तन कहलाता हैं ।
प्रकाश का अपवर्तन सिर्फ पारदर्शी पदार्थों से ही होता है |
जैसे शीशा, वायु, जल आदि |
प्रकाश के अपवर्तन का कारण : अपवर्तन प्रकाश के एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे में प्रवेश करने पर प्रकाश की चाल में परिवर्तन के कारण होता है।
प्रकाश का अपवर्तन का नियम:
प्रकाश का अपवर्तन के नियम दो हैं |
1. आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा आपतन बिन्दु पर अभिलंब तीनों एक ही तल में होते हैं ।
2. जब प्रकाश की किरण किन्हीं दो माध्यमों के सीमा तल पर तिरछी आपतित होती हैं तो आपतन कोण (i) की ज्या (sine) तथा अपवर्तन कोण की ज्या (sine) का अनुपात एक नियतांक होता हैं ।
मानव नेत्र का गोलक (Eye-ball) यह लगभग गोलाकार पिण्ड है, जो सामने के भाग को छोड़कर चारों ओर से दृढ़ अपारदर्शी परत से ढका होता है। इसके प्रमुख अवयव निम्नलिखित हैं –
1. दृढ़-पटल तथा रक्तक-पटल (Sclerotic and Choroid) नेत्र-गोलक की बाहरी अपारदर्शी कठोर परत को दृढ़-पटल कहते हैं। यह श्वेत होता है। दृढ़-पटल नेत्र के भीतरी भागों की सुरक्षा करता है। इसके भीतरी पृष्ठ से लगी काले रंग की झिल्ली होती है, जिसे रक्तक-पटल कहते हैं।
2. कॉर्निया (Cornea) नेत्र-गोलक के सामने का भाग कुछ उभरा हुआ तथा पारदर्शी होता है। इसे कॉर्निया कहते हैं। प्रकाश इसी भाग से नेत्र में प्रवेश करता है।
3. आइरिस (Iris) कॉर्निया के पीछे की ओर रंगीन (काली, भूरी अथवा नीली) अपारदर्शी झिल्ली का एक पर्दा होता है; जिसे आइरिस कहते हैं। इसके बीच में एक छिद्र होता है, जिसे पुतली (pupil) कहते हैं। आइरिस का कार्य नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा को नियन्त्रित करना है। अधिक प्रकाश में यह संकुचित होकर पुतली को छोटा कर देती है तथा कम प्रकाश में पुतली को फैला देती है जिससे नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा बढ़ जाती है। नेत्र में यह क्रिया स्वत: होती है।
4. नेत्र-लेंस (Eye-lens) पुतली के पीछे पारदर्शी ऊतकों (tissues) का बना द्वि-उत्तल लेंस होता है, जिसके द्वारा बाहरी वस्तुओं का उल्टा, छोटा तथा वास्तविक प्रतिबिम्ब लेंस के पीछे दृश्य-पटल (retina) पर बनता है। लेंस, मांसपेशियों की एक विशेष प्रणाली, जिसे सिलियरी प्रणाली (ciliary system) कहते हैं, द्वारा टिका रहता है। ये पेशियाँ लेंस पर उपयुक्त दाब डालकर उसके पृष्ठों की वक्रता को बढ़ा-घटा सकती हैं, जिससे लेंस की फोकस दूरी कम या अधिक हो जाती है। इन पेशियों द्वारा लेंस पर ठीक उतना दाब पड़ता है कि बाहरी वस्तु का प्रतिबिम्ब दृश्य-पटल पर स्पष्ट बने।
5. दृष्टि-पटल (Retina) नेत्र-गोलक के भीतर पीछे की ओर रक्तक-पटल के ऊपर पारदर्शी झिल्ली दृष्टि-पटल (रेटिना) होती है। इस परदे पर विशेष प्रकार की तन्त्रिकाओं (nerves) के सिरे होते हैं, जिन पर प्रकाश पड़ने से संवेदन उत्पन्न होते हैं। यह संवेदन तन्त्रिकाओं के एक समूह, जिसे दृष्टि-तन्त्रिका (optic nerve) कहते हैं, के द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचते हैं।
6. जलीय द्रव तथा कांचाभ द्रव (Aqueous Humor and Vitreous Humor) कॉर्निया तथा नेत्र-लेंस के बीच के स्थान में जल के समान द्रव भरा होता है, जो अत्यन्त पारदर्शी तथा 1.336 अपवर्तनांक का होता है। इसे जलीय द्रव कहते हैं। इसी प्रकार लेंस के पीछे दृश्य-पटल तक का स्थान एक गाढ़े, पारदर्शी एवं उच्च अपवर्तनांक के द्रव से भरा होता है। इसे कांचाभ द्रव कहते हैं। ये दोनों द्रव प्रकाश के अपवर्तन में लेंस की सहायता करते हैं।
7. पीत बिन्दु (Yellow Spot) दृष्टि-पटल के मध्य में पीला भाग होता है; जिस पर बना प्रतिबिम्ब बहुत ही स्पष्ट होता है।
8. अन्ध बिन्दु (Blind Spot) दृष्टि-पटल के जिस स्थान को छेदकर दृष्टि तन्त्रिकाएँ मस्तिष्क को जाती हैं; उस स्थान पर पड़ने वाले प्रकाश का दृष्टि-पटल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस स्थान को अन्ध बिन्दु कहते हैं।
मानव नेत्र से प्रतिबिम्ब बनना नेत्र के सामने रखी किसी वस्तु से चली प्रकाश की किरणें कॉर्निया पर गिरती हैं तथा अपवर्तित होकर नेत्र में प्रवेश करती हैं। फिर ये क्रमशः जलीय द्रव, लेंस व कांचाभ द्रव में से होती हुई रेटिना पर गिरती हैं; जहाँ वस्तु का उल्टा प्रतिबिम्ब बनता है। प्रतिबिम्ब बनने का सन्देश दुक तन्त्रिकाओं द्वारा मस्तिष्क में पहुँचता है; जिससे यह प्रतिबिम्ब अनुभव के आधार पर सीधा दिखायी देता है।
विद्युत धारा
आवेश प्रवाह की दर को विधुत धारा कहते है।
I = Q/t Q = आवेश
मात्रक - एम्पियर
यदि इलेक्ट्राॅन पर आवेश e है तथा t समय में n इलेक्ट्रान किसी बिन्दु से गुजरते हैं तो t समय में उस बिन्दु से गुजरने वाला कुल आवेश
Q = ne e = 1.6*10-19
यानि यदि किसी बिन्दु से 1 सेकण्ड में गुजरने वाले आवेश का मान एक कुलाम हो तो विधुत धारा 1 एम्पियर होगी।
आवेश का मात्रक - कुलाम
विधुत परिपथ में विधुत धारा मापने के लिए ऐमीटर का प्रयोग किया जाता है।
विद्युत-धारा का चुंबकीय परभाव:
विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव उन प्रमुख सिद्धांतों में से एक है जो विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों में बुनियादी सिद्धांत के रूप में कार्य करता है। विद्युत धारावाही सुचालक (Current Carrying Conductor) के चारों तरफ के चुंबकीय क्षेत्र को चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के उपयोग द्वारा दर्शाया जा सकता है, जो उसके चारों ओर संकेंद्रित वृत्त (Concentric Circles) के रूप में होते हैं। विद्युत धारावाही सुचालक के माध्यम से एक चुंबकीय क्षेत्र की दिशा विद्युत प्रवाह की दिशा द्वारा निर्धारित होता है।
फ्लेमिंग का दक्षिणहस्त नियम
‘दक्षिणहस्त नियम’ (The Right Hand Thumb Rule) जिसे ‘मैक्सवेल का कॉर्कस्क्रू रूल’ (Maxwell’s Corkscrew Rule) भी कहते हैं, का प्रयोग प्रत्यक्ष सुचालक (Straight Conductor) के माध्यम से विद्युत धारा प्रवाह की दिशा के संबंध में चुंबकीय क्षेत्र की दिशा निर्धारित करने के लिए किया जाता है। जैसे ही विद्युत धारा की दिशा बदलती है, चुंबकीय क्षेत्र की दिशा भी उलट जाती है। लंबवत निलंबित विद्युत धारावाही सुचालक (Vertically Suspended Current Carrying Conductor) में विद्युत धारा की दिशा अगर दक्षिण से उत्तर है, तो उसका चुंबकीय क्षेत्र वामावर्त दिशा में होगा। अगर विद्युत धारा का प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर है, तो चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दक्षिणावर्त होगी। अगर विद्युत धारा सुचालक को अंगूठे को सीधा रखते हुए दाएँ हाथ से पकड़ा जाए और अगर विद्युत धारा की दिशा अंगूठे की दिशा में हो, तो अन्य उँगलियों को मुड़ने की दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा बताएगी। चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण कुंडली (Coil) के घुमावों की संख्या के समानुपातिक होता है। अगर कुंडली में ‘n’ घुमाव हैं, तो कुंडल के एकल मोड की स्थिति में चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण चुंबकीय क्षेत्र का 'n’ गुना होगा।
अगर सुचालक गोलाकार लूप में है तो लूप चुंबक की तरह व्यवहार करता है। विद्युत धारावाही गोलाकार सुचालक में, केंद्रीय क्षेत्र के मुकाबले सुचालक की परिधि के पास चुंबकीय क्षेत्र अधिक मजबूत होता
जैसा कि मैरी एम्पीयर ने सुझाव दिया है, विद्युत धारावाही सुचालक के आसपास जब चुंबक रखा जाता है तो वह बल को अपनी तरफ खींचता है। इसी तरह चुंबक भी विद्युत धारावाही सुचालक पर समान और विपरीत बल लगाता है। विद्युत धारा के प्रवाह की दिशा में परिवर्तन के साथ सुचालक पर लगने वाले बल की दिशा बदल जाती है। यह देखा गया है कि जब विद्युत धारा की दिशा चुंबकीय क्षेत्र से समकोण पर हो तो बल का परिमाण सबसे अधिक होता है। अगर विद्युत धारा विद्युत सर्किट में दक्षिण से उत्तर दिशा में प्रवाहित हो रही हो और सुचालक तार पर चुंबकीय कंपास रखा जाए, तो कंपास की सूई पश्चिम दिशा में विक्षेपित होगी। यह ‘स्नो नियम’ (SNOW Rule) के नाम से जाना जाता है जो चुंबकीय क्षेत्र की दिशा की भविष्यवाणी करने में मदद करता है।
फ्लेमिंग का वामहस्त नियम
फ्लेमिंग के ‘वामहस्त नियम’ के अनुसार यदि बायें हाथ की प्रथम तीन उँगलियों को एक–दूसरे के लम्बवत फैलाया जाए तो तर्जनी उँगली चुंबकीय क्षेत्र की दिशा बताती है। मध्यमा उँगली विद्युत धारा की दिशा बताती है। अँगूठा बाहरी चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही सुचालक पर लगने वाले बल की दिशा बताता है।
ऊर्जा का परंपरागत स्रोत:-
जीवाश्म ईंधन
प्राचीन समय में, लकड़ी गर्मी ऊर्जा का सबसे सामान्य स्रोत था. पानी बहने की ऊर्जा और पवन भी सीमित गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया गया था. आप इन का उपयोग करता है की कुछ के बारे में सोच सकते हैं? ऊर्जा के एक स्रोत के रूप में कोयले का शोषण औद्योगिक क्रांति को संभव बनाया. बढ़ाने औद्योगीकरण दुनिया भर में एक जीवन की बेहतर गुणवत्ता के लिए नेतृत्व किया गया है. यह भी एक जबरदस्त दर से बढ़ने की ऊर्जा के लिए वैश्विक मांग के कारण होता है. पेट्रोलियम और कोयला - ऊर्जा के लिए बढ़ती हुई मांग को काफी हद तक जीवाश्म ईंधन से मुलाकात की थी. हमारे प्रौद्योगिकियों को भी इन ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करने के लिए विकसित किए गए. लेकिन इन ईंधन के लाखों साल पहले गठन किया गया और वहाँ केवल सीमित भंडार हैं. जीवाश्म ईंधन, ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत हैं, तो हम उन्हें संरक्षण की जरूरत है. यदि हम इस तरह के खतरनाक दरों में इन स्रोतों उपभोक्ता जारी थे, तो हम जल्द ही ऊर्जा के बाहर चला जाएगा! आदेश में इस से बचने के लिए, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का पता लगाया गया. लेकिन हम हमारी ऊर्जा आवश्यकताओं के अधिकांश के लिए जीवाश्म ईंधन (1 छवि) पर काफी हद तक निर्भर होना जारी है.
पवन ऊर्जा
पवन ऊर्जा अक्षय ऊर्जा के एक स्रोत पर्यावरण के अनुकूल और कुशल है. यह बिजली के उत्पादन के लिए कोई आवर्ती व्यय की आवश्यकता है. लेकिन वहाँ दोहन पवन ऊर्जा के क्षेत्र में कई सीमाएं हैं. सबसे पहले, पवन ऊर्जा खेतों उन स्थानों पर जहां एक वर्ष के अधिक से अधिक भाग के लिए हवा चल रही है पर केवल स्थापित कर सकते हैं. हवा की गति 15 किमी / घंटे टरबाइन की गति को बनाए रखने की आवश्यकता से अधिक होना चाहिए. इसके अलावा, वहाँ कुछ वापस अप (भंडारण कोशिकाओं की तरह) की सुविधा के लिए ऊर्जा जरूरतों का ध्यान अवधि के दौरान जब वहाँ कोई हवा नहीं है होना चाहिए. पवन ऊर्जा फार्मों की स्थापना देश के बड़े क्षेत्र की आवश्यकता है. 1 मेगावाट जनरेटर के लिए कृषि भूमि के बारे में 2 हेक्टेयर की जरूरत है. खेत की स्थापना की प्रारंभिक लागत काफी अधिक है. इसके अलावा, के बाद से टावर और ब्लेड जैसे बारिश, सूर्य, तूफान, चक्रवात और प्रकृति की अनियमितता को उजागर कर रहे हैं, वे रखरखाव के एक उच्च स्तर की जरूरत है.
सौर ऊर्जा
सूर्य लगभग 5 अरब वर्ष के लिए वर्तमान दर पर किया गया है ऊर्जा का एक विशाल राशि में radiating और कि दर में radiating के बारे में 5 अरब अधिक वर्षों के लिए जारी रहेगा. सौर ऊर्जा के केवल एक छोटा सा हिस्सा पृथ्वी के वायुमंडल की बाहरी परत तक पहुँचता है. इसे का लगभग आधा जबकि वातावरण के माध्यम से गुजर अवशोषित हो जाती है और बाकी पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है.
