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Techniques of Social Research / सामाजिक अनुसंधान की तकनीक
1 students

Techniques of Social Research / सामाजिक अनुसंधान की तकनीक

हिन्दी में समझना आसान है / Started from basics , easy to understand.
Created byAfroze Eqbal
Last updated 8/2022
Hindi

What you'll learn

  • Basic Concepts of Techniques of Social Research related to all topics discussed in easy way to understand, helpful for college students of BA/MA/NET.
  • सामाजिक अनुसंधान की प्रक्रिया व चरण ( Process or Steps of Sorial Research ) सामाजिक अनुसधान का विशषताए (Characteristics of Social Research )
  • सामाजिक अनुसंधान की प्रक्रिया व चरण ( Process or Steps of Sorial Research ) सामाजिक अनुसधान का विशषताए (Characteristics of Social Research )
  • वैज्ञानिक पद्धति की विशेषताएँ ( Characteristics of Scientific Method ) वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख चरण ( Main Steps in Scientific Method )
  • साक्षात्कार की विशेषताएँ ( Characteristics of Interview ) साक्षात्कार के उद्देश्य ( Aims or objectives or Purpose of Interview ) साक्षात्कार विधि के प्रमुख चरण
  • साक्षात्कार के प्रकार ( Types of Interview ) साक्षात्कार विधि का महत्त्व या गुण या लाभ या उपयोगिता ( Importance or Merits of Interview Method )
  • अवलोकन की विशेषताएँ ( Characteristics of observation ) अवलोकन विधि का महत्त्व या गुण ( Importance or Merits of Observation Method ) अवलोकन विधि की सीमाएँ
  • सामाजिक सर्वेक्षण की विशेषताएँ ( Characteristics of Social Survey ) सामाजिक सर्वेक्षण के उद्देश्य( Aims and Objectives of Social Survey )
  • क्षेत्र कार्य के प्रकार ( Types of Field Work )
  • अनुसूची की विशेषताएँ ( Characteristics of Schedule ) अनुसूची के उद्देश्य ( Objectives of Schedule ) अनुसूचियों का सम्पादन ( Editing of Schedules )
  • अनुसूची की विशेषताएँ ( Characteristics of Schedule ) अनुसूची के उद्देश्य ( Objectives of Schedule ) अनुसूचियों का सम्पादन ( Editing of Schedules )
  • एक अच्छी शोध अभिकल्प ( प्ररचना ) की विशेषताएँ ( Characteristics of a Good Research Design ) अनुसन्धान प्ररचना का वर्गीकरण या प्रकार ( Classifications or Types
  • तथ्यों या सूचना के प्रकार ( Types of Data or Information ) द्वितीय तथ्य या सूचनाएँ तथ्य ( Secondary Data or Information )
  • अच्छी प्रश्नावली की विशेषताएँ ( Features of aGood Questionnaire ) प्रश्नावली के प्रकार ( Types of Questionnaire ) प्रश्नावली की प्रकृति ( Nature of the Question

Course content

1 section14 lectures3h 55m total length
  • INTRODUCTION7:14


    विषय सूची


    1.सामाजिक अनुसंधान 8-20

    सामाजिक अनुसंधान की प्रक्रिया व चरण ( Process or Steps of Sorial Research )

    सामाजिक अनुसधान का विशषताए (Characteristics of Social Research )

    सामाजिक अनुसंधान के उद्देश्य ( Aims and objectives of Social Research )

    सामाजिक अनुसंधान तथा सर्वेक्षण में अन्तर ( Difference between Social Survey and Social Research )

    सामाजिक घटनाओं की प्रकृति ( Nature of Social Phenomena )

    सामाजिक घटनाओं की विशेषताएँ । ( Characteristics of the Nature of Social Phenomena )


    2.माजिक शोध में कठिनाइयाँ ( Difficulties in Social Research ) 21-34

    समाजशास्त्रीय अनुसन्धान में वस्तुनिष्ठता की समस्या ( Problem of Objectivity in Sociological Enquiry )

    वस्तुनिष्ठता की विशेषताएँ ( Characteristics of Objectivity )

    वस्तुनिष्ठता की आवश्यकता व महत्व ( Importance and Need of Objectivity )

    वस्तनिष्ठता की प्राप्ति में कठिनाइयाँ ( Difficulties in achieving Objectivity )

    वस्तुनिष्ठता प्राप्ति के साधन ( Means for achieving Objectivity )


    3.वैज्ञानिक पद्धति 35-42

    वैज्ञानिक पद्धति की विशेषताएँ ( Characteristics of Scientific Method )

    वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख चरण ( Main Steps in Scientific Method )


    4.साक्षात्कार 43-63

    साक्षात्कार की विशेषताएँ ( Characteristics of Interview )

    साक्षात्कार के उद्देश्य ( Aims or objectives or Purpose of Interview )

    साक्षात्कार विधि के प्रमुख चरण ( Main Steps of Interview Method OR

    साक्षात्कार की प्रक्रिया एवं तकनीक ( Process and Technique of Interview )

    साक्षात्कार के प्रकार ( Types of Interview )

    साक्षात्कार विधि का महत्त्व या गुण या लाभ या उपयोगिता ( Importance or Merits of Interview Method )

    साक्षात्कार के दोष या सीमाएं( Demerits or Limitations of Interview )

    वास्तविक साक्षात्कार का संचालन ( The Execution of Real Interview )

    साक्षात्कार निर्देशिका ( Interview Guide )


    5.अवलोकन 64-74

    अवलोकन की विशेषताएँ ( Characteristics of observation )

    अवलोकन विधि का महत्त्व या गुण ( Importance or Merits of Observation Method )

    अवलोकन विधि की सीमाएँ या दोष ( Limitations or Demerits of Observation Method )

    अवलोकन विधि के प्रकार ( Types of Observation Method )

    6.सामाजिक सर्वेक्षण ( SOCIAL SURVEY ) 75-84

    सामाजिक सर्वेक्षण की विशेषताएँ ( Characteristics of Social Survey )

    सामाजिक सर्वेक्षण के उद्देश्य( Aims and Objectives of Social Survey )

    सामाजिक सर्वेक्षण की उपयोगिता अथवा महत्व ( Utility or Importance of Social Survey )

    सामाजिक सर्वेक्षण की सीमाएँ ( Limitations of Social Survey )


    7.समाजशास्त्र में क्षेत्र – कार्य 85-88

    क्षेत्र कार्य के प्रकार ( Types of Field Work )

    8.अनुसूची 89-109

    अनुसूची की विशेषताएँ ( Characteristics of Schedule )

    अनुसूची के उद्देश्य ( Objectives of Schedule )

    अनुसूचियों का सम्पादन ( Editing of Schedules )

    अनुसूची निर्माण की प्रक्रिया ( Process of Schedule Preparing )

    अनुसूची की अन्तर्वस्तु ( Contents of a Schedue )

    अनुसूची निर्माण में सावधानियाँ ( Precautions for Preparing a Schedule )

    अनुसूची के प्रकार ( Types of Schedule )

    अनुसूची की उपयोगिता या गुण ( Utility or Merits of a Schedule )

    अनुसूची की सीमाएँ या दोष ( Limitations or Demerits of a Schedule )


    9.उपकल्पना 110-120

    एक अच्छी उपकल्पना या प्राक्कल्पना की विशेषताए ( Characteristics of a Good Hypothesis उपकल्पनाओं के प्रायाम या विमितियाँ ( Dimensions of Hypothesis )

    उपकल्पनाओं या प्राक्कल्पनाओं के प्रकार ( Types of Hypotheses )

    उपकल्पन के स्त्रोत ( Sources of Hypotheses )

    उपकल्पना का महत्त्व ( importance of Hypotheses)

    उपकल्पनाओं की सीमाएँ ( Limitations of Hypotheses )


    10.शोध अभिकल्प ( प्ररचना ) 121-134

    एक अच्छी शोध अभिकल्प ( प्ररचना ) की विशेषताएँ ( Characteristics of a Good Research Design )

    अनुसन्धान प्ररचना का वर्गीकरण या प्रकार ( Classifications or Types of Research Design )


    11.तथ्यों के प्राथमिक तथा द्वितीयक स्त्रोत 135-138

    तथ्यों या सूचना के प्रकार ( Types of Data or Information )

    द्वितीय तथ्य या सूचनाएँ तथ्य ( Secondary Data or Information )


    12.प्रश्नावलियां 139-151

    अच्छी प्रश्नावली की विशेषताएँ ( Features of aGood Questionnaire )

    प्रश्नावली के प्रकार ( Types of Questionnaire )

    प्रश्नावली की प्रकृति ( Nature of the Questionnaire )

    प्रश्नावली की विश्वसनीयता ( Reliability of Questionnaire )

    प्रश्नावली के निर्माण में सावधानियाँ Precautions in Constructing Questionnaire )


























    सामाजिक अनुसंधान

    ( SOCIAL RESEARCH )


    ' अनुसंधान शब्द का सामान्य प्रयोग वस्तुतः वैज्ञानिक अनुसंधान के सन्दर्भ में ही किया जाता है । जे . डब्ल्यू . बेस्ट ने ' रिसर्च इन एजकेशन ' में लिखा है कि " विश्लेषण की वैज्ञानिक विधि को अधिक आकारिक , व्यवस्थित एवं गहन रूप में प्रयोग करने को ही अनुसंधान कहा जाता है । " आगे बेस्ट लिखते हैं " एक व्यक्ति बिना अनुसंधान किए वैज्ञानिक हो सकता है परन्तु कोई भी व्यक्ति बिना वैज्ञानिक बने अनुसंधान नहीं कर सकता । " डॉ . सुरेन्द्र सिंह ने लिखा है ' अनुसंधान ' शब्द का व्युत्पत्तीय अर्थ ' बार - बार खोजने ' से सम्बन्धित है । " प्राग्ल भाषा का शब्द Research ( रिसर्च ) भी दो शब्दों से मिलकर बना है जो क्रमश : Re ( री ) एवं Search ( सर्च ) है । अतः प्रनुसंधान का आशय ' बार - बार की खोज ' या ' पुनः की जाने वाली खोज ' है । सामाजिक अनुसंधान एक वैज्ञानिक पद्धति है । इसके द्वारा सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में नवीन ज्ञान की प्राप्ति तथा विद्यमान ज्ञान में संशोधन होता है । घटनाओं के मल तक पहुँचने के लिए कार्य - कारण सम्बन्धों का पता लगाने का प्रयास किया जाता है । अनसंधान के सम्बन्ध में रेड मैन एवं मौरी ने लिखा है , " नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यवस्थित प्रयत्न को हम अनुसंधान कहते हैं । " अनुसंधान में सफलता मिल भी सकती है और नहीं भी मिल सकती । अनुसंधान की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है । इसके द्वारा प्राप्त ज्ञान से जरूरी नहीं है कि कुछ योगदान हो अथवा लाभ मिले । कहने का तात्पर्य यह है कि इससे प्राप्त ज्ञान से योगदान नहीं भी हो सकता है । किन्तु ज्ञान एवं समझ के निरन्तर प्रयास को ही अनुसंधान कहते हैं । मनुष्य आरम्भ से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति का रहा है । अपने आसपास के चीजों के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता है । अनुसंधान का सम्बन्ध वैज्ञानिक खोज से है । शाब्दिक रूप से ' अनुसंधान ' या Research का अर्थ है बार - बार खोज करना । सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में जब व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ढंग से खोज होता है तो उसे सामाजिक अनुसंधान कहते हैं । इसके सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने अपने - अपने विचार प्रकट किये हैं ।