जैव प्रक्रम क्या है?
कोशिकाएँ (Cell) जीवन का आधार है। सभी जीव कोशिकाओं (Cell) से बनी हैं। कई कोशिकाएँ (Cell) मिलकर उतक (Tissue) बनाती हैं। कई उतक (Tissue) मिलकर अंगों (Organs) का निर्माण करते हैं। प्रत्येक अंग जीवों के लिये विशेष कार्य करते हैं। जैसे दाँत का एक कार्य भोजन को चबाना है, आँख का कार्य देखना है, आदि। कुल मिलाकर जीव का शरीर एक सुव्यवस्थित तथा सुगठित संरचना है जो निरंतर गति में रहकर कार्य करती हैं एवं एक जीव को जीवित रखती हैं।
समय, वातावरण या पर्यावरण के प्रभाव के कारण यह संरचना विघटित होती रहती है जिसके मरम्मत तथा अनुरक्षण की आवश्यकता होती है। जीवों में कई प्रक्रम होते हैं जो शारीरिक संरचना का अनुरक्षण करते हैं।
जैव प्रक्रम क्या है?
कोशिकाएँ (Cell) जीवन का आधार है। सभी जीव कोशिकाओं (Cell) से बनी हैं। कई कोशिकाएँ (Cell) मिलकर उतक (Tissue) बनाती हैं। कई उतक (Tissue) मिलकर अंगों (Organs) का निर्माण करते हैं। प्रत्येक अंग जीवों के लिये विशेष कार्य करते हैं। जैसे दाँत का एक कार्य भोजन को चबाना है, आँख का कार्य देखना है, आदि। कुल मिलाकर जीव का शरीर एक सुव्यवस्थित तथा सुगठित संरचना है जो निरंतर गति में रहकर कार्य करती हैं एवं एक जीव को जीवित रखती हैं।
समय, वातावरण या पर्यावरण के प्रभाव के कारण यह संरचना विघटित होती रहती है जिसके मरम्मत तथा अनुरक्षण की आवश्यकता होती है। जीवों में कई प्रक्रम होते हैं जो शारीरिक संरचना का अनुरक्षण करते हैं।
श्वसन तंत्र :
श्वसन तंत्र मानों एक उल्टा पेड़ है। इसमें सूक्ष्म नलिकाओं और वायुकोश की हवा के बीच गैसों का आदान-प्रदान होता है। छाती की पेशियाँ और फेफड़ों के नीचे का पेशीय पर्दा (मध्य पट) या ड्याफ्राम हवा के अवागमन में मदद करते हैं। श्वसन तंत्र के ऊपरी भाग में नाक, गला और स्वरयंत्र (लैरींक्स) आते हैं। श्वसन तंत्र के निचले भाग में मुख्य श्वास नली और इसकी शाखाएँ यानि श्वसनी, छोटी शाखाएँ और लाखों वायुकोश (एल्वियोलाई) जिनके साथ सूक्ष्म केश नलिकाओं का जाल होता है। श्वसन तंत्र को ऊपरी और निचले भागों में बॉंटकर समझने से आसानी रहती है। ऊपरी भाग का संक्रमण आमतौर पर खुद ठीक हो जाने वाली होता हैं। परन्तु निचले भाग का संक्रमण आम तौर पर गम्भीर होता हैं और कभी कभी जानलेवा हो सकता है।
श्वसनतंत्र का उपरी हिस्सा
नाक के अन्दर गुफानुमा जगह होती है। बाहर से इसका पता नहीं चलता। यह हडि्डयों की बनी गुफा जैसी है, जो अन्दर से पतली झिल्ली से ढकी रहती है। इसमें खास तरह की कोशिकाएँ और तंत्रिकाएँ होती हैं जो सूँघने का काम करती है। एक पतली दीवार नाक की गुफा को दो भागों में बॉंटती है। नाक की इस दीवार में किसी भी एक तरफ उभार आ सकता है इससे वो तरफ छोटी हो जाती है। इस पतली तरफ से साँस लेने में मुश्किल होने लगती है। अगर यह शिकायत बार-बार होने लगे या ज़्यादा परेशानी करे तो इसे आपरेशन से ठीक किया जा सकता है। दीवार से मुलायम हडि्डयों की परत हटा देने से उभार हटता है।
" परिवहन (Transport) "
जीवों में उपापचयी क्रियाओं के संपादन के लिए उपयोगी पदार्थों को उनके मूल स्रोत से प्राप्त कर प्रत्येक कोशिकाओं तक पहुचाने तथा अनुपयोगी एवमं हानिकारक पदार्थों को कोशिकाओं से निकाल कर गंतव्य स्थान तक पहुचाने की क्रिया को परिवहन कहते है।
ऐसे कार्यो के संपादन के लिए जीवों में विकसित तंत्र को "परिवहन तंत्र ( transport system)" कहते है।
मानव में परिवहन
साधारण भाषा में समझे तो परिवहन का अर्थ होता है- वास्तु को एक जगह से दूसरे जगह ले जाना । ठीक उसी प्रकार सभी जीवों के शरीर में भी पदार्थों को एक जगह से दूसरे जगह भेजा जाता है।
रक्त,रक्त वाहिनियाँ और हृदय मिलकर रक्त परिवहन तंत्र या परिसंचरण तंत्र का निर्माण करती है।
रक्त (blood) :- यह लाल रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है जो रक्त वहिनियो में प्रवाह करता है।इसकाph मान
7.4 होता है।
यह अपने बहाव के दौरान सभी ऊतकों का संयोजन करता है, इसलिए इसे "तरल संयोजी ऊतक " भी कहा जाता है।
इसके दो प्रमुख घटक होते है:-
तरल भाग जिसे प्लाज्मा कहते है।
ठोस भाग जिसमे Rbc, wbc, रक्त पट्टीकाणु होते है।
प्लाज्मा (plasma) :- यह हल्के पीले रंग का चिपचिपा द्रव है जिसमे 90•/• जल,7•/• प्रोटी न , 0.9•/• अकार्बनिक लवण , ग्लूकोस , वसा तथा कार्बनिक पदार्थ होते है।
प्लाज्मा में मौजूद प्रोटीन को प्लाज्मा प्रोटीन कहते है।
जैसे :- प्रोथोबिंन ,हिपैरिन आदि।
जब प्लाज्मा से फाईब्रिनोजिन अलग हो जाता है तो प्लाज्मा का शेष भाग सीरम कहलाता है।
ये प्रोटीन रक्त को थक्का बनाने में सहायक होते है।
लाल रक्त कोशिकाएं ( red blood cells /RBC )
इसमे ही (hemoglobin) पाया जाता है जिसके कारण इसका रंग लाल होता है। इसे ऑक्सिजन का वाहक भी कहा जाता है । RBC में ।। नही होता है।
श्वेत रक्त कोशिकाये (white blood cells/ WBC)
इसमे हीमोग्लोबिन नही पाया जाता है जिसके कारण यह रंगहीन होता है।इसकी संख्या rbc से कम होती है।
रक्त पत्तिकाणु रक्त के थक्का बनने में सहायक होते है।इसे थ्रोम्बोसाइट भी कहते है।
Wbc और RBC में अंतर
Wbc और rbc में अंतर इस प्रकार है -
Wbc:
इसमें हीमोग्लोबिन नही होता है।
इसका निर्माण अस्थिमज्जा में होता है।
यह रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
इसकी मृत्यु 5-6 दिन में हो जाती है।
इसका रंग ऊजला होता है।
Rbc:
इसमे हीमोग्लोबिन होता है।
इसका निर्माण प्लीहा में होता है।
यह ऑक्सिजन का वाहक होता है।
इसकी मृत्यु 120 दिनों में हो जाती है।
इसका रंग लाल होता है।
उत्सर्जन:
शरीर कोशिकाओं से वर्ज्य (waste) या विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने की क्रियाविधि को उत्सर्जन (Excretion) कहते हैं। वैसे अंग जो उत्सर्जन क्रिया में भाग लेते हैं या सहायता पहुँचाते हैं, उत्सर्जी अंग (Excretory Organs) कहलाते हैं।
अपचय क्रिया (Catabolic process) के फलस्वरूप शरीर में एकत्रित जटिल यौगिकों का विघटन होता है जिसके फलस्वरूप ऊर्जा मुक्त होती है और कुछ अपशिष्ट पदार्थ (waste products) शेष रह जाते हैं। यह अपशिष्ट पदार्थ व्यर्थ होने के साथ-साथ हानिकारक या विषाक्त (Poisonous) भी होते हैं, जो जीवित कोशिका के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। इन पदार्थों का शरीर में अधिक समय तक रहने पर उपापचय की क्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और विभिन्न रोग भी हो सकते हैं। अत: इन अपशिष्ट या वर्ज्य पदार्थ का शरीर से बाहर निष्कासन आवश्यक है।
नियंत्रण और समन्वय:
संसार के सभी जीव अपने आस-पास होने वाले परिवर्तनों के प्रति-अनुक्रिया करते है | पर्यावरण में प्रत्येक परिवर्तन की अनुक्रिया से एक समुचित गति उत्पन्न होती है | कोई भी गति उस घटना पर निर्भर करती है जो उसे प्रेरित करती है | जैसे- हम गरम वस्तु को छूटे हैं तो हमारा हाथ जलने लगता है और हम तुरंत इसके प्रति अनुक्रिया (respond) करते है |
जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय (Control and Coordination in Animals):
जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय तंत्रिका तथा पेशी उत्तक द्वारा किया जाता है |
ग्राही (Receptor): तंत्रिका कोशिकाओं के विशिष्ट सिरे जो पर्यावरण से सभी सूचनाओं का पता लगाते हैं ग्राही कहलाते हैं |
नियंत्रण और समन्वय:
संसार के सभी जीव अपने आस-पास होने वाले परिवर्तनों के प्रति-अनुक्रिया करते है | पर्यावरण में प्रत्येक परिवर्तन की अनुक्रिया से एक समुचित गति उत्पन्न होती है | कोई भी गति उस घटना पर निर्भर करती है जो उसे प्रेरित करती है | जैसे- हम गरम वस्तु को छूटे हैं तो हमारा हाथ जलने लगता है और हम तुरंत इसके प्रति अनुक्रिया (respond) करते है |
जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय (Control and Coordination in Animals):
जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय तंत्रिका तथा पेशी उत्तक द्वारा किया जाता है |
ग्राही (Receptor): तंत्रिका कोशिकाओं के विशिष्ट सिरे जो पर्यावरण से सभी सूचनाओं का पता लगाते हैं ग्राही कहलाते हैं |
जनन (Reproduction) द्वारा कोई जीव (वनस्पति या प्राणी) अपने ही सदृश किसी दूसरे जीव को जन्म देकर अपनी जाति की वृद्धि करता है। जन्म देने की इस क्रिया को जनन कहते हैं। जनन जीवितों की विशेषता है। जीव की उत्पत्ति किसी पूर्ववर्ती जीवित जीव से ही होती है।
जनन (Reproduction) द्वारा कोई जीव (वनस्पति या प्राणी) अपने ही सदृश किसी दूसरे जीव को जन्म देकर अपनी जाति की वृद्धि करता है। जन्म देने की इस क्रिया को जनन कहते हैं। जनन जीवितों की विशेषता है। जीव की उत्पत्ति किसी पूर्ववर्ती जीवित जीव से ही होती है।
आनुवंशिकता तथा जैव विकास:
आप क्या सीखेंगे:
पीढ़ी दर पीढ़ी वैरियेशन कैसे जमा होते हैं
मेंडल के प्रयोग और इनहेरिटेंस के नियम
मनुष्यों में सेक्स डिटरमिनेशन
जैव विकास और स्पेशियेशन
क्लासिफिकेशन और जैव विकास के बीच संबंध
आधुनिक मानव का विकास
वैरियेशन का जमा होना
हर पीढ़ी में छोटे-मोटे वैरियेशन होते रहते हैं। ऐसा डीएनए रेप्लिकेशन के दौरान होने वाली कुछ गलतियों के कारण होता है। एसेक्सुअल रिप्रोडक्शन में वैरियेशन की संख्या बहुत कम होती है, लेकिन सेक्सुअल रिप्रोडक्शन में वैरियेशन की संख्या अधिक होती है। छोटे-मोटे वैरियेशन का कई पीढ़ियों तक पता भी नहीं चलता है। अनेक पीढ़ियों के बाद ही इन वैरियेशन का सम्मिलित असर देखने को मिलता है। नीचे के उदाहरण में दिखाया गया है कि किस तरह से पीढ़ी दर पीढ़ी वैरियेशन जमा होते हैं।
आनुवंशिकता तथा जैव विकास:
आप क्या सीखेंगे:
पीढ़ी दर पीढ़ी वैरियेशन कैसे जमा होते हैं
मेंडल के प्रयोग और इनहेरिटेंस के नियम
मनुष्यों में सेक्स डिटरमिनेशन
जैव विकास और स्पेशियेशन
क्लासिफिकेशन और जैव विकास के बीच संबंध
आधुनिक मानव का विकास
वैरियेशन का जमा होना
हर पीढ़ी में छोटे-मोटे वैरियेशन होते रहते हैं। ऐसा डीएनए रेप्लिकेशन के दौरान होने वाली कुछ गलतियों के कारण होता है। एसेक्सुअल रिप्रोडक्शन में वैरियेशन की संख्या बहुत कम होती है, लेकिन सेक्सुअल रिप्रोडक्शन में वैरियेशन की संख्या अधिक होती है। छोटे-मोटे वैरियेशन का कई पीढ़ियों तक पता भी नहीं चलता है। अनेक पीढ़ियों के बाद ही इन वैरियेशन का सम्मिलित असर देखने को मिलता है। नीचे के उदाहरण में दिखाया गया है कि किस तरह से पीढ़ी दर पीढ़ी वैरियेशन जमा होते हैं।
हमारा पर्यावरण:
"परि" जो हमारे चारों ओर है"आवरण" जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है। पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत इकाई है जो किसी जीवधारी अथवा पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनके रूप, जीवन और जीविता को तय करते हैं। ... इस प्रकार एक जीवधारी और उसके पर्यावरण के बीच अन्योन्याश्रय संबंध भी होता है।
गणित विषय की अच्छी तैयारी के लिए "कक्षा 10" गणित के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर – वास्तविक संख्याएँ यहाँ प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे छात्र जो गणित विषय की परीक्षाओं में अच्छे अंक प्राप्त करना चाहते है उन्हें अपनी तैयारी के लिए यहाँ वास्तविक संख्याएँ के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर मिल जाएंगे। महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर की जानकारी किसी भी परीक्षा की तैयारी के लिए आवश्यक होती है।
गणित के बहुपद (Polynomial) क्लास 10 के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय होता है क्योंकि इस चैप्टर से लगभग 10 मार्क्स के प्रश्न पूछे जाते है जिसमे अधिकतक प्रश्न बहुपद के सूत्र से होते है. ऐसे में इसके सूत्र, परिभाषा एवं ट्रिक्स समझना अत्यंत आवश्यक है.