    दि न्यू सेंचुरी डिक्शनरी ' के अनुसार , अनुसंधान का अर्थ किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के विषय में विशेष रूप से सावधानी के साथ खोज करना , तथ्यों अथवा सिद्धान्तों का अन्वेषण करने के लिए विषय सामग्री की निरन्तर सावधानी पूर्ण पूछताछ अथवा पड़ताल करना है ।


    मोजर के अनुसार , " सामाजिक घटनाओं एवं समस्याओं के सम्बन्ध में नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए किये गये व्यवस्थित खोज को सामाजिक अनुसंधान कहते हैं ।


    बोगार्डस ने परिभाषा देते हुए कहा है , " एक साथ रहनेवाले लोगों के जीवन में क्रियाशील अन्तर्निहित प्रक्रियाओं की खोज करना ही सामाजिक अनुसाधन है । "


    पी० वी० यंग ने सामाजिक अनुसंधान की परिभाषा देते हुए लिखा है , " सामाजिक अनुसंधान एक व्यवस्थित पद्धति है , जिसमें नवीन तथ्यों की खोज एवं पुराने तथ्यों की परीक्षा , उनके क्रमों , पारस्परिक सम्बन्धों , कार्य - कारण व्याख्या तथा उन प्राकृतिक नियमों का विश्लेषण करना होता है जिनसे वे संचालित होती हैं । "


    सामाजिक अनुसंधान के उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि यह एक व्यवस्थित पद्धति है जिसके द्वारा नवीन ज्ञान की प्राप्ति , प्राप्त ज्ञान में परिवर्तन एवं तथ्यों का सत्यापन होता है । इसके अन्तर्गत सामाजिक घटनाओं में कार्य - कारण सम्बन्ध , नियमबद्धता तथा पारस्परिक सम्बन्धों का पता लगाया जाता है ।






    सामाजिक अनुसंधान के प्रेरक तत्त्व

    ( Motivating Factors of Social Research )



    श्रीमती यंग ने सामाजिक अनुसंधान के चार प्रेरक तत्त्वों का वर्णन किया है

    ( 1 ) जिज्ञासा ( Curiosity ) — यंग के अनुसार , “ जिज्ञासा मानव मन का मौलिक गुण है तथा मनुष्य के पर्यावरण की खोज के लिए एक बहुत बड़ी चालक शक्ति है । " जबसे मनुष्य जन्म लेता है उसमें जानने की जिज्ञासा स्वाभाविक होती है । जब वह अपने को नवीन वातावरण में पाता है , नई परिस्थितियों से टकराता है और समुचित वातावरण के धेरे में घिरा रहता है तब नई चीज को समझने का प्रयास करता है । यही बात सामाजिक क्रियाओं और अनुसंधान के पीछे भी है ।


    ( 2 ) कार्य - कारण के सम्बन्धों का पता लगाने की इच्छा ( Desire to find out the relationships between cause and effect ) - मनुष्य में कार्य - कारण के सम्बन्ध का पता लगाने की तीव्र इच्छा होती है । समाज में यदि कोई घटना घटित

    होती है तो वह जन कारणों का पता लगाने की कोशिश करता है जिनके फलस्वरूप वह पहावा घटित हुई , उदाहरण के लिए जघन्य अपराध , चोरी , बलात्कार यादि । इन घटनाबों के पीछे कई कारण हो सकते हैं - जैसे चोरी का कारण गरीबी हो सकता है तो अपराधों के वीके सामाजिक वातावरण उत्तरदायी हो सकता है ।


    ( 3 ) नवीन परिस्थितियों का उत्पन्न होना ( The rise of new conditions ) - जीवन में नाना प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा होती है जिनके फलस्वरूप नवीन समस्याएँ खड़ी हो उठती है । एक समाज - शास्त्री इसके विवेचन एवं विश्लेषण में सक्रिय हो जाता है । वह समुदायों , संघों का अध्ययन करता है , उनकी आदतों और रिवाजों का गहराई से विश्लेषण करता है और अन्त में तथ्यों सहित प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है । इस प्रकार नवीन घटनाएँ और परिस्थितियाँ उसके अनुसंधान की पृष्ठभूमि बन जाती है ।


    ( 4 ) नवीन प्रणालियों की खोज तथा प्राचीन प्रणालियों को परीक्षा ( The discovery of new methods and the examination of old methods ) - - सामाजिक अनुसंधान के अन्तर्गत खोज के साधनों में बराबर अनुसंधान करने की पावश्यकता होती है । इससे अनुसंधान को अधिक शुद्ध एवं उपयोगी बनाया जा सकता है । ऐसा अनुसंधान मात्र सामाजिक घटनाओं का अनुसंधान न होकर सामाजिक अनुसंधान प्रणालियों का अनुसंधान होता है । इसकी अावश्यकता , समाज में उत्पन्न हुई नवीन समस्यायों और प्राधुनिक यंत्रों तथा साधनों की प्रगति के कारण है ।



    सामाजिक अनुसंधान की आधारभूत मान्यताएँ ( Basic Assumptions of Social Research )


    कार्य - कारण का सम्बन्ध ( Relationship of cause and effect ) सामाजिक अनुसंधान में यह मान कर चला जाता है कि सामाजिक घटनाओं के बीच कार्यकारण का सम्बन्ध है । यदि यह कार्य - कारण का सम्बन्ध स्थापित नहीं होता है तो सामाजिक घटनायों को नहीं समझा जा सकता । उदाहरण के लिए जहाँ । निर्धनता होगी वहाँ अपराध भी होंगे । अतः यदि अपराधों को दूर करना है तो सर्वप्रथम गरीबी को दूर करना होगा । यदि जनसंख्या वृद्धि के कारण अज्ञानता व अशिक्षा है तो लोगों को परिवार नियोजन का ज्ञान करवाना होगा , इसके , महत्त्व को समकाना होगा तभी जनसंख्या वृद्धि पर परिवार नियोजन के तरीकों द्वारा रोक लगाई जा सकेगी ।

    निष्पक्षता की सम्भावना ( Passibility of Impartialits ) - सामाजिक अनुसंधान में अनुसंधान कर्ता और विषय दोनों ही सम्मिलित हैं । किसी विषय का अध्ययन तभी सम्भव है जब अनुसंवानकर्ता निष्पक्ष होकर उसकी जानकारी करे । उसकी स्वयं की भावनाएं , पूर्व धारणाएं तथा व्यक्तिगत विचार अनुसंधान में परिलक्षित नहीं होने चाहिए । प्रायः देखा गया है कि अनुसंधानकर्ता अपने निरीक्षण और लेखन में तटस्थ होता है । वह वस्तुस्थिति का अवलोकन कर उसके विभिन्न पहलुमों की बारीकी से छानबीन कर , निर्णय पर पहुंचने की कोशिश



    सामाजिक घटनामों में क्रमबद्धता ( Sequence in Social Events ) - - सामाजिक घटनाएँ अनायास नहीं घटती हैं । इन घटनामों के पीछे निश्चित नियम माद्धता होती है । यदि उनमें ऐसा कोई क्रम न हो तो हम किसी भी प्रकार उनका पूर्वानुमान नहीं लगा सकते । यह कहना बिलकुल गलत होगा कि प्रत्येक घटना एक दूसरे से सर्वथा स्वतन्त्र और पथक है । जैसे ही क्रम का पता लगता है , हम काफी सही रूप में भविष्यवाणियाँ कर सकते हैं । ।


    आदर्श प्रतिरूपों की सम्भावना ( Possibility of Ideal type ) इसमें सामाजिक तथ्यों को आदर्श प्रति रूपों में बाँटा जा सकता है । इन आदर्श प्रतिरूपों के अन्तर्गत कुछ व्यक्तियों का अध्ययन कर उनकी विशेषताओं को समस्त वर्ग पर लागू किया जा सकता है । यदि हम मजदूर वर्ग , विद्यार्थी वर्ग या स्त्री वर्ग को लें तो हमें इन पृथक् - पृथक् वर्गों में उनकी रुचियों के सम्बन्ध मे , व्यवहार व विचारों के सम्बन्ध में काफी समानता एवं सामंजस्य मिलेगा । इस प्रकार एक औसत मजदूर या स्त्री का अध्ययन समस्त मजदूर समुदाय या स्त्री वर्ग के गुणों का ज्ञान करा सकता है ।


    निदर्शन की सम्भावना ( Possibility of Sample ) - प्रतिनिधित्व पर्ण सेम्पल पद्धति के आधार पर निष्कर्ष समग्र पर लागू किए जा सकते हैं । चूंकि मानव समुदाय विशाल है अतः प्रत्येक व्यक्ति का सूक्ष्म अध्ययन और जानकारी विस्तृत रूप में सम्भव नहीं है । निदर्शन प्रणाली के प्रयोग से अनुसंधान कार्य सुगम एवं शीघ्र हो पाता है ।



    सामाजिक अनुसंधान की प्रक्रिया व चरण

    ( Process or Steps of Sorial Research )