बहुपद (Polynomial) क्या है ?
a + a1x + a2x2 + a3x3 +…………………… + anxn के रूप में रहने वाले व्यंजक को बहुपद कहते है.
जहाँ a, a1, a2, a3 ……an अचर वास्तविक संख्याएँ है और n पूर्ण संख्या है.
दो चर वाले रैखिक समीकरण (linear equation in two variable )
जैसा कि हमें इसके नाम से ही प्रतीत हो रहा है की इन समीकरणों में दो चरों वाले व्यंजकों का ही प्रयोग किया जाता है। इसलिए ये समीकरण दो चर वाले रैखिक समीकरण कहलाते हैं।
सबसे पहले हमे यह जानने की जरूरत है कि दो चर वाले समीकरणों में दो चर वाले व्यंजकों का प्रयोग किया जाता है। जब हम इन समीकरणों को हल करते हैं तो हमें x एवं y की विभिन्न मान मिलते हैं जिनसे हमें एक रेखा खींचनी होती है।
उदाहरण:
13y + 14x = 29
y + 2x – 2 = 0
3x + 2y = 4
ऊपर दिए गए उदाहरण में जैसा कि आप देख सकते हैं कि ये सभी उदाहरण दो चर वाले रैखिक समीकरण के हैं क्योंकि हम देख सकते हैं की इन सभी समीकरणों में दो चर हैं x एवं y अतः ये सभी उदाहरण दो चर वाले समीकरणों के उदाहरणों के अंतर्गत आयेंगे।
द्विघात समीकरण (quadratic equation) क्या होता है?
ऐसा समीकरण जिसकी उच्चतम घात 2 होती है ऐसे समीकरण को द्विघात समीकरण कहा जाता है। द्विघात समीकरणों को हम दो घात वाला समीकरण भी कहा जाता है। इस समीकरण को एक उदाहरण के साथ समझते हैं। मान लीजिये हमारे पास एक ज़मीन का टुकड़ा है एवं हम वहाँ एक घर बनाना चाहते हैं। मान लेते हैं ज़मीन का टुकड़ा 300 m2 है। अब हम अपने घर की चौड़ाई को अपनी लम्बाई को दो गुना रखना चाहते हैं।
हम यदि घर की लम्बाई को x मानते हैं तो घर की चौड़ाई 2x हो जायेगी। हम यह भी जानते हैं की घर का क्षेत्रफल लम्बाई x चौड़ाई होता है। तो हम इसे ऐसे लिख सकते हैं:
घर का क्षेत्रफल = (x)*(2x) = 2x2
अगर :
2x2 = 300
तो
x = 24.495 m
अतः जैसा कि आपने ऊपर देखा हम इस तरह द्विघात समीकरणों की मदद से वास्तविक जीवन की कई समस्याओं का आसान समाधान कर सकते हैं। द्विघात समीकरण हमें वास्तविक जीवन की समस्याओं को आसानी से समझने में मदद करता है।
द्विघात समीकरणों का मानक रूप
एक द्विघात समीकरण का मानक रूप ax2 + bx + c को माना जाता है। यहाँ x का मान अज्ञात होता है a, b एवं c गुणांक होते हैं एवं शून्य के बराबर नहीं होते है।
अतः
द्विघात समीकरण का मानक रूप : ax2 + bx + c
समांतर श्रेणी (Arithmetic Progression):
संख्याओं की एक ऐसी सूची है जिसमें प्रत्येक पद (पहले पद के अतिरिक्त) अपने पद में एक निश्चित संख्या जोड़ने पर प्राप्त होता है, को समांतर श्रेणी (Arithmetic Progression) कहते हैं।
सार्व अंतर (Common difference):
वह निश्चित संख्या 2, जिसे जोड़ने पर सूची की अगली संख्या प्राप्त होती है, को सार्व अंतर कहते हैं।
दूसरे शब्दों में प्रत्येक अगले पद तथा पूर्व पद का अंतर सार्व अंतर कहलाता है।
सार्व अंतर धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकता है।
सार्व अंतर को dd से निरूपित किया जाता है।
त्रिभुज (Triangle):
यदि किसी त्रिभुज की एक भुजा के समांतर एक रेखा अन्य दो भुजाओं को प्रतिच्छेद करने के लिए खींची जाए, तो ये दो भुजाएँ एक ही अनुपात में विभाजित हो जाती हैं (समानुपातिकता का आधरभूत प्रमेयद्ध) और इसका विलोम।
दो समरूप त्रिभुजों के क्षेत्रापफलों का अनुपात उनकी संगत भुजाओं के वर्गों के अनुपात के बराबर होता है।
एक समकोण त्रिभुज के समकोण वाले शीर्ष से उसके कर्ण पर खींचा गया लंब उस त्रिभुज को ऐसे दो त्रिभुजों में विभाजित करता है जो संपूर्ण त्रिभुज के समरूप होते हैं और परस्पर भी समरूप होते हैं।
किसी समकोण त्रिभुज में कर्ण पर बना वर्ग शेष दो भुजाओं पर बने वर्गों के योग के बराबर होता है (पाइथागोरस प्रमेयद्ध) और इसका विलोम।
निर्देशांक ज्यामिति (coordinate geometry) की परिभाषा :
निर्देशांक ज्यामिति गणित की वह शाखा है जिसमें समतल पर बिन्दुओं की स्थिति को दो संख्याओं के जोड़े से परिभाषित किया जाता है। जिन संख्याओं के जोड़ों से उस बिंदु की स्थिति को परिभाषित किया जाता है वे दो बिंदु निर्देशांक कहलाते हैं।
जिन संख्याओं के जोड़ों से उस बिंदु की स्थिति को परिभाषित किया जाता है वे दो बिंदु निर्देशांक कहलाते हैं। जब हमें निर्देशांक नहीं पता होते तो हम उनकी जगह (x,y) लिखते हैं।
इन निर्देशांकों में से x को abcissa एवं y को ordinate कहा जाता है। x से हमें पता चलता है कि एक बिंदु तल से कितनी दायीं और है एवं y से हमें यह पता चलता है की बिंदु कितनी उंचाई पर है।
जो रेखा वर्टीकल या नीचे से ऊपर की और है वह x अक्ष कहलाती है। जो रेखा अनुप्रस्थ है या बाएं से दायें है उस रेखा को y अक्ष कहा जाता है।
त्रिकोणमिति (Trigonometry) में एक त्रिभुज की भुजाओं और कोणों के बीच संबंधों का अध्ययन किया जाता है।
अंग्रेजी के शब्द 'Trigonometry' तीन ग्रीक शब्दों से मिलकर बना है। ये शब्द हैं: 'Tri + Gon + Metron'.
इनमें 'Tri' का अर्थ है 'तीन'
'Gon' का अर्थ है 'भुजा' तथा
'Metron' का अर्थ होता है 'माप'
अर्थात अंग्रेजी शब्द 'Trigonometry' का पूर्ण अर्थ है, 'एक त्रिभुज के तीनों भुजाओं की माप'
त्रिकोणमिति के सिद्धांतों तथा तकनीकि का उपयोग कर बड़े बड़े वस्तुओं को देखकर उनसे समकोण त्रिभुज के बनने की कल्पना कर उन वस्तुओं की ऊँचाई तथा दूरी ज्ञात की जा सकती है।
उदाहरण: कुतुब मीनार के ऊपरि सिरे को देखने के क्रम में एक विद्यार्थी द्वारा समकोण त्रिभुज बनने की कल्पना की जाती है। त्रिकोणमिति के सिद्धांत तथा तकनीकि का उपयोग कर इस समकोण त्रिभुज के कल्पना से कुतुब मीनार की ऊँचाई तथा देखने के स्थान से दूरी ज्ञात की जा सकती है।
प्राचीन काल में त्रिकोणमिति पर किये गए कार्य का उल्लेख मिश्र तथा बेबीलॉन में मिलता है। प्राचीन काल के खगोलविद त्रिकोणमिति का प्रयोग पृथ्वी से तारों और ग्रहों की दूरियाँ मापने में करते थे। आज भी इंजिनियरिंग तथा भौतिक विज्ञान में त्रिकोणमिति का उपयोग किया जाता है।
त्रिकोणमिति के कुछ अनुप्रयोग:
कक्षा 10 में ऊंचाई एवं दूरी एक महत्वपूर्ण पाठ है। ऊंचाई किसी भी वस्तु का लम्बरूप दिशा में माप होता है। जैसे हमारी ऊंचाई होती है 5 फुट 6 फुट आदि इसी प्रकार चीज़ों की ऊपर से नीचे तक का माप को ही ऊंचाई कहते है।
दूरी किसी भी वस्तु की किसी भी एक बिंदु से दूरी होती है। जैसे कोई चीज़ किसी निश्चित बिंदु से 100 मीटर दूर है या 1 km दूर है इसे दूरी कहते हैं।
अगर हम एक वस्तु के शीर्ष बिंदु एवं ज़मीन पर एक बिंदु को जोड़ने वाली एक रेखा के बारे में सोचें तो यह रेखा, वास्तु की ऊंचाई एवं ज़मीन पर इसकी बिंदु से दूरी मिलकर एक त्रिभुज बनाते हैं।
वृत्त(Circle):
वृत्त एक द्वि-आयामी गोल आकृति होती है, जिसमें केंद्र से समान दूरी पर बिंदु होते हैं। बस, वृत्त एक बंद वक्र है, जो एक तल को 2 भाग-आंतरिक और बाह्य में विभाजित करता है। एक सटीक गोल आकृति, एक वृत्त का सही उदाहरण है।
वृत्त से सम्बन्धित शब्दावली
चाप: वृत्त पर स्थित प्रत्येक जुड़ा बिंदु चाप है। चाप में दो बिंदुओं का निर्धारण किया जाता हैऔर वृत्त का केंद्र दो चापों को मिलाकर एक पूर्ण वृत्त बनाता है।
केंद्र : वह बिंदु जो वृत्त के सभी बिंदुओं से समान दूरी पर होता है।
जीवा: एक रेखाखंड जो वृत्त को दो भागों में विभाजित करता है जिसका अंतिम बिंदु वृत्त पर स्थित होता है।
व्यास: एक वृत्त में दो बिंदुओं के बीच की सबसे बड़ी दूरी व्यास होता है। यह वृत्त की सबसे बड़ी जीवा होती है, यह त्रिज्या का दोगुना होता है।
त्रिज्या:वृत्त पर स्थित किसी बिंदु से एक वृत्त के केंद्र को जोड़ने वाला रेखाखंड। यह व्यास का आधा होता है।
त्रिज्याखंड: एक ही केंद्र से समान लंबाई के दो त्रिज्याओं से घिरा क्षेत्र
वृत्त-खंड: जीवा से घिरा क्षेत्र और जीवा के अंतिम बिंदुओं को जोड़ने वाले चाप में से एक
अर्धवृत्त: यह एक व्यास के समापन बिंदु द्वारा बना चाप है, जिसका मध्य बिंदु, केंद्र होता है। वृत्त का आधा-चक्र, अर्धवृत्त है।
स्पर्शरेखा: एकतलीय सरल रेखा, जो वृत्त के बाह्य केवल एक बिंदु को स्पर्श करता है।
(A). रचनाएँ और मुख्य अवधरणाएँ:
एक रेखाखंड का आंतरिक रूप से एक दिये हुए अनुपात में विभाजन।
एक दिये हुए त्रिभुज के समरूप एक दिये हुए स्वेफल गुणक के अनुसार त्रिभुज की रचना करना, जहाँ स्वेफल गुणक 1 से छोटा हो सकता है या 1 से बड़ा भी हो सकता है।
किसी बाहरी ¯बदु से वृत्त पर स्पर्श रेखाओं के एक युग्म की रचना करना।
वृत्तो से संबंधित क्षेत्रफल:
❍ वृत्त की त्रिज्या = परिधि2π या √क्षेत्रफल ÷ r
❍ वृत्त का व्यास = 2r
❍ वृत्त का क्षेत्रफल = π r2
❍ वृत्त का परिमाप / परिधि = 2πr
❍ अर्द्धवृत्त का क्षेत्रफल = 12 × πr2
❍ अर्द्धवृत्त का परिमाप = πr + 2r
❍ वृत्त के चतुर्थांश का क्षेत्रफल = 14 × πr2
❍ चाप = π r θ180°
❍ लघु वृत्तखंड का क्षेत्रफल = πr2θ360 - 12 r2 Sinθ
❍ दीर्घ वृत्तखंड का क्षेत्रफल = वृत्त का क्षेत्रफल - लघु वृत्त खंड का क्षेत्रफल
❍ लघु त्रिज्यखंड के चाप की लम्बाई (l) = πrθ180
❍ लघु त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल = πr2θ360 या 12 L × R
❍ दीर्घ त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल = πr2 [ 360 - θ360 ]
❍ दो संकेंद्री वृत्तों के बीच का क्षेत्रफल = π (r12 - r22)
❍ यदि किसी वृत्त की त्रिज्या को x प्रतिशत बढ़ा दिया जाये तो उसके क्षेत्रफल में % वृद्धि = 2x + x2100
❍ r त्रिज्या के वृत्ताकार पार्क के चारों ओर x मीटर चौड़ा रास्ता हो तो रास्ते का क्षेत्रफल = π x (2r+x)
❍ r त्रिज्या के वृत्ताकार पार्क के अंदर की ओर x मीटर चौड़ा रास्ता हो तो रास्ते का क्षेत्रफल = π x (2r-x)
Exercise
पृष्ठीय क्षेत्रफल और आयतन सूत्र:
घन का विकर्ण = √3a
घन का वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = 4 a2
घन का सम्पूर्ण पृष्ठीय क्षेत्रफल = 6 a2
घन का आयतन = a3
घनाभ का विकर्ण = √(L2 + b2 + h2)
घनाभ सम्पूर्ण पृष्ठीय क्षेत्रफल = 2(lb + bh + hl)
घनाभ का आयतन = lbh
बेलन का वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = 2πrh
बेलन का सम्पूर्ण पृष्ठीय क्षेत्रफल = 2πr(r+h)
बेलन का आयतन = πr2h
शंकु की तिर्यक ऊंचाई = l = √(r2 + h2)
शंकु का वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = πrl
शंकु का सम्पूर्ण पृष्ठीय क्षेत्रफल = πr(r+l)
शंकु का आयतन = (1/3)πr2h
गोले का वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = 4πr2
गोले का आयतन = (4/3)πr3
अर्धगोले का वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = 2πr2
अर्धगोले का सम्पूर्ण पृष्ठीय क्षेत्रफल = 3πr2
अर्धगोले का आयतन = (2/3)πr3
सांख्यिकी क्या हैं?