    सामाजिक अनुसन्धान की प्राजिम अचारणात्मक विवेचना इसको प्रकृति एवं प्रकार की विधिवत् व्याख्या के उपरान्त पब हम यह समझने का प्रयास करें कि एक सामाजिक अनुसन्धान को किय पर आयोजित किया जाता है । घनेक व्यक्ति जो अनुसन्धान की अवधारणा से परिनित होते हैं , लेकिन वे वस्तुतः सामाजिक अनुसन्धान की वैज्ञानिक प्रक्रिया से अनभिज्ञ ही होते हैं । अतः तथ्यों के संकलन , वर्गीकरण एवं विश्लेषण के रष्टिकोण से अनुसन्धानकर्ता को अनुसन्धान की प्रक्रिया की सम्पूर्ण जानकारी आवश्यक है । सामाजिक अनुसन्धान की प्रक्रिया अनेक चरास होकर गुजरती है एवं पग - पना विधानों ने इन विभिन्न चरणों का उल्लेख भी अलग - अलग ढंग से किया है ।

    पी . वी . यंग ने सामाजिक अनुसन्धान का प्रक्रिया का प्रमुख चरणों का उस्लेख किया है जो कि निम्नांकित है

    1 . अध्ययन - विषय का निश्चित रूप से सूचीकरण ,

    2 , कार्यकारी उपकल्पना का निर्माण ,

    3 . वैज्ञानिक प्रविधियों से समस्या का अन्वेषण एवं प्रबलोकन ,

    4 . तथ्यों का एकरूपता में पालेखन ,

    5 . पालेखित तथ्यों का श्रेणियों अथवा क्रमों में वर्गीकरण ,

    6 . वैज्ञानिक सामान्यीकरणों का निर्माण ।


    जॉर्ज नुवर्ग ने अपनी प्रमुख कृति ' सोशयल रिसर्च ' में अनुसन्धान की प्रक्रिया कचार चरणों की व्याख्या की जो कि निम्नलिखित


    1 . कार्यकारी उपकल्पना का निर्माण ,

    2 . तथ्यों का अवलोकन एवं संकलन ,

    3 . संकलित तथ्यों का वर्गीकरण एवं संगठन ,

    4 . सामान्यीकरण ।


    गिल बानर ने अपनी कृति ' इनवेस्टीगेशन प्रॉफ बिजनेस प्रोब्लम ' में सामाजिक अनुसन्धान के पांच मूल चरणों का उल्लेख किया है जो कि निम्नांकित है


    1 . समस्या की व्याख्या एवं अनुसन्धान को दिशा प्रदान करने हेतु कार्यकारी उपकल्पना का निर्माण

    , 2 . यथार्थ तथ्यों का संकलन ,

    3 . वर्गीकरण एवं सारणीकरण ,

    4 . निष्कर्ष निकालना ,

    5 . निष्कर्षों की परीक्षा ।



    नाणाणा पार . जी . फ्राँसिस के अनुसार सामाजिक अनुसन्धान के बारह प्रमुख चरण हैं जो कि निम्नलिखित हैं


    1 . समस्या क्षेत्र का चयन ,

    2 . उस अध्ययन क्षेत्र के बारे में नवीनतम सिद्धान्त तथा ज्ञान की जानकारी ,

    3 . समस्या की परिभाषा ,

    4 . प्राक्कल्पनाओं का निर्माण ,

    5 . औपचारिक तर्कों का निर्माण ,

    6 . तथ्यों के स्रोतों का सीमांकन ,

    7 . शोध के उपकरणों ( प्रश्नावली , मापन तथा आलेखन के तरीकों ) का निर्माण ,

    8 . कल्पित तर्कों का लेखन ,

    9 . शोध उपकरणों की पूर्व - जाँच तथा उनमें सम्भावित संशोधन ,

    10 . तथ्यों का व्यवस्थित रूप से संकलन ,

    11 . तथ्यों का विश्लेषण ,

    12 . प्राप्त किए गए निष्कर्षों को लिखना ।



    सामाजिक अनुसधान का विशषताए

    (Characteristics of Social Research )





    1-सामाजिक अनुसंधान एक निरन्तर चलनेवाली प्रक्रिया है । ज्ञान प्राप्त करने के लिए सदैव प्रयास चलता रहता है ।

    -2सामाजिक अनुसंधान की सफलता या असफलता से कोई सम्बन्ध नहीं होता ।

    3-सामाजिक अनुसंधान में वैज्ञानिक उपकरणों , प्रविधियों एवं पद्धतियों का सिर्फ उपयोग ही नहीं होता बल्कि नयी प्रविधियों के विकास पर भी जोर दिया जाता है ।

    4-सामाजिक अनुसंधान एक तरफ विशुद्ध ज्ञान - प्राप्ति पर जोर देता है तो दूसरी तरफ व्यावहारिक हल भी ढूँढने का प्रयास करता है ।

    5-सामाजिक अनुसंधान एक वैज्ञानकि विधि है ।

    6- इसके द्वारा सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में नवीन ज्ञान की प्राप्ति ही नहीं बल्कि प्राप्त ज्ञान का सत्यापन होता है ।

    7- यह विभिन्न सामाजिक घटनाओं या तथ्यों के बीच कार्य - कारण सम्बन्ध स्थापित करता है ।

    8-सामाजिक अनुसंधान के द्वारा उपकल्पना को सत्यापित किया जाता है ।

    9- इससे प्राप्त निष्कर्षों से नियमों अथवा सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता है ।








    सामाजिक अनुसंधान के उद्देश्य

    ( Aims and objectives of Social Research )




    सार्वभौमिक नियमों की खोज - सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य उन नियमों की खोज करना होता है जिनसे सामाजिक जीवन एवं सामजिक घटनाएँ नियमित एवं निर्देशित होती है । सामाजिक घटनाएँ भी स्वाभाविक नियमों पर आश्रित होती है । शोध के द्वारा इन नियमों को जानने का प्रयास होता है ।


    . सिद्धान्तों का विकास - सामाजिक अनुसंधान द्वारा प्राप्त तथ्यों के आधार पर वैज्ञानिक अवधारणाओं एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता है । व्यावहारिक उद्देश्य - इसका सम्बन्ध ज्ञान के उपयोग से होता है । पी . वी . यंग ने इस सन्दर्भ में लिखा है , “ अनुसंधान का तत्कालीन उद्देश्य सामाजिक व्यवहार को नियन्त्रित करना है । " सामाजिक अनुसंधान में ज्ञान प्राप्त करके इनके द्वारा समस्याओं के कारणो का पता लगाया जाता है ताकि उसे समाप्त किया जा सके ।


    व्यावहारिक एवं उपयोगितावादी दृष्टिकोण का तात्पर्य यह नहीं है कि सामाजिक अनुसंधान का सम्बन्ध विभिन्न सामाजिक समस्याओं से होता है । सामाजिक घटनाओं के बारे में ज्ञान - वृद्धि से इन पर नियंत्रण किया जा है या कल्याणकारी लक्ष्य भी प्राप्त किये जा सकते हैं ।

    सामाजिक अनुसंधान के व्यावहारिक एवं उपयोगितावादी उद्देश्य को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है


    समस्याओं का हल - सामाजिक अनुसंधान द्वारा समस्याओं के समाधान में सहायता मिलती है । ज्ञान - वृद्धि एवं कार्य - कारण सम्बन्धों के विश्लेषण से समस्या के हल का रास्ता निकलता है ।


    . सामाजिक विकास - सामाजिक अनुसंधान सामाजिक योजनाओं की रूपरेखा तैयार करता है जिसे सफलतापूर्वक लागू किया जा सके । सामाजिक विकास इस बात पर निर्भर करता है कि लोगों का सक्रिय सहयोग कितना होता है । इन सारी बातों की जानकारी अनुसंधान से प्राप्त होती है ।

    . प्रशासन कार्य में सहायता - मानव सम्बन्धों को बिना जाने प्रशासन कार्य चलाना कठिन होता है । सामाजिक अनुसंधान द्वारा प्रशासन सम्बन्धी विधियों का विकास किया जाता है । इससे प्रशासन के रास्ते में आनेवाली कठिनाइयों का पता चलता है । इस प्रकार सामाजिक अनसंधान प्रशासन कार्य में सहायता देता है ।


    सामाजिक घटनाओं पर नियंत्रण - सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में हमारा ज्ञान बहुत सीमित है । सीमित ज्ञान के आधार पर सामाजिक घटनाओं को नियंत्रित करना मश्किल काम है । अनुसंधान के द्वारा हमारे ज्ञान में • वृद्धि होती है जिससे सामाजिक घटनाओं पर नियंत्रण किया जा सकता है । इस प्रकार सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य सामाजिक घटनाओं पर नियंत्रण प्राप्त करना होता है ।


    . विकल्पों की खोज - सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य सही विकल्पों की खोज करना होता है । किसी भी कार्य को करने तथा समस्या को हल करने के तरीके होते हैं । इन तरीकों से अधिक कुशल और बेहतर तरीके को ढूँढने का काम सामाजिक अनुसंधान के द्वारा होता है । अतः , सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य सत्य विकल्पों की खोज करना है ।


    भविष्यवाणी में सहायक - भविष्यवाणी के द्वारा भविष्य में आनेवाली कठिनाइयों से सामना करना आसान होता है । सामाजिक अनुसंधान के द्वारा भविष्य के बारे में अनुमान किया जा सकता है । परिणामस्वरूप भविष्य में उत्पन्न होनेवाली बाधाओं से समायोजन स्थापित करने में सुविधा होती है ।





    नवीन ज्ञान की प्राप्ति - सामाजिक अनुसंधान का सबसे प्रमुख उद्देश्य सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना है । इसके अन्तर्गत विशुद्ध रूप से सामाजिक जीवन के बारे में नवीन तथ्यों पर प्रकाश डालना तथा सत्य की खोज करना होता है ।


    . सत्यापन एवं पुनः परीक्षण - सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य पुराने तथ्यों का सत्यापन तथा पुन : परीक्षण होता है । अर्थात् पहले से प्राप्त तथ्य वर्तमान स्थिति में ठीक उसी प्रकार हैं अथवा उनमें कोई परिवर्तन हुआ है इसकी जाँच सामाजिक अनुसंधान द्वारा होता है । इससे भ्रांति पैदा करनेवाले धारणाओं से छुटकारा मिलता है ।


    कार्य - कारण सम्बन्ध - सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य विभिन्न घटनाओं के बीच कार्य - कारण सम्बन्ध तथा प्रकार्यात्मक सम्बन्धों की खोज करना है । जब तक इस प्रकार के सम्बन्धों की जानकारी नहीं होती तब तक सामाजिक घटनाओं को नहीं समझा जा सकता ।









    सामाजिक अनुसंधान तथा सर्वेक्षण में अन्तर

    ( Difference between Social Survey and Social Research )


    सामाजिक अनुसंधान और सामाजिक सर्वेक्षण दोनों वैज्ञानिक पद्धति है । दोनों में समानता के साथ - साथ विभिन्नताएँ भी पायी जाती है । पहले दोनों में पायी जानेवाली समानताओं की चर्चा करेंगे ।


    सेमानताएँ ( Similarities ) :

    1 . सामाजिक अनुसंधान तथा सामाजिक सर्वेक्षण दोनों के द्वारा सामाजिक घटनाओं का अध्ययन होता है । दोनों अध्ययन की वैज्ञानिक पद्धति है जिसकी मुख्य विशेषता , अवलोकन , सत्यापन , वस्तनिष्ठता , विश्वसनीयता मक एवं सामान्यीकरण है । 3 . दोनों में नवीन तथ्यों की खोज की जाती है । इससे ज्ञान में वृद्धि होती है । 4 दोनों के द्वारा कार्य - कारण सम्बन्धों को जानने का प्रयास होता है । 5 . दोनों में समान अध्ययन प्रविधि जैसे ; साक्षात्कार , प्रश्नावली , अनुसूची , निदर्शन तथा अवलोकन का उपयोग होता है । 6 . दोनों में पुराने तथ्यों का सत्यापन होता है ।


    विभिन्नताएँ ( Differences )


    सामाजिक अनुसंधान तथा सर्वेक्षण में समान होने के साथ - साथ इनके बीच कुछ अन्तर भी है । कुछ प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं


    - सामाजिक अनुसंधान सैद्धान्तिक विषय पर जोर देता है । इसका सामाजिक सुधार एवं समस्याओं के समाधान एवं कल्याण से प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता । इसके विपरीत सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध सामाजिक समस्या , व्याधिशास्त्रीय परिस्थिति एवं उसके समाधान एवं कल्याण से होता है । इसके अन्तर्गत कारणों का विश्लेषण किया जाता है ताकि उनका समाधान हो सके ।

    - सामाजिक अनुसंधान दीर्घकालीन होता है । इसका सम्बन्ध क्षणिक अथवा वर्तमान समस्याओं से नहीं होता । सामाजिक सर्वेक्षण तत्कालिक होता है । यह समाज के अविलम्ब समस्याओं से सम्बन्धित होता है ।

    - सामाजिक अनुसंधान गहन एवं सूक्ष्म अध्ययन होता है जबकि सामाजिक सर्वेक्षण विस्तृत अध्ययन होता है । सामाजिक सर्वेक्षण में घटना को गहराई से नहीं देखा जाता

    - सामाजिक अनुसंधान से प्राप्त ज्ञान कल्याणकारी हो भी सकता है और नहीं भी इसका उपयोगिता से कोई सम्बन्ध नहीं होता । किन्तु सामाजिक सर्वेक्षण समाज कल्याण से सम्बन्धित होता है ।

    - सामाजिक अनुसंधान व्यक्तिगत रूप से सम्पन्न किये जाते हैं । सामाजिक सर्वेक्षण व्यक्ति के अलावे विभिन्न संगठनों तथा सरकारी विभागों द्वारा भी किया जाता है । कुछ संगठन व्यावसायिक रूप से सर्वेक्षण कार्य करते हैं ।

    - सामाजिक अनुसंधान दलीय कार्य ( Team work ) नहीं है । यह प्राय : व्यक्तिगत रूप से आयोजित किये जाते हैं । किन्तु सामाजिक सर्वेक्षण दलीय कार्य हैं । सामान्यतः यह अध्ययन दल द्वारा आयोजित किये जाते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि सामाजिक सर्वेक्षण सामूहिक एवं सहयोगी प्रयास है ।


    - सामाजिक अनुसंधान का अध्ययन क्षेत्र सामान्य होता है जबकि सर्वेक्षण का सम्बन्ध विशेष क्षेत्र से होता है । अनुसंधान सामान्य अमूर्त एवं सार्वभौमिक अवस्थाओं से सम्बन्धित होता है । दूसरी ओर सर्वेक्षण का सम्बन्ध विशिष्ट व्यक्तियों . स्थानों एवं अवस्थाओं से होता है ।

    - सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य शैक्षणिक एवं सैद्धान्तिक होता है जबकि सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य व्यावहारिक एवं उपयोगितावादी होता है । प्रायः सामाजिक अनुसंधान में नवीन ज्ञान हेतु तथ्य संकलित किये जाते हैं । इनका फायदा या नुकसान से कोई सम्बन्ध नहीं होता । किन्तु सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध व्यावहारिक लक्ष्य से होता है ।

    - सामाजिक अनुसंधान में घटना या समस्या से सम्बन्धित उपकल्पना का निर्माण अवश्य किया जाता है । किन्त सामाजिक सर्वेक्षण में उपकल्पना का निर्माण आवश्यक नहीं होता । इस सन्दर्भ में पार्क का कहना है कि सामाजिक सर्वेक्षण कभी भी उपकल्पना की परीक्षा नहीं करता बल्कि एक विशेष क्षेत्रों में विद्यमान समस्याओं का केवल विवेचना करता है । इस प्रकार दोनों के प्रकृति में अन्तर है ।





    सामाजिक घटनाओं की प्रकृति

    ( Nature of Social Phenomena )



    संसार में अनेक प्रकार की घटनाएँ घटित होती हैं । इन समस्त घटनाओं को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में रखा जा सकता है - प्राकृतिक घटनाएँ ( Natural Phenomena ) तथा सामाजिक घटनाएँ ( Social Phenomena ) । प्राकृतिक घटनाओं का नियन्त्रण प्रकृति के हाथों में रहता है । प्राकृतिक घटनाएँ भौतिक और स्थूत प्रकृति की होती हैं । इनका निरीक्षण और परीक्षण वैज्ञानिक पद्धति से किया जा सकता है । प्राकृतिक घटनाओं के विपरीत जो घटनाएँ होती हैं , वे सामाजिक घटनाएँ कहलाती हैं । इन घटनाओं का सम्बन्ध मानव से है और इन घटनाओं का कारण भी मानव ही है । मानवीय व्यवहार को नियन्त्रित करने में मनुष्य को अभी तक पूर्ण सफलता नहीं मिली है । समाजशास्त्री मानवीय व्यवहार को स्वयं भी समझ नहीं पाता है । इसीलिए समाजशास्त्री प्राकृतिक घटनाओं की तरह वैज्ञानिक पद्धति से सामाजिक घटनाओं का निरीक्षण - परीक्षण करके भविष्यवाणी करने में पूरी तरह से असमर्थ हैं । समाज का निरन्तर विकास व प्रगति हो रही है । लोगों की जीवन शैली और आचार - विचार बदल रहे हैं । साथ ही साथ सामाजिक घटनाओं में भी वृद्धि हो रही है । आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि सामाजिक घटना पर वैज्ञानिक पद्धति को कैसे लागू किया जाए और इन पर इस पद्धति का कैसे प्रयोग किया जाए । इस मौलिक समस्या के अध्ययन के लिए हमें सामाजिक घटनाओं की प्रकति तथा इसके प्रकारों का आलोचनात्मक विवेचन करना होगा । यहाँ यह जानना आवश्यक है कि सामाजिक घटना की प्रकृति क्या है ? इसकी कौन - कौन सी विशेषताएँ हैं ?


    कुछ विद्वानों का कथन है कि सामाजिक घटनाओं की अनोखी प्रकृति समाज - विज्ञान या समाजशास्त्र के लिए यथार्थ विज्ञान के रूप में विकसित होने के रास्ते में एक बहुत बड़ी बाधा है । इसका कारण यह है कि सामाजिक घटनाओं में पाई जाने वाली जटिलता , परिवर्तनशीलता , व्यक्तिनिष्ठता ( subjectivity ) आदि इसमें बाधक हैं । इन्हें लाँघना वैज्ञानिक पद्धति के लिए सम्भव नहीं होता । इसीलिए समाजशास्त्र के लिए यह भी सम्भव नहीं है कि वह यथार्थ सामाजिक नियमों का प्रतिपादन करे । इन भ्रान्त - धारणाओं के मुख्य स्रोत ( sources ) मुख्यतया दो हैं । पहला - सामाजिक घटनाओं की प्रकृति को तोड़ - मोड़कर देखने और उसकी प्रकृति पर नियन्त्रण पाने के सम्बन्ध में विज्ञान की शक्ति को न समझने की प्रवृत्ति ; और दूसरा - वैज्ञानिक नियम की वास्तविक प्रकृति को गलत समझना । सामाजिक घटनाओं में जटिलता , विविधता , व्यक्तिनिष्ठता आदि विशेषताएँ हैं , पर ये कोई ऐसी अड़चनें नहीं हैं कि जिन्हें विज्ञान कभी लाँघ ही नहीं सकता हो । समाज - विज्ञान एक प्रगतिशील विज्ञान है और अपनी प्रगति के साथ - साथ अड़चनों को दूर करना उसके लिए सरल होता जा रहा है । उसी प्रकार यह कहना भी गलत है कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति की विचित्रता के कारण यथार्थ वैज्ञानिक नियमों का प्रतिपादन सम्भव नहीं है । इस प्रकार की भ्रान्ति इस कारण होती है कि लोग वैज्ञानिक नियम की यथार्थ प्रकृति को ही नहीं समझते हैं । अक्सर सिद्धान्त और नियम को एक मानने की गलती हम कर बैठते हैं । वैज्ञानिक नियम के अर्थ के सम्बन्ध में एक और गलत धारणा यह है कि वैज्ञानिक नियम समस्त अवस्थाओं में ( under all conditions ) अनियन्त्रित व्यवहार का एक यथार्थ कथन ( an exact statement ) है । पर वास्तव में वैज्ञानिक नियम इस प्रकार का कुछ भी नहीं है । वैज्ञानिक नियम केवल यह बताता है कि कोई घटना वर्णित अवस्थाओं में ( under stated conditions ) किस प्रकार का व्यवहार करती है । सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में भी इस प्रकार का कथन या नियम सम्भव है । अतः स्पष्ट है कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति और वैज्ञानिक अध्ययन व नियम के बीच इस प्रकार का कोई सह - सम्बन्ध नहीं है कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति का विशिष्टताएँ वैज्ञानिक अध्ययन या वैज्ञानिक नियमों के प्रतिपादन में अनुल्लंघनीय बाधा की सृष्टि करती हैं या कर सकती हैं । इस विषय को और भी स्पष्ट रूप से समझना लिए सामाजिक घटनाओं की प्रकृति की विशेषताओं पर ध्यान देना होगा ।