सांख्यिकी शब्द का प्रयोग दो रूपों में किया जाता है-- एक वचन और बहु वचन। प्राचीन समय मे जब सांख्यिकी का विकास पूर्णतः नही हो पाया था, तब इसे बहुवचन अर्थात् समंको के रूप मे ही स्वीकार किया जाता था, लेकिन आगे चलकर इस विज्ञान के पूर्ण विकसित होने पर इसे एकवचन अर्थात् सांख्यिकी विज्ञान के रूप मे प्रयोग मे लिया जाने लगा।
एकवचन के रूप मे सांख्यिकी का अर्थ 'सांख्यिकी विज्ञान' के रूप में हैं। बहुवचन के रूप मे 'सांख्यिकी का अर्थ 'आँकड़ों या समंको' के रूप मे हैं।
प्रायिकता (Probability):
जब घटना की अनिश्चितताओ को अंकगणित के रूप में निरूपित किया जाता हैं तो उसे प्रायिकता कहा जाता हैं।
प्रायिकता को अग्रजी में Probability कहते है।
प्रतिदर्श समष्टि (Sample Space):
किसी प्रयोग के बार-बार किए जाने पर प्राप्त परिणामों के समुच्चय को प्रतिदर्श समष्टि कहते हैं उसे साधारण रूप से S या S के अवयवों की संख्या को n(S) से सूचित करते है।
जैसे: एक सामान्य पासे की फेंक में S = {1,2,3,4,5,6}
घटना (Event):
प्रतिदर्श समष्टि के प्रत्येक उपसमुच्च्य को एक घटना कहते हैं इसे साधारण रूप में E से सूचित किया करते हैं।
जैसे: एक सिक्के की उछाल में S {H, T}
यदि शीर्ष ऊपर आने की घटना E हो, तो E = {H} ⊆ S
यदि S प्रतिदर्श समष्टि हो, तो किसी घटना E की प्रायिकता P(E) = n(E)/n(S)
जहाँ n(E) = समुच्चय E के अवयवों की संख्या
n(E) = प्रतिदर्श समष्टि S के अवयवों की संख्या
जैसे : यदि एक पासा फेंका जाए, तो चूंकि पासे पर 6 अंक लिखे रहते हैं तथा इनमें से कोई भी अंक ऊपर आ सकता हैं।
अतः प्रतिदर्श समष्टि S में अवयवों की संख्या = n(S) = 6
अब संख्या 3 के ऊपर आने की घटना यदि E हो, तो n(E) = 1
अतः ऊपर अंक 3 के आने की प्रायिकता P(E) = n(E)/n(S) = 1/6
यूरोप में राष्ट्रवाद:
बास्तीय के किले पर आक्रमण ज्यूसेपे मेत्सिनी: इटली के एकीकरण का अग्रदूत 18वीं सदी में कई देश जैसे जर्मनी, इटली तथा स्विटजरलैण्ड आदि उस रूप में नहीं थे जैसा कि आज हम इन्हें देखते हैं। ये छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित थे जिनका अपना स्वतन्त्र शासक था। 1789 ई॰ की फांसीसी क्रान्ति से पहले फांस एक ऐसा राज्य था जिनके सम्पूर्ण भू-भाग पर एक निरकुंश राजा का शासन था। नेपोलियन की संहिता - इसे 1804 में लागू किया गया। इसने जन्म पर आधरित विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया इसनें न केवल न्याय के समक्ष समानता स्थापित की बल्कि सम्पत्ति के अध्किर को भी सुरक्षित किया। १९वीं शताब्दी में यूरोपीय महाद्वीप में राष्ट्रवाद की एक लहर चली जिसने यूरोपीय देशों का कायाकल्प कर दिया। जर्मनी, इटली, रोमानिया आदि नवनिर्मित देश कई क्षेत्रीय राज्यों को मिलाकर बने जिनकी राष्ट्रीय पहचान 'समान' थी। यूनान, पोलैण्ड, बल्गारिया आदि स्वतंत्र होकर राष्ट्र बन गये। यूरोप के राजनीतिक विकास में राष्ट्रवाद की प्रमुख भूमिका थी।
यूरोप में राष्ट्रवाद:
बास्तीय के किले पर आक्रमण ज्यूसेपे मेत्सिनी: इटली के एकीकरण का अग्रदूत 18वीं सदी में कई देश जैसे जर्मनी, इटली तथा स्विटजरलैण्ड आदि उस रूप में नहीं थे जैसा कि आज हम इन्हें देखते हैं। ये छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित थे जिनका अपना स्वतन्त्र शासक था। 1789 ई॰ की फांसीसी क्रान्ति से पहले फांस एक ऐसा राज्य था जिनके सम्पूर्ण भू-भाग पर एक निरकुंश राजा का शासन था। नेपोलियन की संहिता - इसे 1804 में लागू किया गया। इसने जन्म पर आधरित विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया इसनें न केवल न्याय के समक्ष समानता स्थापित की बल्कि सम्पत्ति के अध्किर को भी सुरक्षित किया। १९वीं शताब्दी में यूरोपीय महाद्वीप में राष्ट्रवाद की एक लहर चली जिसने यूरोपीय देशों का कायाकल्प कर दिया। जर्मनी, इटली, रोमानिया आदि नवनिर्मित देश कई क्षेत्रीय राज्यों को मिलाकर बने जिनकी राष्ट्रीय पहचान 'समान' थी। यूनान, पोलैण्ड, बल्गारिया आदि स्वतंत्र होकर राष्ट्र बन गये। यूरोप के राजनीतिक विकास में राष्ट्रवाद की प्रमुख भूमिका थी।
समाजवाद एवं साम्यवाद:
समाजवाद और साम्यवाद दोनों का उद्द्येश्य व्यक्ति की समानता होता है। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप संसार में उद्योग धंधों का जाल बिछ गया। जहाँ इन उद्योगों से विकास ने रफ़्तार पकड़ी वहीँ इसने समाज में दो वर्ग पैदा कर दिया। पूंजीपति वर्ग और मजदुर वर्ग। समाज की इस द्विवर्गीय व्यवस्था ने समाज में असमानता को बढ़ावा दिया और दोनों वर्गों में गहरी खाई बनती गयी। इस व्यवस्था के फलस्वरूप होने वाले शोषण ने दुनिया को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया और इसी से दो सिद्धांत या दो विचारों का जन्म हुआ समाजवाद और साम्यवाद। इन दोनों विचारों ने समाज में एक नयी उम्मीद की किरण जगा दी और दुनिया में आने वाले दशकों में काफी प्रभाव पड़ा।
समाजवाद क्या है?
समाजवाद जिसे अंग्रेजी और फ़्रांसिसी भाषा में सोसोलिज्म कहा जाता है समतामूलक समाज की अवधारणा पर आधारित है। इसे व्यक्तिवाद और पूंजीवाद का घोर विरोधी सिद्धांत माना जाता है। एक समाजवादी व्यवस्था में वर्गविभेद की कोई जगह नहीं होती और पूंजी और उत्पादन के साधनों पर समाज के रूप में राज्य का नियंत्रण होता है। साथ ही इनके वितरण का अधिकार भी राज्य का ही होता है। समाजवाद का मुख्य उद्द्येश्य समाज में आर्थिक समानता लाना होता है। समाजवाद राज्य के सहयोग से समाज में समानता लाने के सिद्धांत पर कार्य करता है।
साम्यवाद किसे कहते हैं?
साम्यवाद एक वर्गविहीन समाज की परिकल्पना है जिसमे समाज का हर व्यकित हर तरह से सामान होता है। साम्यवाद कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगल्स द्वारा प्रतिपादित और साम्यवादी घोषणा पत्र में वर्णित समाजवाद का अंतिम लक्ष्य है। यह एक सामाजिक और राजनितिक व्यवस्था है जिसके अंतर्गत एक ऐसे समतामूलक समाज की स्थापना की कल्पना की जाती है जिसमे ऐतिहासिक और आर्थिक प्रतिमानों को नष्ट कर उत्पादन के सभी साधनों पर पुरे समाज के स्वामित्व की अवधारणा होगी। समाज में कोई वर्ग नहीं होगा और मानवता ही एकमात्र जाति होगी। कोई भी न्याय से वंचित नहीं होगा।
समाजवाद एवं साम्यवाद:
समाजवाद और साम्यवाद दोनों का उद्द्येश्य व्यक्ति की समानता होता है। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप संसार में उद्योग धंधों का जाल बिछ गया। जहाँ इन उद्योगों से विकास ने रफ़्तार पकड़ी वहीँ इसने समाज में दो वर्ग पैदा कर दिया। पूंजीपति वर्ग और मजदुर वर्ग। समाज की इस द्विवर्गीय व्यवस्था ने समाज में असमानता को बढ़ावा दिया और दोनों वर्गों में गहरी खाई बनती गयी। इस व्यवस्था के फलस्वरूप होने वाले शोषण ने दुनिया को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया और इसी से दो सिद्धांत या दो विचारों का जन्म हुआ समाजवाद और साम्यवाद। इन दोनों विचारों ने समाज में एक नयी उम्मीद की किरण जगा दी और दुनिया में आने वाले दशकों में काफी प्रभाव पड़ा।
समाजवाद क्या है?
समाजवाद जिसे अंग्रेजी और फ़्रांसिसी भाषा में सोसोलिज्म कहा जाता है समतामूलक समाज की अवधारणा पर आधारित है। इसे व्यक्तिवाद और पूंजीवाद का घोर विरोधी सिद्धांत माना जाता है। एक समाजवादी व्यवस्था में वर्गविभेद की कोई जगह नहीं होती और पूंजी और उत्पादन के साधनों पर समाज के रूप में राज्य का नियंत्रण होता है। साथ ही इनके वितरण का अधिकार भी राज्य का ही होता है। समाजवाद का मुख्य उद्द्येश्य समाज में आर्थिक समानता लाना होता है। समाजवाद राज्य के सहयोग से समाज में समानता लाने के सिद्धांत पर कार्य करता है।
साम्यवाद किसे कहते हैं?