  • CASE STUDY METHOD36:35
  • INTERVIEW14:20





    साक्षात्कार

    ( Interview )

    साक्षात्कार दो व्यक्तियों या अनेक व्यक्तियों के बीच संवाद और मौखिक प्रत्युत्तर है । इसमें सामाजिक सम्बन्ध दो व्यक्तियों में स्थापित होते हैं , एक अनुसन्धानकर्ता होता है तथा दूसरा सूचनादाता । सूचनादाता से अनुसन्धानकर्ता प्रश्नों को पूछकर तथ्य एकत्र करता है । जब ये प्रत्युत्तर कर्म विषयक अर्थ में मौखिक होते हैं तब वे अन्य कई कारकों द्वारा निर्धारित होते हैं जिनमें से कुछ कर्म - विषयक होते हैं और कुछ वैषयिक ।

    साक्षात्कार विधि का सामाजिक अनुसंधान एवं सर्वेक्षण में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । इसके माध्यम से जावली आदि से सामान्यतया सम्भव नहीं है । इसके जानकारी सम्भव हो पाती है जो अन्य विधियों - अवलोकन व प्रश्नावली आदि से सामान्यतया सामान व्यक्तियों के आन्तरिक विचारों को जानना संभव हो पाता है । फलस्वरूप यह अनेक गुणात्मक एवं प्राथमिक तथ्यों के संकलन का एक उपयोगी विधि माना जाता है ।

    " हैडर और लिडमैन ने भी साक्षात्कार पद्धति की व्याख्या करते हुए बतलाया कि साक्षात्कारकर्ता और उत्तरदाता में प्रश्न और उतर मौखिक होने के कारण कई कारक इसे प्रभावित करते हैं जिनमें उत्तरदाता का प्रभाव अधिक पड़ता है क्योंकि वह बार - बार वस्तुपरक से विषयपरक जानकारी देने लग जाता है ।


    एम . एन . बस के अनुसार , " साक्षात्कारकर्ता को व्यक्तियों के आमने - सामने किसी बिन्दु पर मिलने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है । " पी . वी . यंग ने साक्षात्कार पद्धति को ऐसी विधि बताया है जिसके द्वारा अपरिचित व्यक्ति के आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित तथ्य एकत्र करना सम्भव है । यंग की परिभाषा निम्नलिखित है " साक्षात्कार एक व्यवस्थित विधि मानी जा सकती है जिसके द्वारा एक व्यक्ति ( वैज्ञानिक ) दूसरे व्यक्ति के आन्तरिक जीवन में अधिक या कम कल्पनात्मक रूप में प्रवेश करता है जो उसके लिए सामान्यतया तुलनात्मक रूप से अपरिचित होता है । "


    यंग ने यह भी बताया है कि अनुसन्धानकर्ता कल्पनात्मक रूप से सूचनादाता के जीवन में प्रवेश करता है तथा उसके जीवन के भूत , वर्तमान तथा भविष्यकाल की सूचना एकत्र करता है ।


    वी . एम . पामर ने साक्षात्कार पद्धति को समझाते हुए लिखा है कि " साक्षात्कार दो व्यक्तियों के बीच एक सामाजिक परिस्थिति का निर्माण करता है जिसमें मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के लिए दोनों व्यक्ति पारस्परिक प्रत्युत्तर करते हैं । " पामर ने साक्षात्कार प्रणाली को समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से समझाते हुए लिखा है कि इसमें सामाजिक सम्बन्ध दो व्यक्तियों में स्थापित होते हैं , एक अनुसन्धानकर्ता होता है तथा दूसरा सूचनादाता । सूचनादाता से अनुसन्धानकर्ता प्रश्नों को पूछकर तथ्य एकत्र करता है ।



    विलियम जे० गुडे एवं पाल के० हट्ट ( William J . Goode and p KHatt ) ने लिखा है , " आधुनिक अनुसंधान में साक्षात्कार करना गुणात्मक साक्षात्कार का फिर से मूल्यांकन करने देत अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है । " . सामाजिक अनुसंधान में साक्षात्कार एक ऐसी व्यवस्थित विधि है जिसमें अनुसंधानकर्ता एवं सुचनादाता दोनों आमने - सामने के सम्बन्ध में होते हैं । अनुसंधानकर्ता प्रश्न करता है तथा सूचनादाता उत्तर देता है । अनुसंधानकर्ता का यह प्रयास रहता है कि सूचनादाता सदा घटना से सम्बन्धित विचारों को ही दें । इस प्रकार अनुसंधानकर्ता उत्तरदाता के आन्तरिक जीवन में प्रवेश कर घटना से सम्बन्धित तथ्यों की जानकारी प्राप्त करता है । इस रूप में , साक्षात्कार तथ्य संकलन की एक नियोजित विधि है । कुछ प्रमुख महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ निम्न हैं


    पी . वी . यंग ( P . V . Young ) ने साक्षात्कार की परिभाषा इस रूप में दी है , " साक्षात्कार एक व्यवस्थित विधि मानी जा सकती है जिसके द्वारा व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के आन्तरिक जीवन में अधिक या कम कल्पनात्मक रूप में प्रवेश करता है जो उसके लिए सामान्यतया तुलनात्मक रूप से अपरिचित होता है । " इस परिभाषा से स्पष्ट होता है - ( 1 ) साक्षात्कार एक व्यवस्थित विधि है । ( 2 ) इसमें एक व्यक्ति अनुसंधानकर्ता व दूसरे व्यक्ति सूचनादाता होते हैं । ( 3 ) अनुसंधानकर्ता सूचनादाता के जीवन में प्रवेश कर आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित तथ्य एकत्रित करता है । ( 4 ) इस रूप में साक्षात्कार एक गहन विधि है ।


    सिन पाओ यंग ( Hsin Pao Yang ) ने लिखा है , " साक्षात्कार क्षेत्रीय कार्य की एक प्रविधि है जिसका प्रयोग व्यक्ति या व्याक्तया के व्यवहार को देखने कथनों का लिखने तथा सामाजिक या सामहिक अन्त : क्रिया के वास्तविक परिणामा का निराक्षण करन क लिए किया जाता है । " इस कथन से पता चलता है - ( 1 ) साक्षात्कार तथ्य प्राप्ति की एक प्रविधि हा ( 2 ) इसम दो या अधिक व्यक्तियों का होना आवश्यक है जो परस्पर सम्पर्क वार्तालाप या अन्त : क्रिया करत ( 3 ) इस प्रविधि का उपयोग व्यवहारों को देखने कथनों को लिखने तथा अन्त : क्रियाओं के वास्तविक परिणामी का करने के लिए किया जाता है ।




    एन० के० डेंजिन ( N . K . Denzin ) के शब्दों में , " साक्षात्कार आमने - सामने की स्थिति में वर्तालाप विनिमय ह . जिसमें एक व्याक्त दूसर व्यक्ति से सूचना प्राप्त करता है । "इससे पता चलता है साक्षात्कार के लिए कम - से - कम दो व्यक्तियों में आमने - सामने की स्थिति हो । ( 2 ) इसमें एक व्यक्ति अनुसंधानकत्ती । होता है और दूसरा सूचनादाता । ( 3 ) साक्षात्कार सोहोश्य वार्तालाप है । ( 4 ) इसमें एक व्यक्ति ( अनुसंधानकर्ता ) दूसरे व्यक्ति ( सूचनादाता ) से सूचना संकलित करता है ।


    विलियम जे० गुडे एवं पाल के . हट्ट ( William LGoode and Paul K . Hatt ) के अनसार , " साक्षात्कार मौलिक रूप से सामाजिक अन्त : क्रिया की एक प्रक्रिया है । "इस पारभाषा से स्पष्ट होता है - ( 1 ) साक्षात्कार एक प्रक्रिया है । ( 2 ) इस प्रक्रिया के अन्तर्गत साक्षात्कारकर्ता एवं उत्तरदाता के बीच सामाजिक अन्त : क्रिया होती है । ( 3 ) यह अन्त : क्रिया उद्देश्यपूर्ण होती है ।


    एम० एन० बसु ( M . N . Basu ) के शब्दों में , " साक्षात्कार , किसी खास बिन्द पर कछ व्यक्तियों का आमने - सामने की स्थिति में , मिलन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है । " इस परिभाषा से स्पष्ट होता है - ( 1 ) साक्षात्कार दो या अधिक व्यक्तियों के बीच आमने - सामने की स्थिति में मिलना है । ( 2 ) इस मिलन का उद्देश्य किसी विषय के सन्दर्भ में सूचना प्राप्त करना होता है । ( 3 ) विशिष्ट तौर से विशिष्ट उद्देश्य हेतु यह एक प्रकार की औपचारिक वार्ता है । इस प्रकार उपरोक्त वर्णन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि साक्षात्कार एक ऐसी व्यवस्थित पद्धति है जिसमें साक्षात्कारकर्ता और उत्तरदाताओं के परस्पर आमने - सामने के सम्बन्ध किसी बिन्दु पर प्रश्नोत्तर करने के लिए स्थापित होते हैं । इस पद्धति के द्वारा अनुसन्धानकर्ता अपरिचित व्यक्ति के आन्तरिक जीवन में प्रवेश कर गुणात्मक तथ्यों को प्राप्त करता है । इस विधि में आमने - सामने की स्थिति होने के कारण अनुसन्धानकर्ता अवलोकन व अनुसूची के गुणों का लाभ ले लेता है । इस रूप में साक्षात्कार यथार्थ तथ्यों की प्राप्ति की एक उपयोगी विधि है ।


    साक्षात्कार की विशेषताएँ

    ( Characteristics of Interview )


    साक्षात्कार एक उद्देश्यपूर्ण तथा व्यवस्थित वार्तालाप है , जिसके अन्तर्गत अनुसंधान उद्देश्यों के अनुसार तथ्य , विश्वास , मनोवृत्ति , अनुभव एवं विचारों से सम्बद्ध सूचनाएं उत्तरदाता से प्राप्त करता है । इस रूप में साक्षात्कार विधि की निम्न विशेषताए बनती हैं

    -. साक्षात्कार विधि में दो पक्ष होते हैं । एक पक्ष होता है अनुसंधानकर्ता का , जो साक्षात्कारी की भूमिका में होते हैं । दूसरे पक्ष में एक या एक से अधिक उत्तरदाता होते हैं । इस प्रकार द्विपक्षीय स्थिति में साक्षात्कार की प्रक्रिया सम्पन्न होती है ।


    .- साक्षात्कार विधि में दोनों पक्षों के बीच एक विशेष सम्बन्ध होता है , जिसमें आमने - सामने के प्राथमिक सम्बन्ध पाए जाते हैं । इस विधि की आदर्श स्थिति यही है कि साक्षात्कारकर्ता और उत्तरदाता के बीच परस्पर विश्वास तथा जानकारी पूर्ण रूप में हो । परस्पर विश्वास से ही विश्वसनीय तथ्य प्राप्त होते हैं ।


    - साक्षात्कार की एक खास विशेषता उद्देश्य का होना है । अनुसंधान विषय से सम्बन्धित तथ्यों का संकलन ही इसका उद्देश्य होता है । साक्षात्कार अनुसूची का उपयोग इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है । साक्षात्कारकर्ता अपने उद्देश्य को सर्वदा अपने सामने रखता है ।


    - साक्षात्कार के द्वारा न केवल मौखिक रूप से सूचनाओं की जानकारी प्राप्त होती है , बल्कि यह विधि घटनाओं के अवलोकन का भी अवसर प्रदान करता है । इस प्रकार इस विधि में अवलोकन विधि का भी लाभ मिल जाता है ।


    .- साक्षात्कार एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भी है । इसके माध्यम से अनुसंधानकर्ता उत्तरदाता से अधिक गहन एवं आंतरिक सचनाएँ प्राप्त कर सकता है । साक्षात्कार द्वारा ऐसे तथ्यों का संकलन किया जाता है जो कई बार अनुसंधान की अन्य विधियों द्वारा उपलब्ध नहीं होते ।


    - साक्षात्कार विधि का प्रयोग कभी - कभी अन्य विधियों की एक सहायक विधि के रूप में भी किया जाता है । जैसे - अवलोकन विधि में इसका प्रयोग एक पूरक विधि के रूप में किया जा सकता है । एक सहायक विधि के रूप में साक्षात्कार का उद्देश्य अन्य विधियों से प्राप्त तथ्यों का संयोजन करना एवं उनकी प्रामाणिकता की जाँच करना होता है ।







    साक्षात्कार के उद्देश्य

    ( Aims or objectives or Purpose of Interview )


    । सामाजिक अनुसंधान में एक विधि के रूप में साक्षात्कार के उद्देश्यों पर विभिन्न विद्वानों ने अपने राय व्यक्त किरा है । लुण्डबर्ग ( Lundberg ) ने साक्षात्कार के दो मूल उद्देश्य बताए हैं –

    ( 1 ) तथ्य - संकलन और ( 2 ) उत्तरदाता के जीवन के भावात्मक पक्षों का अध्ययन ।

    मैकोबी एवं मैकोबी ( Maccoby and Maccoby ) ने तीन उद्देश्यों का उल्लेख किया है - ( 1 ) प्राक्कल्पना की जाँच , ( 2 ) तथ्य संकलन और ( 3 ) अन्य स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं का सत्यापन ।

    यंग ( Yound ) ने साक्षात्कार के चार उद्देश्य बताए है — ( 1 ) उत्तरदाता के व्यक्तित्व सम्बन्धी सूचना प्राप्त करना , ( 2 ) प्राक्कल्पना का निर्माण , ( 3 ) वैयक्तिक सूचना प्राप्त करना और ( 4 ) द्वितीयक तथ्यों का संकलन । ब्लैक एवं चैंपियन ( Black and Champion ) के अनुसार दो उद्देश्य बतलाए गए हैं - ( i ) विषय का विवरण देना और ( i ) अन्वेषण करना । विभिन्न विद्वानों की राय के आधार पर साक्षात्कार के मल उद्देश्यों को निम्नांकित रूप में समझा जा सकता है


    आमने - सामने के सम्पर्क द्वारा सचना प्राप्त करना ( Receiving Information Through Face To Face Contact ) : साक्षात्कार का प्रथम उद्देश्य आमने - सामने के सम्पर्क के माध्यम से सूचना एकत्र करना ही इस विधि मदा या दो से अधिक व्यक्ति आमने - सामने का सम्बन्ध स्थापित करते हैं । फिर खलकर वार्तालाप करते हैं । अनुसंधानकर्ता उत्तरदाता को सचना देने के लिए प्रेरित करता है । इस प्रकार के सम्पर्क के फलस्वरूप उत्तरदाता को आन्तरिक भावना , संवेगों व धारणाओं आदि के बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।

    प्राक्कल्पनाओं का स्रोत ( Source of Hypothesis ) : साक्षात्कार से अनसंधानकर्ता को विभिन्न व्यक्तिया के विचारों , भावनाओं व मनोवृत्तियों आदि के बारे में जानकारी मिलती है । इससे व्यक्तिगत व सामहिक जीवन के बहुमूल्य पहलुओं का ज्ञान होता है । इस ज्ञान के आधार पर कई नई प्राक्कल्पनाओं का निर्माण करने में सफल होता है ।

    गुणात्मक तथ्यों का संकलन ( Collection of Qualitative Facts ) : सामाजिक तथ्य मूल रूप से गुणात्मक होते हैं जो विचार , भावना व लोकविश्वास आदि के रूप में फैले होते हैं । ये व्यक्तिगत भी हो सकते हैं और सामूहिक भी । इसे साक्षात्कार विधि के द्वारा ही संकलित किया जा सकता है । क्योंकि अनुसंधानकर्ता अपनी उपस्थिति के कारण उत्तरदाता को सूचना देने के लिए प्रेरित करता है ।

    अवलोकन का अवसर ( Opportunity for Observation ) : साक्षात्कार का उद्देश्य अवलोकन का भी अवसर प्रदान करना है । जब अध्ययनकर्ता किसी व्यक्ति के पास साक्षात्कार के लिए पहुँचता है तो वह न केवल साक्षात्कार ही लेता है , बल्कि सूचनादाता के हाव - भाव का अवलोकन भी करता रहता है ।

    वर्णनात्मक उद्देश्य ( Descriptive Purpose ) : साक्षात्कार का प्रमुख उद्देश्य समस्या एवं विषय से सम्बन्धित प्राथमिक तथ्यों का संकलन करना है । इसके आधार पर विषय का विवरण प्रस्तुत किया जाता है । इसके लिए साक्षात्कार द्वारा वैयक्तिक आंकड़े , पृष्ठभूमि सम्बन्धी सूचनाएँ , व्यक्ति के जीवन का अंदरूनी तथ्य तथा राग - द्वेष आदि , सूचनाएं संकलित की जाती हैं ताकि समस्या व विषय के विभिन्न पक्षों का वर्णन किया जा सके ।

    सहायक या पूरक विधि ( Supplementary Method ) : साक्षात्कार विधि का प्रयोग कभी - कभी अन्य विधियों की एक सहायक विधि के रूप में भी किया जाता है । एक सहायक विधि के रूप में साक्षात्कार का उद्देश्य अन्य विधियों से प्राप्त सामग्री का संयोजन करना तथा उनकी प्रामाणिकता की जाँच करना होता है ।

    सत्यापन ( Verification ) : साक्षात्कार का उद्देश्य सत्यापन है । साक्षात्कार का प्रयोग अन्य स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं के सत्यापन के लिए भी किया जाता है ।


















    साक्षात्कार विधि के प्रमुख चरण

    ( Main Steps of Interview Method )

    OR

    साक्षात्कार की प्रक्रिया एवं तकनीक

    ( Process and Technique of Interview )


    साक्षात्कार सम्पन्न करना एक कला है । इसके संचालन के लिए बहुत सावधानी और सतर्कता की आवश्यकता रहती है । इसके परिणामों को विश्वसनीय एवं उपयोगी बनाने के लिए , इसे ' विधिवत् योजना बना कर संगठित किया जाना चाहिए । इसे वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने के लिए समय - समय पर प्रयत्न किए जाते रहे हैं । इस पर काफी साहित्य भी लिखा जा चुका है । साक्षात्कार पद्धति पर लिखने बालों में हर्बर्ट हाइमन ( Herbert Hyman ) , बिंघम , वाल्टर एवं मूर ( Binghom Waiter and Moore ) , प्रोल्डफील्ड आदि प्रसुख हैं । इन सुप्रसिद्ध लेखकों से साक्षात्कार कैसे संचालित किया जाता है , साक्षात्कार का मनोविज्ञान , सामाजिक अनुसंधान में साक्षात्कार आदि विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला है । साक्षात्कार की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए इसे निश्चित चरणों पर संचालित किया जाता है , वे इस प्रकार हैं


    1. साक्षात्कार की तैयारी ( Preparation of Interview ) : साक्षात्कार करने के पूर्व साक्षात्कार का समस्त प्राप्रापा पर विचार किया जाना आवश्यक है । इस सन्दर्भ में चार बातें महत्त्वपूर्ण हैं –

    1 समस्या की प्रारंभिक खाज - जस विषय पर साक्षात्कार करना है , उस विषय के सभी पक्षों पर पर्याप्त चिंतन कर लें ।

    2.साक्षात्कार यत्र का निमाण - प्रारामक जानकारी के बाद अध्ययनकर्ता को साक्षात्कार यंत्र का निर्माण करना होता है । ये यंत्र मुख्यत : दो प्रकार के होत ह ( अ ) साक्षात्कार अनुसूची और ( ब ) साक्षात्कार निर्देशिका । कौन या यंत्र कहाँ प्रयोग किया जाएगा , यह साक्षात्कार विधि के चनाव पर निर्भर करता है । प्रायः साक्षात्कार अनसची का प्रयोग संरचित साक्षात्कार में किया जाता है और साक्षात्कार निर्देशिका का प्रयोग असरचित साक्षात्कार में किया जाता है ।

    साक्षात्कारदाताओं का चयन - अध्ययनकत्ती का उन व्यक्तियों के बारे में खोज करना होता है जिनसे उसे साक्षात्कार करना है । साक्षात्कारदाता के बारे में पर्याप्त जानकारी प्राप्त करना आवश्यक होता है । साक्षात्कारदाता की प्रकृति , व्यवसाय , दिनचर्या , सांस्कृतिक विशेषताओं की जानकारी मिल जाने से साक्षात्कार के संचालन में विशेष सुविधा हो जाती है ।

    समय व स्थान का निर्धारण - साक्षात्कारदाता से टेलीफोन या स्वयं सम्पर्क के माध्यम से समय व स्थान का निर्धारण कर लेना है ।