साम्यवाद एक वर्गविहीन समाज की परिकल्पना है जिसमे समाज का हर व्यकित हर तरह से सामान होता है। साम्यवाद कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगल्स द्वारा प्रतिपादित और साम्यवादी घोषणा पत्र में वर्णित समाजवाद का अंतिम लक्ष्य है। यह एक सामाजिक और राजनितिक व्यवस्था है जिसके अंतर्गत एक ऐसे समतामूलक समाज की स्थापना की कल्पना की जाती है जिसमे ऐतिहासिक और आर्थिक प्रतिमानों को नष्ट कर उत्पादन के सभी साधनों पर पुरे समाज के स्वामित्व की अवधारणा होगी। समाज में कोई वर्ग नहीं होगा और मानवता ही एकमात्र जाति होगी। कोई भी न्याय से वंचित नहीं होगा।
हिन्द - चीनी में राष्ट्रवादी आंदोलन:
शुरुआती इतिहास: आधुनिक वियतनाम, लाओस और कम्बोडिया के क्षेत्रों को इंडो-चीन कहते हैं। प्राचीन समय में यहाँ के लोग विभिन्न समूहों में विभाजित थे और चीन के शक्तिशाली साम्राज्य की छत्रछाया में रहते थे। विश्व के अन्य भागों में स्वतंत्र राष्ट्रों के निर्माण के बाद भी यहाँ के शासक चीन की पुरातन संस्कृति को मानते थे और वहाँ की प्रशासन पद्धति को अपनाते थे। जलमार्ग से होकर जाने वाले सिल्क रूट से वियतनाम भी जुड़ा हुआ था। इसलिए यहाँ सदियों से माल, लोग और विचारों का प्रवाह होता रहा है। व्यापार के अन्य रास्तों से यह अंदर के इलाकों से भी जुड़ा हुआ था जहाँ गैर वियतनामी लोग रहते थे; जैसे कि ख्मेर कम्बोडियन।
उपनिवेश का निर्माण: फ्रांस की सेना 1858 में वियतनाम पहुँची थी, और फिर 1880 के दशक के मध्य तक पूरे उत्तरी इलाके पर फ्रांसीसी सेना का कब्जा हो चुका था। फ्रांस और चीन की लड़ाई के बाद फ्रांस का नियंत्रण टोंकिन और अनम पर भी हो गया। इस प्रकार 1887 में हिन्द - चीनी में राष्ट्रवाद का निर्माण हुआ।
भारत में राष्ट्रवाद
राष्ट्रवाद वह भावना है जो लोगों को एकता के सूत्र में बांधती हैं और स्वराज के प्रति विश्वास पैदा करके राष्ट्रीय आन्दोलन को एक ठोस आधार प्रदान करती है। राष्ट्रीय आन्दोलन ही वह विचार है जो लोगों को चेतना प्रदान करने में समाज सुधारकों , राष्ट्रवादी नेताओं , राजनितिक संस्थाओं , शिक्षा प्रणाली , राष्ट्रवादी आदि तत्वों का बहुत अधिक योगदान रहा है।
भूमिका :
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन , राजनीतिक संगठनों , विचारकों , क्रांतिकारों को मिलाकर किए गए कुछ ऐसे आंदोलन थे जिनका एक ही लक्ष्य था भारत से ईस्ट इंडिया कंपनी को जड़ से उखाड़ फेंकना स्वतंत्रता प्रप्ति में इन क्षेत्रीय अभियानों आंदोलनों प्रयत्नों और कुछ क्रांतिकारी आंदोलनों का खासा महत्व है । यहां हम आपको बता रहे है कुछ ऐसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और घटनाओं के बारे में जिनकी वजह से भारत को स्वतंत्रता मिली ।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन राष्ट्रवाद का उदय (Rise of nationalism) - भारत में संगठित राष्ट्रीय आंदोलन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में प्रारम्भ हूआ था। मुख्य रूप से ब्रिटिश साम्राजयवाद की नीतियों की चुनौतियों के प्रत्युत्तर में भारतीयों ने एक राष्ट्र के रूप में सोचना प्रारम्भ किया था। भारतीयों में राष्ट्रीय भावना के विकास तथा भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के लिए स्वयं ब्रिटिश शासन ने आधार तैयार किया।
इस अध्याय की मुख्य बातें:
सत्याग्रह का मतलब
असहयोग आंदोलन
दांडी मार्च
विभिन्न लोगों के लिए स्वराज के विभिन्न मतलब
दलितों और मुसलमानों की भागीदारी
प्रथम विश्व युद्ध
प्रथम विश्व युद्ध के प्रभाव: हालांकि भारत प्रत्यक्ष रूप से प्रथम विश्व युद्ध में शामिल नहीं था लेकिन उस युद्ध में इंगलैंड के शामिल होने के कारण भारत पर भी असर पड़ा था। युद्ध के कारण इंगलैंड के रक्षा संबंधी खर्चे में बढ़ोतरी हुई थी। उस खर्चे को पूरा करने के लिये कर्ज लिये गये और टैक्स बढ़ाए गये। अंग्रेजी सरकार ने कस्टम ड्युटी और इनकम टैक्स को बढ़ाया ताकि अतिरिक्त राजस्व संग्रह किया जा सके। युद्ध के दौरान चीजों की कमतें बढ़ गईं। 1913 से 1918 के बीच अधिकतर चीजों के दाम दोगुने हो गये। इससे आम आदमी की मुश्किलें बढ़ गईं। लोगों को जबरन सेना में भर्ती किया गया। इससे ग्रामीण इलाकों में काफी आक्रोश था।
भारत के कई भागों में उपज खराब होने के कारण भोजन की कमी हो गई। इंफ्लूएंजा की महामारी ने समस्या को और गंभीर कर दिया। 1921 की जनगणना के अनुसार, अकाल और महामारी के कारण 120 लाख से 130 लाख तक लोग मारे गए।
सत्याग्रह का अर्थ: महात्मा गांधी ने जनांदोलन का एक नायाब तरीका अपनाया जिसका नाम था सत्याग्रह। सत्याग्रह का सिद्धांत कहता था कि यदि कोई सही मकसद के लिये लड़ाई लड़ रहा हो तो उसे अपने ऊपर अत्याचार करने वाले से लड़ने के लिये ताकत की जरूरत नहीं होती है। गांधीजी का मानना था कि एक सत्याग्रही अपनी लड़ाई अहिंसा के द्वारा ही जीत सकता है।
गाँधीजी द्वारा आयोजित शुरु के कुछ सत्याग्रह आंदोलन:
1916 में चंपारण में किसान आंदोलन।
1917 में खेड़ा का किसान आंदोलन।
1918 में अहमदाबाद के मिल मजदूरों का आंदोलन।
रॉलैट ऐक्ट (1919):
रॉलैट ऐक्ट को इंपीरियल लेगिस्लेटिव काउंसिल ने 1919 में पारित किया था। भारतीय सदस्यों के विरोध के बावजूद यह ऐक्ट पारित हो गया था। इस ऐक्ट ने सरकार को राजनैतिक गतिविधियों को कुचलने के लिये असीम शक्ति दे दी थी। इस ऐक्ट के मुताबिक बिना ट्रायल के ही राजनैतिक कैदियों को दो साल तक के लिये बंदी बनाया जा सकता था।
रॉलैट ऐक्ट के विरोध में गांधीजी ने 6 अप्रैल 1919 को राष्ट्रव्यापी आंदोलन की शुरुआत की। गांधीजी ने हड़ताल का आह्वान किया जिसे भारी समर्थन मिला। विभिन्न शहरों में लोग इसके समर्थन में निकल पड़े। दुकानें बंद हो गईं और रेल कारखानों के मजदूर हड़ताल पर चले गये। अंग्रेजी हुकूमत ने इस आंदोलन के खिलाफ कठोर कदम उठाने का निर्णय लिया। कई स्थानीय नेताओं को बंदी बना लिया गया। महात्मा गांधी को दिल्ली में आने से रोका गया।
जलियांवाला बाग:
10 अप्रैल 1919 को अमृतसर में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने गोली चलाई। इससे गुस्साए लोगों ने जगह-जगह पर सरकारी संस्थानों पर आक्रमण किया। अमृतसर में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। अमृतसर की कमान जनरल डायर के हाथों में सौंप दी गई।
13 अप्रैल को पंजाब में बैसाखी का त्योहार मनाया जा रहा था। ग्रामीणों का एक समूह जलियांवाला बाग में लगे एक मेले में शरीक होने आया था। वह बाग चारों तरफ से बंद था और निकलने के रास्ते संकीर्ण थे। जनरल डायर ने निकलने के रास्ते बंद करवा दिये और भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया। उस गोलीकांड में सैंकड़ो लोग मारे गये। इससे चारों तरफ हिंसा फैल गई। महात्मा गांधी हिंसा नहीं चाहते थे इसलिये उन्होंने आंदोलन वापस ले लिया।
आंदोलन के विस्तार की आवश्यकता:
रॉलैट सत्याग्रह मुख्य रूप से शहरों तक ही सीमित था। महात्मा गांधी को महसूस हुआ कि भारत में आंदोलन का विस्तार होना चाहिए। उनको लगता था कि ऐसा तभी संभव था जब हिंदू और मुसलमान एक मंच पर आ जाएँ।
खिलाफत आंदोलन:
खिलाफत के मुद्दे ने गांधीजी एक ऐसा अवसर दिया जिससे हिंदू और मुसलमानों को एक मंच पर लाया जा सकता था। प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की कराड़ी हार के बाद ऑटोमन के शासक पर कड़े संधि समझौते की अफवाह फैल चुकी थी। ऑटोमन का शासक मुस्लिम समुदाय का खलीफा भी हुआ करता था। खलीफा को समर्थन देने के लिये बंबई में मार्च 1919 में एक खिलाफत कमेटी बनाई गई। इस कमेटी के नेता थे दो भाई जिनके नाम थे मुहम्मद अली और शौकत अली। उनकी इच्छा थी कि महात्मा गांधी इस मुद्दे पर आंदोलन करें। 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में खिलाफत के समर्थन में और स्वराज के लिये एक अवज्ञा आंदोलन शुरु करने का प्रस्ताव पारित हुआ।
राष्ट्रवाद के उदय के कारण (CAUSES OF THE RISE OF NATIONALISM)
राष्ट्रवाद के उदय के लिए विभिन्न कारण सम्मिलित रूप से ब्रिटिश शासन तथा उसके प्रत्यक्ष तथा परोक्ष परिणामों ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के लिए भौतिक , नैतिक तथा बौद्धिक परिस्थितियां तैयार की धीरे - धीरे भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक समूह ने देखा कि उसके हित कभी भी अंग्रजी शासन के हाथ में सुरक्षित नहीं रह सकते।
अंग्रेजी सरकार की छत्र - छाया में किसानों से मालगुजारी के नाम पर उपज का बहुत बड़ा भाग ले लिया जाता था। जमींदारों , व्यापारियों तथा सूद खोरों को किसानों से लगान वसूलने तथा तरह - तरह से उसका शोषण करने के लिए सरकारी पदाधिकारियों व कर्मचारियों का पूरा सहयोग प्राप्त था । सरकारी नीति जिसमें विदेशी प्रतियोगिता को प्रोत्साहन दिया जा रहा था के कारण दस्तकार तथा शिल्पी भी बेरोजगार होने लगे थे , कारखानों तथा बागानों में मजदूरों का तरह - तरह से शोषण हो रहा था ।
इस प्रकार विदेशी साम्राज्य की भेदभाव पूर्ण नीतियों के परिणामस्वरूप भारतीयों में वाद की भावनाओं ने जन्म लेना प्रारम्भ किया , इस प्रकार एक शक्तिशाली साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन का धीरे - धीरे विकास हुआ इसने लोगों में एकता स्थापित करने और साम्राज्यवाद का मिलकर विरोध करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।
सरकार एक और विदेशी पंूजीपतियों को प्रोत्साहित कर रही थी दूसरी ओर देश के लोगों को पूरी तरह से अनदेखा किया जा रहा था , सरकार की व्यापारिक कर चुंगी तथा यातायात संबंधी नीतियों के कारण भारतीय पूंजीपति वर्ग को बहूत नुकसान उठाना पड़ रहा था समाज के सभी वर्गो के हो रहे शोषण के कारण लोगों ने महसूस किया कि ब्रिटिश सरकार के अधिन अब और लम्बे समय तक नहीं रहा जा सकता उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप में राष्ट बन चुके थे , जिसका भारतीयों पर राष्ट्रवादी विचारों के सन्दर्भ में बहुत ही अनुकूल प्रभाव पड़ा।
पाश्चात्य शिक्षा एवं संस्कृतिक ने राष्ट्रवादी भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया । पढ़े - लिखे भारतीयों को बर्क , मिल , ग्लैडस्टोन , वाइट , मैकाले जैसे लोगों के विचार सुननें का अवसर मिला तथा मिल्टन , शैले व वायरन आदि महान कवियों की कविताएं पढ़ने एवं रूसो , मैजिनी तथा वाल्टेयर आदि लोगों के विचारों को जानने का सौभाग्य मिला , जिससे भारतीयों में राष्ट्रवादी भावनाओं ने जन्म लिया अनेक धार्मिक तथा समाज सुधारकों , जैसे - राजाराम मोहन राय देवेन्द्र नाथ ठाकुर किशोर चन्द्र सेन , पी . सी . सरकार , ईश्वरचन्द्र विद्यासागर , स्वामी दयानन्द सरस्वती , रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानंद आदि ने भारत के अतीत का गौरवपूर्ण चित्र उपस्थित का भारतीयों में राष्ट्रवाद के विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका का निर्चाह किया , अनेक समाचार - पत्रो तथा साहित्य ने लोगों में राष्ट्रीय जागरण की भावना को जगाया , राजाराम मोहन राय ने सर्वप्रथम राष्ट्रीय प्रेस की नींव डाली तथा “ संवाद कौमुदी ” बंगला में तथा ’ मिरात उल अखबर फारसी में , का सम्पादन कर भारत में राजनैतिक जागरण की दिशा में प्रयास किया। इनके अतिरिक्त इण्डियन मिरर , बम्बई समाचार , दि हिन्दू , पैट्रियाट , अमृत बाजार पत्रिका , दि केसरी आदि समाचार - पत्रों का प्रभाव भी बहुत महत्वपूर्ण था।
राष्ट्रीय साहित्य का भी राष्ट्रीय भावना की उत्पत्ति की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान रहा। भारतेन्दु हरिशचन्द्र , प्रताप नारायण मिश्र , बाल कृष्ण भट्ट , बद्री नारायण चैधरी , दीन बन्धु मित्र , हेम चन्द्र बैनर्जी , नवीनचन्द्र सेन , बंकिम चन्द्र चटोपाध्याय तथा रविन्द्र नाथ ठाकुर की रचनाओं ने लोगों को काफी हद तक प्रभावित किया और लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तीव्र परिवहन तथा संचार साधनों में रेल , डाक - तार आदि के विकास ने भी राष्ट्रवाद की जड़ को मजबूत किया। इनके अतिरिक्त लार्ड लिटन के कार्यकाल में 1876 से 1884 तक बिना सोचे - समझे ब्रिटिश सरकार द्वारा कुछ ऐसे कार्य किए गए जिनसे राष्ट्रीय आन्दोलन को तीव्र गति प्राप्त हुई। 1877 में जब दक्षिण भारत के लोग अकाल से पीड़ित थे तो लिटिन ने ऐतिहासिक दिल्ली दरबार लगाया था।
1877 में भारतीयों को सार्वजनिक सम्पत्ति का गला घोटने के लिए प्रसिद्ध भारतीय प्रेस अधिनियम स्वीकार किया गया। भारतीयों और यूरोपियनों के बीच भेद - भाव पर आधारित शस्त्र अधिनियम भी इसी समय स्वीकार किया गया। अन्त में इल्बर्ट बिल ने भारतीयों के दिलों को पुनः जबरदस्त ठेस पंहुचाई तथा भारतीयों के अन्दर राष्ट्रीयता की भावना जगाने में एक बार फिर महत्वपुर्ण योगदान दिया।
निष्कर्ष : भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलनों के इतिहास का अवलोकन करने से पता चलता है कि इसको गति प्रदान करने में हमारे राष्ट्रवादी नेताओं महात्मा गांधी , नेहरू , अरविन्द्र गोश , सुभाष , भगत सिंह , लाला राजपत राय , दादा भाई नरोजी आदि के विचारों का अहमं योगदान रहा है। इनके विचारों ने भारतीय जन मानस को इस बात से अवगत कराया है कि हमारे शोषण व उत्पीड़न के लिए अंग्रेजी शासन व उसकी भेदभाव पूर्ण नीतियां पूर्णरूप से उत्तरदायी है। इसके अतिरिक्त तत्कालीन समय में राष्ट्रीय घटनाओं ने भारत में उग्रपंथी राष्ट्रवाद के विकास की जमीन तैयार कर दी और यह स्पष्ट हो गया कि अंग्रेज अजय नहीं है। यदि हम शोषण करने वाली सरकार से मुक्ति चाहते हैं तो हमें पूर्ण स्वराज्य की तरफ कदम बढ़ाने जरूरी है। ताकि भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन अन्तिम लक्ष्य तक पहुंच सके।
अर्थ- व्यवस्था और आजीविका:
आजीविका के सिद्धान्त:-
यहअर्थव्यवस्थाकी एक ऐसी स्थिति है जिसमें अनैच्छिक बेरोजगारी नहीं पाई जाती। लरनर के अनुसार, "पूर्ण रोजगार वह अवस्था है जिसमें वे सब लोग जो मजदूरी की वर्तमान दरों पर काम करने के योग्य तथा इच्छुक हैं, बिना किसी कठिनाई के काम प्राप्त कर लेते हैं।"
शहरीकरण एवं शहरी जीवन:
शहरी क्षेत्रों के भौतिक विस्तार (क्षेत्रफल, जनसंख्या आदि का विस्तार) शहरीकरण (urbanization) कहलाता है। यह एक वैश्विक परिवर्तन है। संयुक्त राष्ट्र संघ की परिभाषा के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का शहरों में जाकर रहना और काम करना भी 'शहरीकरण' है।
किसी राष्ट्र की जनसंख्या का बढ़ता हुआ आकार जब शहर की तरफ निवास के लिए जमा होता है तो उसे नगरीकरण या शहरीकरण कहते है।
व्यापार एवं भूमंडलीकरण:
भूमंडलीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था को संसार की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना है। वस्तुओं, सेवाओं, व्यक्तियों और सूचनाओं का राष्ट्रीय सीमाओं के आरपार स्वतंत्र रूप से संचरण ही वैश्वीकरण या भूमंडलीकरण कहलाता है।
प्रेस - संस्कृति:
यह मुद्रण कला समरकन्द पर्शिया मार्ग (सिल्क रूट) से यूरोप तक पहुँची। इसे यूरोप पहुँचाने वाला रोमन मिशनरी एवं मार्कोपोलो था। वहाँ इस कला का प्रयोग ताश एवं धार्मिक चित्र छापने के लिए किया गया, किन्तु रोमन लिपि में अक्षरों की संख्या कम थी। अतः लकड़ी तथा धातु के बने घुमावदार (moveable) टाइपों का प्रसार तेजी से हुआ।
लोकतंत्र में सत्ता की भागीदारी:
भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है। यहाँ के नागरिक सीधे मताधिकार के माध्यम से अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं। लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि एक सरकार को चुनते हैं। इस तरह से एक चुनी हुई सरकार रोजमर्रा का शासन चलाती है और नये नियम बनाती है या पुराने नियमों और कानूनों में संशोधन करती है।
किसी भी लोकतंत्र में हर प्रकार की राजनैतिक शक्ति का स्रोत प्रजा होती है। यह लोकतंत्र का एक मूलभूत सिद्धांत है। ऐसी शासन व्यवस्था में लोग स्वराज की संस्थाओं के माध्यम से अपने आप पर शासन करते हैं। एक समुचित लोकतांत्रिक सरकार में समाज के विविध समूहों और मतों को उचित सम्मान दिया जाता है। जन नीतियों के निर्माण में हर नागरिक की आवाज सुनी जाती है। इसलिए लोकतंत्र में यह जरूरी हो जाता है कि राजनैतिक सत्ता का बँटवारा अधिक से अधिक नागरिकों के बीच हो।
सत्ता की साझेदारी की आवश्यकता
समाज में सौहार्द्र और शांति बनाये रखने के लिये सत्ता की साझेदारी जरूरी है। इससे विभिन्न सामाजिक समूहों में टकराव को कम करने में मदद मिलती है।
किसी भी समाज में बहुसंख्यक के आतंक का खतरा बना रहता है। बहुसंख्यक का आतंक न केवल अल्पसंख्यक समूह को तबाह करता है बल्कि स्वयं को भी तबाह करता है। सत्ता की साझेदारी के माध्यम से बहुसंख्यक के आतंक से बचा जा सकता है।
लोगों की आवाज ही लोकतांत्रिक सरकार की नींव बनाती है। इसलिये यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र की आत्मा का सम्मान रखने के लिए सत्ता की साझेदारी जरूरी है।
सत्ता की साझेदारी के दो कारण होते हैं। एक है समझदारी भरा कारण और दूसरा है नैतिक कारण। सत्ता की साझेदारी का समझदारी भरा कारण है समाज में टकराव और बहुसंख्यक के आतंक को रोकना। सत्ता की साझेदारी का नैतिक कारण है लोकतंत्र की आत्मा को अक्षुण्ण रखना।
जातीय, लैंगिक एवं सांप्रदायिक विभेद का लोकतांत्रिक राजनीती पर प्रभाव:
लैंगिक आधार पर श्रम का विभाजन एक ऐसा कड़वा सच है जो हमारे घरों और समाज में आज भी दिखाई देता है। अधिकांश घरों में चूल्हा-चौका और साफ सफाई के काम महिलाओं द्वारा या उनकी देखरेख में नौकरों द्वारा किये जाते हैं। घर के बाहर के काम पुरुषों द्वारा किये जाते हैं। सार्वजनिक जीवन पर अक्सर पुरुषों का वर्चस्व रहता है। महिलाओं को घर की चारदीवारी के भीतर ही सिमट कर रहना पड़ता है।
नारीवादी आंदोलन: जो आंदोलन महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के उद्देश्य से किये जाते हैं उन्हें नारीवादी आंदोलन कहते हैं।
लेकिन हाल के वर्षों में लैंगिक मसलों को लेकर राजनैतिक गतिविधियाँ बढ़ गई हैं। इससे सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। भारत का समाज एक पितृ प्रधान समाज है। फिर भी आज महिलाएँ कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं।
अभी भी महिलाओं को कई तरह के भेदभावों का सामना करना पड़ता है। इसके कुछ उदाहरण नीचे दिये गये हैं:
पुरुषों की साक्षरता दर 76% है, जबकि महिलाओं की साक्षरता दर केवल 54% है।
ऊँचे पदों पर बहुत कम महिलाएँ देखने को मिलती हैं। कई जगह पर पुरुषों की तुलना में महिलाओं का वेतन कम होता है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं को प्रतिदिन अधिक घंटे काम करना पड़ता है।
आज भी ज्यादातर परिवारों में लड़कियों की तुलना में लड़कों को अधिक प्रश्रय दिया जाता है। कन्या भ्रूण हत्या के कई मामले सामने आते हैं। इसलिए भारत का लिंग अनुपात महिलाओं के पक्ष में बिलकुल नहीं है।
महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। ऐसी घटनाएँ घर में भी होती हैं और घर के बाहर भी होती हैं।
सत्ता में भागीदारी की कार्यप्रणाली:
राजनैतिक दल सत्ता में साझेदारी का सबसे जीवत स्वरूप है।लोकतंत्र में सरकार की साडी शक्ति किसी एक अंग में सिमित नही रहती बल्कि सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का बंटवारा होता है।
उदाहरण:
विधायिका,कार्यपालिका एवम न्यायपालिका एक ही स्तर पर अपनी-अपनी शक्तियों का प्रयोग करके सत्ता में साझेदारी बनते है।
संघात्मक शासन - व्यवस्था:
संघात्मक शासन वह शासन है जहाँ राज्य की शक्तियों का विभाजन संवैधानिक स्तर पर केन्द्र और उसकी घटक इकाइयों के बीच होता है। संघात्मक शासन प्रणाली उस शासन-प्रणाली को कहते है जिसमे कई छोटे राज्य मिलकर एक संघ के रूप मे शासन चलाते है। संघवाद एक विचारधारा है।
विद्वानों ने संघात्मक शासन की परिभाषा निम्म प्रकार की है--
डाससी के अनुसार " संघात्मक शासन वह राजनीतिक योजना है जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता तथा राज्यों के अधिकारों मे सामंजस्य स्थापित करना है।
फ्रीमेन के अनुसार " संघात्मक शासन वह है जो दूसरे राष्ट्रों के साथ सम्बन्ध मे एक राज्य के समान हो, परन्तु आन्तरिक शासन की दृष्टि से अनेक राज्यों का योग हो। संघात्मक शासन वाले देश, संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, और स्विट्जरलैंड आदि है।
संघात्मक शासन - व्यवस्था:
संघात्मक शासन वह शासन है जहाँ राज्य की शक्तियों का विभाजन संवैधानिक स्तर पर केन्द्र और उसकी घटक इकाइयों के बीच होता है। संघात्मक शासन प्रणाली उस शासन-प्रणाली को कहते है जिसमे कई छोटे राज्य मिलकर एक संघ के रूप मे शासन चलाते है। संघवाद एक विचारधारा है।
विद्वानों ने संघात्मक शासन की परिभाषा निम्म प्रकार की है--
डाससी के अनुसार " संघात्मक शासन वह राजनीतिक योजना है जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता तथा राज्यों के अधिकारों मे सामंजस्य स्थापित करना है।
फ्रीमेन के अनुसार " संघात्मक शासन वह है जो दूसरे राष्ट्रों के साथ सम्बन्ध मे एक राज्य के समान हो, परन्तु आन्तरिक शासन की दृष्टि से अनेक राज्यों का योग हो। संघात्मक शासन वाले देश, संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, और स्विट्जरलैंड आदि है।
बिहार में पंचायती राज:
24 अप्रैल 1993 भारत में पंचायती राज के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मार्गचिन्ह था क्योंकि इसी दिन संविधान (73वां संशोधन) अधिनियम, 1992 के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा हासिल हुआ और इस तरह महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के स्वप्न को वास्तविकता में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया गया था।
73वें संशोधन अधिनियम, 1992 में निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं:
एक त्रि-स्तरीय ढांचे की स्थापना (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति या मध्यवर्ती पंचायत तथा जिला पंचायत)
ग्राम स्तर पर ग्राम सभा की स्थापना
हर पांच साल में पंचायतों के नियमित चुनाव
अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण
महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों का आरक्षण
पंचायतों की निधियों में सुधार के लिए उपाय सुझाने हेतु राज्य वित्ता आयोगों का गठन
राज्य चुनाव आयोग का गठन
73वां संशोधन अधिनियम पंचायतों को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में काम करने हेतु आवश्यक शक्तियां और अधिकार प्रदान करने के लिए राज्य सरकार को अधिकार प्रदान करता है। ये शक्तियां और अधिकार इस प्रकार हो सकते हैं:
1)संविधान की गयारहवीं अनुसूची में सूचीबध्द 29 विषयों के संबंध में आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करना और उनका निष्पादन करना
2)कर, डयूटीज, टॉल, शुल्क आदि लगाने और उसे वसूल करने का पंचायतों को अधिकार
3)राज्यों द्वारा एकत्र करों, डयूटियों, टॉल और शुल्कों का पंचायतों को हस्तांतरण
लोकतांत्रिक जनसंघर्ष एवं आंदोलन:
राजनैतिक पार्टियाँ: जब कोई संगठन राजनैतिक प्रक्रिया में सीधे तौर पर भागीदारी करता है तो उसे राजनैतिक पार्टी कहते हैं। राजनैतिक पार्टियाँ सरकार बनाने के उद्देश्य से चुनाव लड़ती हैं।
दबाव समूह: जब कोई संगठन राजनैतिक प्रक्रिया में परोक्ष रूप से भागीदारी करता है तो उसे दबाव समूह कहते हैं। सरकार बनाना कभी भी किसी दबाव समूह का लक्ष्य नहीं होता है।
राजनीति पर दबाव समूह और आंदोलन का प्रभाव:
जन समर्थन: दबाव समूह और उनके आंदोलन अपने लक्ष्य प्राप्ति और क्रियाकलापों के लिये जनता का समर्थन जुटाने की कोशिश करते हैं। इसके लिये कई रास्ते अपनाये जाते हैं, जैसे कि जागरूकता अभियान, जनसभा, पेटीशन, आदि। कई बार ऐसे समूह मीडिया को भी प्रभावित करने की कोशिश करते हैं ताकि जनता का ध्यान खींचा जाये।
प्रदर्शन: प्रदर्शन एक आम तरीका है जिससे जनता, मीडिया और सरकार का ध्यान आकर्षित किया जाता है। प्रदर्शन के दौरान हड़ताल भी किये जाते हैं जिससे सरकार के कामकाज में बाधा उत्पन्न होती है। इससे सरकार पर दबाव बनाया जाता है ताकि सरकार उनकी मांग की सुनवाई करे।
लॉबी करना: कुछ दबाव समूह सरकारी तंत्र में लॉबी करने का काम भी करते हैं। इसके लिये अक्सर पेशेवर लॉबिस्ट की सेवा ली जाती है। इसके लिये इश्तहार भी लगाये जाते हैं। ऐसे समूहों के कुछ लोग आधिकारिक निकायों और कमेटियों में भी भाग लेते हैं ताकि सरकार को सलाह दे सकें। इस तरह के समूह के उदाहरण हैं: एसोचैम और नैसकॉम।
राजनैतिक पार्टियों पर प्रभाव: दबाव समूह कई बार राजनैतिक पार्टियों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर किसी दबाव समूह का एक खास राजनैतिक मत होता है। कई दबाव समूह तो किसी न किसी राजनैतिक पार्टी से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े रहते हैं। जैसे कई ट्रेड यूनियन और स्टूडेंट यूनियन किसी न किसी मुख्य पार्टी से सीधे तौर पर जुड़े रहते हैं।
कई बार एक जन आंदोलन से किसी राजनैतिक पार्टी का भी जन्म होता है। उदाहरण: असम गण परिषद, डीएमके, एआईडीएमके, आम आदमी पार्टी, आदि। 1980 के दशक में असम में गैर असमियों के खिलाफ चलने वाले छात्र आंदोलन के फलस्वरूप असम गण परिषद का जन्म हुआ था। 1930 और 1940 के दशक में दक्षिण भारत में चलने वाले समाज सुधार आंदोलन के फलस्वरूप डीएमके और एआईडीएमके का जन्म हुआ था। अभी हाल ही में सूचना के अधिकार और लोकपाल आंदोलन के फलस्वरूप आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ।
राजनितिक दल:
साधरण शब्दों में राजनीतिक दल एक ऐसा संगठन है जो सम्पूर्ण देश या समाज के व्यापक हित के सन्दर्भ में अपने सेवार्थियों के हितों को बढ़ावा देने के लिए निश्चित सिद्धान्तों, नीतियों और कार्यक्रम का समर्थन करता है और उन्हें कार्यान्वित करने के उद्देश्य से राजनीतिक शक्ति प्राप्त करना चाहता है।