    ( 2 ) साक्षात्कार का मुख्य भाग ( Main Part of Interview ) : साक्षात्कार की सम्पूर्ण प्रक्रिया में यह भाग सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है । इसलिए इस स्तर को साक्षात्कार का मुख्य भाग कहा जाता है । इसके अन्तर्गत आते हैं –

    ( 1 ) सम्पर्क स्थापना - पूर्व निर्धारित समय व स्थान पर साक्षात्कार के लिए साक्षात्कारकर्ता पहंचता है । उसकी पोशाक सौम्य व गम्भार होनी चाहिए । उचित अभिवादन के साथ अपना परिचय देना चाहिए ।

    ( I ) उद्देश्य का स्पष्टीकरण - साक्षात्कारकत्तो का सम्पर्क स्थापना के बाद साक्षात्कार के उद्देश्य को समझाना चाहिए । ताकि साक्षात्कारदाता को साक्षात्कार के प्रति कोई सन्देह न उत्पन्न होने पाए ।

    ( II ) सहयोग की प्रार्थना - उद्देश्य के स्पष्टीकरण के बाद साक्षात्कारदाता से सहयोग की प्रार्थना की जानी चाहिए । उसे इस बात का आश्वासन दिया जाना चाहिए कि उनके द्वारा बताई गई जानकारी को पूर्णतया गुप्त रखा जाएगा ।

    ( IV ) प्रश्न पूछना - साक्षात्कार का प्रारंभ सरल व सामान्य प्रश्नों से किया जाना चाहिए । गम्भीर व व्यक्तिगत प्रश्नों को बाद में पूछा जाना चाहिए । दोहरे व बहुअर्थक प्रश्नों के प्रयोग से बचना चाहिए ।

    ( V ) सहानुभूतिपूर्वक सुनना – साक्षात्कारदाता जो कुछ बतलाना चाहे उसको बड़े धैर्य व सहानुभूति से सुनना चाहिए । यदि साक्षात्कारदाता मूल विषय से बहक जाए तो बड़ी सावधानी से उसे अपने विषय पर लाना चाहिए ।

    ( VI ) प्रोत्साहन - साक्षात्कारदाता को बीच - बीच में कुछ प्रेरक वाक्यों से प्रभावित किए जाने चाहिए । जैसे - आपने तो बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात बताई है , आप कई नई तथ्यों को प्रकाश में लाए हैं . आदि - आदि ।

    ( VII साक्षात्कार का नियंत्रण एवं प्रमाणीकरण - साक्षात्कार को नियंत्रित करने से तात्पर्य यह है कि इस बात का ध्यान रखा जाए कि साक्षात्कारदाता गलत उत्तर व विरोधी बातें आदि न बतला सकें । ऐसा करने से साक्षात्कार प्रमाणीकृत व मानव स्तर का हो जाता है ।


    ( 3 ) साक्षात्कार की समाप्ति ( Closing of Interview ) : साक्षात्कार की समाप्ति मधुर वातावरण में होनी चाहिए । साक्षात्कारदाता साक्षात्कार के क्रम प्रसन्नता का अनुभव करे । यदि भविष्य में पुनः साक्षात्कार करना आवश्यक हो तो मूल साक्षात्कार उस समय बन्द करना चाहिए जबकि किसी महत्त्वपूर्ण बात पर वार्तालाप करना शेष रहा हो , ताकि अगले साक्षात्कार में वहीं से आरंभ किया जा सके । साक्षात्कार की समाप्ति पर उत्तरदाता के प्रति कृतज्ञता को अवश्य प्रकट किया जाना चाहिए ।


    ( 4 ) आलेखन ( Recording ) : संरचित साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता सूचनाओं को तत्काल अनुसूची में लिखता जाता है । असंरचित साक्षात्कार में सूचनाओं को संक्षेप में नोट किया जा सकता है । इस संदर्भ में संकेत लिपि का ज्ञान महत्त्वपूर्ण है । आजकल वैज्ञानिक उपकरणों - टेपरिकार्डर का उपयोग होने लगा है । साक्षात्कारकर्ता को उत्तरदाता के उत्तरों को अपने प्रतिवेदन में बिल्कुल उसी रूप में देने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए । उसे सदैव यह प्रयत्नशील रहना चाहिए कि प्रतिवेदन सत्य एवं पक्षपातरहित हो ।







    साक्षात्कार के प्रकार

    ( Types of Interview )


    साक्षात्कारों को अनेक भागों में विभाजित किया जाता है । यह वर्गीकरण . सुविधा की दृष्टि से निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है - - -


    ( 1 ) कार्यों के आधार पर वर्गीकरण ( Classification According to Functions )

    ( a ) कारण - परीक्षक साक्षात्कार ( Diagnostic Interview ) - - कारण परीक्षक साक्षात्कार उसे कहते हैं जब अन संधानकर्ता को किसी गम्भीर घटना या समस्या के कारणों का पता लगाना हो । अत : इस साक्षात्कार का मुख्य उद्देश्य समस्या के कारणों की खोज करना है ।

    ( b ) उपचार साक्षात्कार ( Treatment Interview ) - - अनुसंधानकर्ता समस्या के कारणों का पता लगाने के बाद उसके हल के लिए साक्षात्कार संचालित करता है । वह समस्या के निवारण के लिए सम्बन्धित व्यक्तियों , संस्थाओं औरसंगठनों जैसे डॉक्टर , वकील , न्यायाधीश , शिक्षा संगठन से सम्पर्क स्थापित कर हल ढूढ़ता है ।

    ( c ) अनुसंधान साक्षात्कार ( Research Interviewy . - - गहन तथ्यों का पता लगाने के लिए जो साक्षात्कार प्रायोजित किए जाते हैं उसे अनुसंधान साक्षात्कार कहते हैं । इसके अन्तर्गत व्यक्ति के मनोभावों , मनोवृत्तियों और अभिरुचियों तथा इच्छाओं का पता लगाकर नए सामाजिक तथ्यों की खोज करनी होती है ।


    ( 2 ) औपचारिकता के आधार पर वर्गीकरण ( Classification According to Formality )


    ( a ) औपचारिक साक्षात्कार ( Forma ) Interview ) - - इस साक्षात्कार को निर्देशित या नियोजित साक्षात्कार भी कहा जाता है इसमें अनुसूची विधि को काम में लाया जाता है । साक्षात्कारकर्ता के पास अनुसूची में दिए गए पूर्वनिर्मित प्रश्न होते हैं जिनके उत्तर वह सूचनादाला से प्राप्त करता है । सूचनादाता द्वारा दिए गए उत्तरों को वह नोट करता जाता है । इस प्रकार के साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता प्रश्न पूछने में स्वतंत्र नहीं होता है । वह न तो नए प्रश्नों को पूछ सकता है और न नए प्रश्न प्रनमूची में जोड़ सकता है । अत : ऐसा साक्षात्कार नियन्त्रित होता है ।


    ( b ) अनौपचारिक साक्षात्कार ( Informal Interview ) - - से साक्षात्कार को अनियन्त्रित साक्षात्कार भी कहा जाता है । इसमें प्रौपचारिक साक्षात्कार की भांति अनुसूची को तैयार नहीं किया जाता । साक्षात्कारकती माक्षात्कारदाना अपने विषय से सम्बन्धित से प्रश्न करता है जो उनका उत्तर वर्णन या कहानी के रूप में सकता है । इसमें घटनाया एवं भावनायों के वर्णन में काफी स्वतंत्रता रहती है । इस वर्णन के आधार पर साक्षात्कारकर्ता अपने निष्कर्ष निकालता है ।


    ( 3 ) सूचनादातारों की संख्या के अाधार पर ( Classification on the Basis of Number of Informants )


    ( a ) व्यक्तिगत साक्षात्कार ( Personal Interview ) - व्यक्तिगत साक्षात्कार में एक समय में एक ही व्यक्ति से साक्षात्कार किया जाता है । साक्षात्कारकर्ता , सूचनादाता से प्रश्न करता जाता है और वह उसका उत्तर एक - एक करके देता है । कि एक बार में एक ही व्यक्ति से ग्रामने - सामन वार्तालाप होती है , अत : सूचना दाता की उत्तर देने में भी प्रेरणा मिलती है । लाभ ( Merits ) - व्यक्तिगत साक्षात्कार को बहुत लाभदायक और उपयोगी माना गया है । इसके गुहा संक्षेप में ये हैं - - ( i ) बहुत कुछ विश्वसनीय सूचना प्राप्त हाती है । ( 1 ) इसमें किसी संदेह का स्पष्टीकरण तुरंत कर दिया जाता है । ( 1 ) अनावश्यक प्रश्नों को छोड़कर उपयोगी और आवश्यक प्रश्न पूछे जाते हैं जिनसे अभीष्ट उत्तरों की प्राप्ति होती है । iv ) व्यक्तिगत एवं संवदनशील प्रश्नों के उत्तर पाने की सम्भावना होती है ।



    ( अ ) उद्देश्यों के आधार पर साक्षात्कार के तीन रूपों की चर्चा की गई है - निदानात्मक साक्षात्कार , उपचारात्मक साक्षात्कार एवं अनुसंधानात्मक साक्षात्कार । ( 1 ) निदानात्मक साक्षात्कार ( Diagnostic Interview ) : जब साक्षात्कार का उद्देश्य किसी सामाजिक घटना व समस्या के कारणों की खोज करना होता है , तो उसे कारणात्मक साक्षात्कार कहा जाता है । जैसे — बाल - अपराध , बेरोजगारी व भ्रष्टाचार आदि समसयाओं के कारणों को जानने के लिए किए गए साक्षात्कार इसी श्रेणी में आते हैं । इसके अन्तर्गत साक्षात्कारकर्ता समस्या के पीछे प्रेरक कारकों को स्पष्ट करता है ।

    ( II ) उपचारात्मक साक्षात्कार ( Treatment Interview ) : जब साक्षात्कार का उद्देश्य किसी समस्या के उपचार से सम्बन्धित सुझावों को प्राप्त करने का होता है , तो उसे उपचारात्मक साक्षात्कार कहा जाता है । सामान्यतया इस प्रकार के साक्षात्कार में किसी समस्या के पीछे छिपे कारणों का पता लगाकर उनके निराकरण का उपाय किया जाता है ।

    ( II ) अनुसंधान साक्षात्कार ( Research Interview ) : जब साक्षात्कार का उद्देश्य सामाजिक जीवन के किसी क्षेत्र से सम्बन्धित नवीन एवं मौलिक ज्ञान प्राप्त करना होता है , तब ऐसे साक्षात्कारों को अनुसंधान साक्षात्कार कहा जाता है ।