राजनीतिक दल को अनेक विद्वानों ने निम्न प्रकार से परिभाषित किया है :-
मसलदान के अनुसार-”राजनीतिक दल उस स्वैच्छिक समूह को कहते हैं जो कुछ सामान्य राजनीतिक व सामाजिक सिद्धान्तों के आधार पर तथा कुछ समान्य लक्ष्यों और आदर्शों की पूर्ति के लिए शासन चलाने का प्रयत्न करता है तथा अपने सदस्यों को सत्तारूढ़ करने की चेष्टा करता है ओर उसके लिए चुनाव तथा अन्य साधनों का भी प्रयोग करता है।”
फ्रेडरिक के अनुसार-”एक राजनीतिक दल उन व्यक्तियों का समूह है जो अपने नेताओं के लिए शासकीय नियन्त्रण प्राप्त करने अथवा उसे बनाए रखने के उद्देश्यसे स्थायी रूप से संगठित होते हैं और आगे अनुशासित रहकर लाभ प्राप्त करने के प्रयास करते हैं।”
बर्क के अनुसार-”राजनीतिक दल मनुष्यों का एक समूह है जो कुछ निश्चित सिद्धान्तों के आधार पर जिनमें वे सहमत हैं, अपने सामूहिक प्रयत्नों से राष्ट्रीय हित को आगे बढ़ाने के लिए एकता में बंधे होते हैं।”
मैकाइवर के अनुसार-”राजनीतिक दल वह समुदाय है जिसका संगठन किसी विशेष सिद्धान्त या नीति के समर्थन के लिए हुआ हो और वह संविधानिक साधनों द्वारा सरकार बनाने के लिए इस सिद्धान्त या नीति का सहारा लेता हो।”
गिलक्राइस्ट के अनुसार-”राजनीतिक दल व्यक्तियों के उस समुदाय को कहते हैं जिसके सदस्यों के राजनीतिक विचार एक से होते हैं और जो एक राजनीतिक इकाई की तरह कार्य करके सरकार पर नियन्त्रण करने की चेष्टा करते हैं।”
मैक्स वेबर के अनुसार-”राजनीतिक दल स्वेच्छा से बनाया हुआ वह संगठन है जो शासन शक्ति को अपने हाथ में लेना चाहता है और इसको हस्तगत करने के लिए प्रचार तथा आन्दोलन का सहारा लेता है। इस शासन शक्ति को हाथ में लेने के पीछे एक ही उद्देश्य हो सकता है जो या तो वस्तुनिष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति है या व्यक्तिगत स्वार्थ या दोनों है।”
लोकतांत्रिक शासन - वयवस्था के परिणाम:
लोकतांत्रिक सरकार जनता के लिए उत्तरदायी होती है और नागरिकों की उम्मीदों और मांगों पर ध्यान देती है।
कई लोगों को ऐसा लगता है कि लोकतांत्रिक सरकार की तुलना में अलोकतांत्रिक सरकार अधिक कुशल होती है। लोकतांत्रिक सरकार में आम सहमति के बिना कोई फैसला नहीं लिया जाता है। इसलिए अहम फैसले लेने में देर लगती है। लेकिन अलोकतांत्रिक सरकार में फैसले तेजी से लिये जाते हैं क्यों आम सहमति बनाने की कोई जरूरत नहीं होती। लेकिन ऐसे फैसले अक्सर जनता को मंजूर नहीं होते हैं। हमें यह सोचने की भी जरूरत है कि क्या इस तरह के फैसले वास्तव में लोगों की समस्या दूर करते हैं।
1950 से 2000 तक के पचास वर्षों के आँकड़ों से पता चलता है कि तानाशाही शासन व्यवस्था में आर्थिक समृद्धि बेहतर हुई है। लेकिन दुनिया की आर्थिक शक्तियों में अधिकतर देशों में लोकतांत्रिक सरकार है। इसलिए हम कह सकते हैं कि सरकार का प्रारूप किसी देश की आर्थिक समृद्धि को निर्धारित करने वाला एकलौता कारक नहीं है। इसमें कई अन्य कारक भी शामिल होते हैं, जैसे: जनसंख्या, वैश्विक स्थिति, अन्य देशों से सहयोग, आर्थिक प्राथमिकताएँ, आदि। यदि आर्थिक संवृद्धि के साथ अन्य सकारात्मक पहलुओं को देखा जाए तो हम कह सकते हैं कि लोकतंत्र हमेशा ही तानाशाही से बेहतर होता है।
आज पूरी दुनिया में आर्थिक असमानता बढ़ रही है। भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे है। गरीबों और अमीरों की आय के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है। अधिकतर देशों में आर्थिक असमानता दूर करने में लोकतंत्र असफल रहा है।
लोकतंत्र की चुनौतियाँ:
चुनौती का मतलब: वैसी समस्या को चुनौती कहते हैं जो महत्वपूर्ण हो, जिससे पार पाया जा सके और जिसमें आगे बढ़ने के अवसर छुपे हों।
लोकतंत्र की मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं:
आधार तैयार करने की चुनौती
विस्तार की चुनौती
लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करना
आधार तैयार करने की चुनौती
आज भी विश्व के एक चौथाई हिस्से में लोकतंत्र नहीं है। इन इलाकों में आधार तैयार करना ही लोकतंत्र की चुनौती है। इन देशों से तानाशाही को हटाने की जरूरत है और वहाँ की सरकार पर से सेना के नियंत्रन को दूर करने की चुनौती है। इसे समझने के लिए नेपाल का उदाहरण लेते हैं। नेपाल में हाल हाल तक राजतंत्र हुआ करता था। लोगों के वर्षों लंबे आंदोलन के बाद नेपाल में लोकतांत्रिक सरकार ने राजतंत्र को हटा दिया। अभी नया होने के कारण नेपाल में लोकतंत्र का आधार बनाने की चुनौती है।
संसाधन, विकास और उपयोग:
प्राकृतिक संसाधन:-प्रकृति से प्राप्त और अधिक संशोधन के बिना उपयोग में लाए जाते हैं।जैसे-वायु,नदियों और झीलों का जल,मृदा और खनिज।
संसाधनों का वर्गीकरण उनके विकास एवं प्रयोग के स्तर,उद्गम,भंडार एवं वितरण के अनुसार किया जाता है।विकास और उपयोग के आधार पर संसाधनों को दो वर्गों में रखा जा सकता है-
वास्तविक संसाधन:-जिनकी मात्रा ज्ञात होती है।तथा जिनका उपयोग किया जा रहा है।जर्मनी के रूर प्रदेश में कोयला,पश्चिम एशिया में खनिज तेल,महाराष्ट्र में दक्कन पठार की काली मिट्टी.
संभाव्य संसाधन:-वे संसाधन जिनकी सम्पूर्ण मात्रा ज्ञात नहीं हो सकती है और इस समय पर्याप्त प्रौद्दोगिकी के अभाव में इनका प्रयोग नहीं किया जा रहा है।इनका उपयोग भविष्य में किया जा सकता है।जैसे-लद्दाख में पाया जाने वाला यूरेनियम।
200 वर्ष पूर्व तीव्र गति वाली पवनें एक संभाव्य संसाधन थी,परंतु आज वे वास्तविक संसाधन हैं। जैसे कि नीदरलैण्ड के पवन फार्मों में पवन-चक्की के प्रयोग से ऊर्जा उत्पन्न की जाती है।भारत में पवन फार्म तमिलनाडु के नगरकोइल तथा गुजरात के तट पर देखे जा सकते हैं।
उत्पत्ति के आधार पर संसाधनों को जैव और अजैव संसाधनों में बाँटते हैं।मृदा चट्टानें और खनिज जैसे निर्जीव वस्तुएँ अजैव जबकि पौधे और जंतु जैव संसाधन हैं।
नवीकरणीय संसाधनों में सौर और पवन ऊर्जा असीमित हैं,और उनपर मानवीय क्रियाओं का प्रभाव नहीं पड़ता है।परंतु जल,मृदा और वन का लापरवाही से किया गया उपयोग उनके भंडार को प्रभावित कर सकता है।जल असीमित नवीकरणीय संसाधन प्रतीत होता है,फिर भी जल की कमी और प्राकृतिक जल स्रोतों का सूखना आज विश्व के कई भागों के लिए एक बड़ी समस्या है।
अनवीकरणीय संसाधन का भंडार सीमित है।कोयला,पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस।
भूमि क्या है ?
पृथ्वी के पृष्ठ का कोई भाग जो जलाच्छादित नही हो, भूमि कहलाता है। भूमि का अभिप्राय धरातल से होता है जिसके संघटक मृदा, वनस्पति तथा भू-आकृति पृष्ठ लक्षण होते है। भूमि एक आर्थिक वस्तु है जिसका मूल्य होता है एवं इसका स्वामित्व क्रय-विक्रय किया जाता है तथा हस्तान्तरित किया जाता है। यह राष्ट्र की अमूल्य संपदा है। भूमि को क्षेत्रफल की इकाई में जैसे : एकड़, हैक्टेयर, बीघा अथवा नाली में मापा जाता है।
मृदा क्या है ?
मृदा पृथ्वी की ऊपरी परत है जो पौधों की वृद्धि के लिए प्राकृतिक माध्यम प्रदान करता है। पृथ्वी की यह ऊपरी परत खनिज कणों तथा जैवांश का एक संकुल मिश्रण है जो कई लाख वर्षो में निर्मित हुआ है तथा इसके बिना इस पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व असंभव है। भूमि के एक अभिन्न संद्यटक के रूप में मृदा जीवन समर्थक तंत्र का एक संघटक है।
भूमि की उपादेयता उसके मृदा की किस्म पर निर्भर है। इस कारण जनसाधारण भूमि तथा मृदा में कोई अंतर नही मानते किन्तु वैज्ञानिक मानते है। किसी वनस्पति विहीन भूमि पर आप मृदा को प्रथम दृष्टया देख सकते है किन्तु किसी सघन वन में इस प्रकार मृदा नही दिखती क्योंकि वहॉ गिरी हुई पत्तियों से मृदा पृष्ठ आच्छादित रहता है।
पौधों की वृद्धि को समर्थित करने के लिए मृदा एक क्रांतिक संसाधन है। विभिन्न खेतों की मृदाए उनकी उत्पत्ति तथा प्रबंधन के अनुसार दृष्य रूप, लक्षणों तथा उत्पादकता में भिन्न-भिन्न हो सकती है किन्तु वे सभी कृषि तथा खाद्य सुरक्षा, वानिकी, पर्यावरण सुरक्षा तथा जीवन की गुणवत्ता में समान महत्वपूर्ण कार्य संपन्न करती है।
जल संसाधन:
जल संसाधन जल के वे स्रोत हैं जो मनुष्यों के लिए उपयोगी होते हैं। अधिकांशतः लोगों को ताजे जल की आवश्यकता होती है। जल की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव है। जल एक अक्षय प्राकृतिक संसाधन है। एक अक्षय संसाधन वह संसाधन होता है जिसे बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से प्रतिस्थापित हो जाता है।
वन और वन्य प्राणी संसाधन:
हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं उस पर हमारे साथ-साथ अनेकों जीव और जंतु भी निवास करते हैं। जैसे सूक्ष्म-जीवाणुओं से लेकर जोंक तक छोटे-छोटे पौधों से लेकर बड़े वटवृक्ष तक, चूहे, गिलहरी से लेकर हाथी और हिप्पोपोटामस तक छोटे-छोटे मछलियों से लेकर बड़े-बड़े ब्लू व्हेल तक सभी पृथ्वी पर एक साथ रहते हैं। यह पूरा आवासीय स्थल जिस पर हम रहते हैं। वह अत्यधिक जैव- विविधताओं से भरा है।
जैव विविधता (Biodiversity):-
किसी प्राकृतिक प्रदेश में पायी जाने वाली जंगली तथा पालतू जीव-जंतुओं एवं पादपों की प्रजातियों की बहुलता को जैव विविधता कहते हैं।
जैव विविधता क्या है इन कुछ उदाहरणों से समझते हैं:-
एक पेड़ है जिसकी जाति आम है। और आम के कई प्रजातियां पाई जाती है जैसे दशहरी, अल्फासों, मालदा,लंगड़ा,चौसा इत्यादि। उसी प्रकार मछली में देखिए मछली एक प्रकार का जाति है या जीव है। इसमें कितने प्रजातियां है झींगा, कतला, रेहु, सार्क, व्हेल इत्यादि। इसी प्रकार हरेक पेड़-पौधे तथा जीव-जंतुओं की प्रजातियां पाई जाती है। जिस क्षेत्र में जितनी ही अधिक जीव तथा जीवों के प्रजातियां पाई जाएंगी, वहां जैव विविधता उतना ही बेहतर स्थिति में होगा।
खनिज संसाधन
खनिज: जो पदार्थ प्राकृतिक रूप में उपलब्ध है, और जिसकी एक निश्चित आंतरिक संरचना होती है उसे खनिज कहते हैं।
खनिजों के प्रकार
खनिज तीन प्रकार के होते हैं; धात्विक, अधात्विक और ऊर्जा खनिज।
धात्विक खनिज:
लौह धातु: लौह अयस्क, मैगनीज, निकेल, कोबाल्ट, आदि।
अलौह धातु: तांबा, लेड, टिन, बॉक्साइट, आदि।
बहुमूल्य खनिज: सोना, चाँदी, प्लैटिनम, आदि।
अधात्विक खनिज: अभ्रक, लवण, पोटाश, सल्फर, ग्रेनाइट, चूना पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर, आदि।
ऊर्जा खनिज: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस।
खनिज के भंडार:
आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में: इस प्रकार की चट्टानों में खनिजों के छोटे जमाव शिराओं के रूप में, और बड़े जमाव परत के रूप में पाये जाते हैं। जब खनिज पिघली हुई या गैसीय अवस्था में होती है तो खनिज का निर्माण आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में होता है। पिघली हुई या गैसीय अवस्था में खनिज दरारों से होते हुए भूमि की ऊपरी सतह तक पहुँच जाते हैं। उदाहरण: टिन, जस्ता, लेड, आदि।
अवसादी चट्टानों में: इस प्रकार की चट्टानों में खनिज परतों में पाये जाते है। उदाहरण: कोयला, लौह अयस्क, जिप्सम, पोटाश लवण और सोडियम लवण, आदि।
धरातलीय चट्टानों के अपघटन के द्वारा: जब अपरदन द्वारा शैलों के घुलनशील अवयव निकल जाते हैं तो बचे हुए अपशिष्ट में खनिज रह जाता है। बॉक्साइट का निर्माण इसी तरह से होता है।
जलोढ़ जमाव के रूप में: इस प्रकार से बनने वाले खनिज नदी के बहाव द्वारा लाये जाते हैं और जमा होते हैं। इस प्रकार के खनिज रेतीली घाटी की तली और पहाड़ियों के आधार में पाये जाते हैं। ऐसे में वो खनिज मिलते हैं जिनका अपरदन जल द्वारा नहीं होता है। उदाहरण: सोना, चाँदी, टिन, प्लैटिनम, आदि।
महासागर के जल में: समुद्र में पाये जाने वाले अधिकतर खनिज इतने विरल होते हैं कि इनका कोई आर्थिक महत्व नहीं होता है। लेकिन समुद्र के जल से साधारण नमक, मैग्नीशियम और ब्रोमीन निकाला जाता है।
ऊर्जा या सकती संसाधन:
सार्वजनिक बिजली की आपूर्ति करने वाला दुनिया का पहला शहर गॉडलिंग, इंग्लैंड था। 1881 में, एक कंपनी ने वाटरव्हील से जुड़ा एक जनरेटर स्थापित किया। उन्होंने गटर में केबल बिछाए और उन्हें स्ट्रीटलाइट्स से जोड़ा। इस समय से, बिजली की वैश्विक खपत तेजी से बढ़ी है।
जीवाश्म ईंधन जीवित चीजों के अवशेषों से निर्मित होते हैं और इन्हें बनने में लाखों साल लगते हैं। दुनिया के जीवाश्म ईंधन के भंडार कम चल रहे हैं, क्योंकि इनका उपयोग बहुत तेज़ गति से किया जा रहा है, क्योंकि ये बनाए जा रहे हैं। यद्यपि जीवाश्म ईंधन जलाना विद्युत प्रवाह उत्पन्न करने का एक सस्ता और विश्वसनीय स्रोत है, लेकिन इससे पैदा होने वाला कार्बन डाइऑक्साइड पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। पर्यावरण पर ग्रीनहाउस गैसों के प्रभावों के बारे में अधिक जानकारी के लिए ग्रीनहाउस प्रभाव और ग्लोबल वार्मिंग पर पाठ योजनाओं की जांच करें।
अर्थव्यवस्था क्या है?
अर्थव्यवस्था से हमारा अभिप्राय एक देश या क्षेत्र विशेष की उस व्यवस्था से है जिसके अंतर्गत मनुष्य की आवश्यकताओं की संतुष्टि से संबंधित उसके सभी आर्थिक क्रियाकलापो का संपादन होता है।
उपर्युक्त परिभाषा में दो महत्वपूर्ण तथ्य है -
१) क्षेत्र विशेष - ये क्षेत्र एक देश या राज्य भी हो सकता है। उदाहरण स्वरुप भारतीय अर्थव्यवस्था।
२) आर्थिक क्रियाकलाप - हमारी वे सभी क्रियाएं, जिनसे हमें आय प्राप्त होती है, आर्थिक क्रियाएं कहलाती है। उदाहरण स्वरुप यदि कोई व्यक्ति धन की प्राप्ति हेतु शिक्षण कार्य करता है तो यह आर्थिक क्रिया है, परंतु यदि वहीं व्यक्ति समाज सेवा के लिए पढ़ाता है तो यह आर्थिक क्रिया नहीं है।
अर्थव्यवस्था के प्रकार
संसाधनों के स्वामित्व के आधार पर अर्थव्यवस्था के प्रकार -
१) पूंजीवादी अर्थव्यवस्था -
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जहां उत्पादन के साधनों का स्वामित्व निजी व्यक्तियों के पास होता है जो इसका उपयोग अपने निजी लाभ के लिए करते हैं।
२) समाजवादी अर्थव्यवस्था -
समाजवादी अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जहां उत्पादन के साधनों का स्वामित्व एवं संचालन देश की सरकार के पास होता है जिसका उपयोग सामाजिक कल्याण के लिए किया जाता है। इस अर्थव्यवस्था का विकास पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के कारण ही हुआ।
३) मिश्रित अर्थव्यवस्था -
मिश्रित अर्थव्यवस्था पूंजीवादी तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था का मिश्रण है। मिश्रित अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जहां उत्पादन के साधनों का स्वामित्व सरकार तथा निजी व्यक्तियों के पास होता है।
भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था है।
आर्थिक विकास की दृष्टि से अर्थव्यवस्था दो प्रकार की होती है -
१) विकसित जैसे अमरीका
२) विकासशील जैसे भारत
अर्थव्यवस्था की संरचना या ढांचा
अर्थव्यवस्था की संरचना का मतलब विभिन्न उत्पादन क्षेत्रो में इसके विभाजन से है।
आर्थिक क्रियाओं के आधार पर अर्थव्यवस्था के तीन क्षेत्र होते हैं।
१) प्राथमिक क्षेत्र -
जब हम प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग करके किसी वस्तु का उत्पादन करते हैं तो इसे प्राथमिक क्षेत्र की गतिविधि कहते हैं। प्राथमिक क्षेत्र को कृषि क्षेत्र भी कहा जाता है। इसके अंतर्गत कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, जंगलों से वस्तुओं को प्राप्त करना जैसे व्यवसाय आते हैं।
२) द्वितीयक क्षेत्र -
द्वितीयक क्षेत्र के गतिविधियों के अंतर्गत प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण प्रणाली के तहत अन्य रूपों में परिवर्तित किया जाता है। चूंकि यह क्षेत्र क्रमशः संवर्धित विभिन्न प्रकार के उधोगों से जुड़ा है, इसलिए इसे औद्योगिक क्षेत्र भी कहा जाता है। इसके अंतर्गत खनिज व्यवसाय, निर्माण कार्य, जनोपयोगी सेवाएं, जैसे - गैस और बिजली आदि के उत्पादन आते है।
३) तृतीयक क्षेत्र -
ये गतिविधियां प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्र के विकास में सहायता प्रदान करतीं हैं। इसलिए इसे सेवा क्षेत्र भी कहा जाता है। इसके अंतर्गत बैंक एवं बिमा, परिवहन, संचार एवं व्यापार आदि क्रियाएं सम्मिलित होती है।
अर्थव्यवस्था का विकास
अर्थव्यवस्था का विकास दीर्घकालीन एवं निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। प्राय: अर्थव्यवस्था का विकास एवं संवृद्धि होती है, परंतु अनेक अवसरों पर इसका पतन भी होता है। उदाहरण के लिए ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था का पतन हुआ।
राज्य एवं राष्ट्र की आय:
आय : जब कोई व्यक्ति किसी प्रकार का शारीरिक अथवा मानसिक कार्य करता है और उस कार्य के बदले में जो परिश्रमिक मिलता है उसे उस व्यक्ति की आय कहते हैं।
गरीबी का कुचक्र: RAgnar Nurkse ने गरीबी के कुचक्र की धारणा को बतलाया था। गरीबी के कुचक्र का शिकार है। जिस कारण बिहार की प्रति व्यक्ति आय भी पूरे भारतवर्ष में न्यूनतम है।
प्रति व्यक्ति आय : निदेशालय के रिपोर्ट के अनुसार सन 2008-09 में प्रति व्यक्ति आय ₹25494 थी। जबकि बिहार का प्रति व्यक्ति आय सन 2005-6 में ₹6610 थी । बिहार के कुल 38 जिलों में सर्वाधिक प्रति व्यक्ति आय पटना एवं न्यूनतम प्रति व्यक्ति आय शिवहर जिले का था।
राष्ट्रीय आय: राष्ट्रीय आय का मतलब किसी देश में 1 वर्ष में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मूल्य से लगाया जाता है। दूसरे शब्दों में वर्ष भर में किसी देश में अर्जित आय की कुल मात्रा को राष्ट्रीय आय कहा जाता है।
सांख्यिकी विभाग: भारत में सांख्यिकी विभाग के अंतर्गत केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (Central Statistical Organization) राष्ट्रीय आय के आकलन के लिए उत्तरदाई है ।इस कार्य में राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (National Sample Survey Organization) केंद्रीय सांख्यिकी संगठन का सहायता करता है ।
सकल घरेलू उत्पाद: एक देश की सीमा के अंदर किसी भी दी गई समयअवधि प्राय: 1 वर्ष में उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं तथा सेवाओं को कुल बाजार या मौद्रिक मूल्य, उस देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) कहा जाता है।
प्रति व्यक्ति आय: न्याय में देश की कुल जनसंख्या से भाग देने पर जो भागफल आता है उसे प्रति व्यक्ति आय कहते हैं इसका आकलन निम्न प्रकार से की जाती है
प्रति व्यक्ति आय = राष्ट्रीय आय/ देश की कुल जनसंख्या
राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय : भारत की राष्ट्रीय आय काफी कम है तथा प्रति व्यक्ति आय का स्तर भी बहुत नीचे है। विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार 2007 ईस्वी में भारत की प्रति व्यक्ति आय अमेरिका के प्रति व्यक्ति आय का लगभग1/48 था। इसी प्रकार हम कुछ देशों के प्रति व्यक्ति आय को निम्न प्रकार से स्पष्ट करते हैं ।
अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय=$46040 (डॉलर)
इंग्लैंड में प्रति व्यक्ति आय= $42,740 40 (डॉलर)
चीन में प्रति व्यक्ति आय= $2307(डॉलर)
बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति आय= $870(डॉलर)
मुद्रा, बचत एवं साख:
विनिमय के स्वरूप-
1)वस्तु विनिमय प्रणाली तथा
2)मौद्रिक विनिमय प्रणाली
वस्तु विनिमय प्रणाली
वस्तु विनिमय प्रणाली उस प्रणाली को कहा जाता है जिसमें एक वस्तु के बदले में दूसरी वस्तु का आदान-प्रदान होता है । दूसरे शब्दों में, "किसी एक वस्तु का किसी दूसरी वस्तु के साथ बिना मुद्रा के प्रत्यक्ष रूप से लेनदेन वस्तु विनिमय प्रणाली कहलाता है"।
उदाहरण के लिए गेहूँ से चावल बदलना, सब्जी से तेल बदलना, दूध से दही बदलना आदि । यह प्रणाली पुराने जमाने में प्रचलित थी । व्यावहारिक रूप से इस प्रणाली में लोगों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
वस्तु विनिमय प्राणाली की कठिनाईयां
1. आवश्यकता के दोहरे संयोग का अभाव
2. मूल्य के सामान्य मापक का अभाव
3. मूल्य-संचय का अभाव
4. सह-विभाज़न का अभाव
5.भविष्य के भुगंतान की कठिनाई
6. मूल्य हस्तांतरण की समस्या
मौद्रिक विनिमय प्राणाली
किसी एक वस्तु का मुद्रा के साथ प्रत्यक्ष रूप से लेन देन वस्तु विनिमय प्राणाली कहलाता है।
हमारी वृतिय संस्थाएँ:
वितीय एवं अर्थव्यवस्था के संदर्भ में , उन संस्थाओ को वितीय संस्थाएं ( Financial institution ) कहते है । जो अपने ग्राहको एवं सदस्यो को वितीय सेवा देते रहे ।
वित्तीय संस्था
Explanation:
वित्तीय संस्थाएँ वे संस्थाएँ होती है जो वित्त की लेन देन का कार्य करती हैं।
ये दो प्रकार - संस्थागत और गैर संस्थागत हो सकती हैं।
सहकारी समितियाँ और बैंक संस्थागत शाखाएं हैं और गैर संस्थागत समितियाँ बैंक या सर्कार के साथ पंजीकृत नहीं होती हैं।
गैर संस्थागत समिति में साधारणतयः साहूकारों को गिना जाता हैं |
रोजगार एवं सेवाएँ:
रोजगार एवं सेवाएं का अभिप्राय यहाँ इस बात से है की जब व्यक्ति अपने परिश्रम एवं शिक्षा के आधार पर जीविकोपार्जन के लिए धन एकत्रित करता है जब एकत्रित धन को पूंजी के रूप में व्यववहार किया जाता है और उत्पादन के क्षेत्र में निवेश किया जाता है तो सेवा स्कूटर उत्पादन होता है। अतः रोजगार एवं सेवा एक पसरे के परस्पर सहयोगी है। आर्थिक प्रगति के कारण देश विकास के साथ सेवा क्षेत्र का विस्तार होता है जिसके फलस्वरूप लोगो के लिए रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होते है सेवा क्षेत्र के लिए विकास में शिक्षा की नितांत आवश्यकता है जिसके कारण लोग रोगजार पाने में सक्षम हो पाते है तथा हीन भावना से उठकर देश व राज्य के हिट में काम करना प्रांरभ करते है जिससे विकास का भाव परिलक्षित होता है।
वैशवीकरन:
वैश्वीकरण विभिन्न देशों के लोगों, कंपनियों और सरकारों के बीच बातचीत और एकीकरण की प्रक्रिया है। वैश्वीकरण में सम्पूर्ण विश्व को एक बाजार का रूप प्रदान किया जाता है। वैश्वीकरण से आशय विश्व अर्थव्यवस्था में आये खुलेपन, बढ़ती हुई अन्तनिर्भरता तथा आर्थिक एकीकरण के फैलाव से है।
इसके अंतर्गत विश्व बाजारों के मध्य पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है तथा व्यवसाय देश की सीमाओं को पार करके विश्वव्यापी रूप धारण कर लेता है । वैश्वीकरण के द्वारा ऐसे प्रयास किये जाते है कि विश्व के सभी देश व्यवसाय एवं उद्योग के क्षेत्र में एक-दूसरे के साथ सहयोग एवं समन्वय स्थापित करें।
वैश्वीकरण में सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव दोनों हैं। एक व्यक्तिगत स्तर पर, वैश्वीकरण जीवन के मानक और जीवन की गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है। व्यवसाय स्तर पर, वैश्वीकरण संगठन के उत्पाद जीवन चक्र और संगठन की बैलेंस शीट को प्रभावित करता है।
उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण:
1986 में 24 दिसंबर को राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण कानून लागू किया गया था। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है और उसे शोषण से बचाना है। 1991 तथा 1993 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में बदलाव किए गए। इसके बाद दिसंबर 2002 में व्यापक संशोधन किया गया और वर्ष 2003 में 15 मार्च से इसे लागू किया गया। राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 2000 से हुई है।
About the Poet
William Cowper's (1731-1800) poems show deep respect for the rural life, the common people, and the lovely, quiet landscape.
About the poet
Alexander Pope (1688-1744) is a great poet of the eighteenth century. This poem is an ode which means a meditative (thoughtful) lyric poem. It draws a beautiful picture of a happy man.
About the Poet:
Durga Prasad Panda is an Indian poet of English. He writes poems in Oriya and English.
About the poet
Vidyapati is a great poet of Maithili. He is known as 'Maithil Kokil! (Cuckoo of Mithila). This
the poem is an English translation of a Maithili poem by him.
About the poet
· Periasamy Thoran (1908 -87) is a Tamil writer.
About the poem
· The poem is about the cuckoo or the Koel.
· It presents the contrast between the Koel's appearance and its sweetness
About the poet
· Laxmi Prasad Devkota (1909-1959) was a renowned Nepali poet and story writer of his time.
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