    औपचारिकता के आधार पर साक्षात्कार को दो भागों में बाँटा गया है - औपचारिक साक्षात्कार एवं अनौपचारिक साक्षात्कार ।

    ( 1 ) औपचारिक साक्षात्कार ( Formal Interview ) : इसमें साक्षात्कारकर्ता पहले से तयार का गइसाक्षात्कार अनुसूचा के आधार पर विधिपूर्वक साक्षात्कार करता है । वह अनुसची के प्रश्नों की भाषा , उनके क्रम आर उनकास भी प्रकार का परिवर्तन करने को स्वतंत्र नहीं होता । इसे नियोजित साक्षात्कार , निर्देशित साक्षात्कार एव सराचत साक्षात्कार आदि नामों से भी जाना जाता है ।

    ( II ) अनौपचारिक साक्षात्कार ( Informal Interview ) : इसमें पूर्व निर्धारित प्रश्नों की अनुसूची नहा हाता । साक्षात्कारकर्ता ने शोध के उद्देश्य के अनुसार साक्षात्कार के समय ही तत्काल प्रश्नों को बनाने व पूछने का स्वतंत्रता होती है । इसे अनियोजित साक्षात्कार , अनिर्देशित साक्षात्कार एवं असंरचित साक्षात्कार आदि नामों से भी पुकारा जाता है ।


    संख्या के आधार पर साक्षात्कार को दो भागों में बाँटा गया है - व्यक्तिगत साक्षात्कार और समूह साक्षात्कार ।

    ( I ) व्यक्तिगत साक्षात्कार ( Personal Interview ) : जब एक समय में एक ही व्यक्ति से साक्षात्कार किया जाता है , तो उसे व्यक्तिगत साक्षात्कार कहा जाता है । साक्षात्कारकर्ता एवं उत्तरदाता में वार्तालाप होता है और उसके आधार पर सूचना एकत्र की जाती है । साक्षात्कारकर्ता एक के बाद दूसरा प्रश्न पूछता जाता है और उत्तरदाता उत्तर देता चला जाता है । अधिकांश प्रकार के साक्षात्कार इसी रूप में किए जाते हैं ।

    ( II ) समूह साक्षात्कार ( Group Interview ) : जब एक ही समय में एक से अधिक उत्तरदाताओं का एक साथ साक्षात्कार किया जाता है , तो उसे समूह साक्षात्कार कहा जाता है । साक्षात्कारकर्ता एक स्थान पर व्यक्तियों के समूह से मिलता है व प्रश्नों को पूछता है । एक व्यक्ति उत्तर देता है व अन्य व्यक्ति उसका अनुमोदन करते हैं या उसके विरोध में तथ्य रखते हैं । इस प्रकार एक वाद - विवाद सभा का स्वरूप बन जाता है । इसी से साक्षात्कारकर्ता सूचनाओं को प्राप्त करता है ।


    अध्ययन पद्धति के आधार पर साक्षात्कार को तीन भागों में बाँटा गया है - गैर - निर्देशित साक्षात्कार , केन्द्रित साक्षात्कार और पुनरावृत्ति साक्षात्कार ।

    ( 1 ) गैर - निर्देशित साक्षात्कार ( Non - Directive Interview ) : इसमें कोई साक्षात्कार अनुसूची नहीं होती । साक्षात्कारकर्ता अनुसंधान उद्देश्य के अनुसार प्रश्नों को पूछने के लिए स्वतंत्र होता है । यह किसी प्रश्न को उत्तरदाता के सम्मुख रखता है । उत्तरदाता प्रश्न का उत्तर संक्षिप्त विवरण के रूप में , स्वतंत्रतापूर्वक प्रस्तुत करता है । ऐसा साक्षात्कार मनोवैज्ञानिक अध्ययनों या एकल विषय अध्ययनों के लिए विशेष रूप से उपयोगी रहता है । इसे असंचालित साक्षात्कार ( Un - Controlled Interview ) या अव्यवस्थित साक्षात्कार ( Unguided Interview ) भी कहा जाता है ।

    ( II ) केन्द्रित साक्षात्कार ( Focussed Interview ) : इसका सर्वप्रथम प्रयोग आर० के० मर्टन ( R . K . Merton ) एव पा० केन्डाल ( P . Kendall ) ने 1946 में किया था । केन्द्रित साक्षात्कार का प्रयोग उन्हीं व्यक्तियों पर किया जाता है जो किसा निश्चित घटना या परिस्थिति में सहभागी रह चके हों । जैसे - किसी फिल्म के प्रभाव को जानने के लिए इसमें साक्षात्कार के लिए उन्हीं व्यक्तियों को चना जाता है जिन्होंने उस फिल्म को देखा है । तत्पश्चात् ऐसे चुने हुए व्यक्तिया के ध्यान को फिल्म के उस पक्ष पर केन्द्रित कर सूचनाएं प्राप्त की जाती है ।

    पात साक्षात्कार ( Repeated Interview ) : इसके अन्तर्गत एक से अधिक बार समान समूह या मा का साक्षात्कार किया जाता है । सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया एवं प्रवत्ति विश्लेषण के लिए एक से आधक समय का तथ्य - सकलन करना होता है , जिससे विभिन्न कालों में चल रही प्रक्रिया एव प्रवृत्ति का स्पष्ट किया मर्टन , फिस्क एवं केंडल ( Merton , Fiske and Kendall ) ने इस वाध प्रभाव के अध्ययन के लिए किया । Ton , Fiske and Kendall ) ने इस विधि का सर्वप्रथम उपयोग जनसंचार के साधनों के

    इस प्रकार सम्पक का अवधि के आधार पर साक्षात्कार को दो भागों में बांटा गया है –

    अल्पावधि साक्षात्कार ( Short Duration Interview ) एवं दीर्घावधि साक्षात्कार ( Long Duration Interview ) । सूचनादाता सस साक्षात्कार के दो रूप हैं - प्रत्यक्ष साक्षात्कार ( Direct Interview ) एवं अप्रत्यक्ष साक्षात्कार



    साक्षात्कार विधि का महत्त्व या गुण या लाभ या उपयोगिता

    ( Importance or Merits of Interview Method )


    सामाजिक अनुसंधान एवं सर्वेक्षण में साक्षात्कार विधि कई रूपों में उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है । इसके माध्यम से लोगा की मनोवृत्तियों व गुणात्मक सामाजिक तथ्यों को समझने में सरलता होती है । साथ ही इसमें अवलोकन का भी लाभ मिल जाता है । इसकी महत्ता को निम्नांकित रूप में समझा जा सकता है ।

    तथ्य संकलन की प्रत्यक्ष विधि ( Direct Method of Data Collection ) : साक्षात्कार मूलतः तथ्य संकलन की एक प्रत्यक्ष विधि है । इसमें अनुसंधानकर्ता एवं सचनादाता दोनों आमने - सामने के सम्बन्ध में होते हैं । अनुसंधानकत्ता प्रश्न करता जाता है और सचनादाता उत्तर देता जाता है । इस प्रकार साक्षात्कार में प्रत्यक्ष रूप से पछकर जानकारी प्राप्त की जाती है । इस रूप में इसमें अवलोकन के गुणों का भी लाभ मिल जाता है । साथ ही प्राथमिक सूचनाओं की जानकारी सम्भव हो पाती है ।

    गहन एवं विस्तृत सूचनाओं का संकलन ( Collection of Intensive and Detailed Information ) : मानव व्यवहार के गूढतम प्रक्रियाओं एवं उसके अन्तर्गत के रहस्यों को समझने के लिए साक्षात्कार एक महत्त्वपूर्ण विधि है । व्यक्ति के जीवन की बीती घटनाएं , उसकी प्रतिक्रियाएँ , अभिवृत्तियाँ , भविष्यकालीन योजनाओं , आशाओं व आकांक्षाओं आदि की जानकारी साक्षात्कारकर्ता उत्तरदाता से विशेष सम्बन्ध बनाकर व पूछकर प्राप्त कर सकता है । साथ ही यौन व्यवहार , गोपनीय एवं व्यक्तिगत जीवन के कई पक्षों की जानकारी साक्षात्कार द्वारा ही संभव है ।

    अधिक अर्थपूर्ण सूचनाएँ ( More Meaningful Information ) : साक्षात्कार में अनुसंधानकर्ता उत्तरदाता से प्रश्न का उत्तर प्राप्ति के साथ - साथ अवलोकन भी करता है । इस प्रकार इसमें सूचनाओं का संदर्भ भी देख सकता है । वह यह भी निरीक्षण करता है कि उत्तरदाता के भाव व मुद्रा आदि क्या है । जी० एच० मीड ( G . H . Mead ) ने इसीलिए साक्षात्कार को केवल वार्तालाप नहीं कहा है , बल्कि उनके अनुसार साक्षात्कार शारीरिक चेष्टाओं व मुद्राओं की अन्त : क्रिया है । इस तरह अवलोकन के साथ साक्षात्कार द्वारा संकलित तथ्य अधिक अर्थपूर्ण एवं वैध बन जाते हैं ।

    लचीलापन ( Flexibility ) : साक्षात्कार का एक खास महत्त्व इसमें लचीलापन का होना है । इसमें प्रश्न करने में लचीलापन होता है यानि इसमें उपयुक्त परिस्थिति के अनुसार समायोजन किया जा सकता है । जैसे सा

  • HYPOTHESIS19:52







    उपकल्पना या प्राक्कल्पना

    ( Hypothesis )



    उपकल्पना का शाब्दिक अर्थ है ' पूर्व - चिन्तन ' अर्थात् पहले से सोचा गया कोई विचार या चिन्तन ।

    अनुसन्धानकर्ता के लिए यह आवश्यक है कि वह किसी भी अपरिचित क्षेत्र में ऐसे ही प्रवेश न करे बल्कि आँकड़ों के संकलन , अवलोकन के लिए अपनी कल्पना , अनुभव या अन्य किसी स्रोत के आधार पर एक कार्यकारी तर्क - वाक्य ( Workable Proposition ) का निर्माण करे एवं बाद में अनुसन्धान के दौरान इस तर्क वाक्य की परीक्षा करे । यही तर्क - वाक्य सामान्यतः उपकल्पना ( Hypothesis ) कहा जाता है । उपकल्पना को दो अथवा दो से अधिक चरों ( Variables ) के बीच पाये जाने वाले सम्बन्ध का अनुमानित विवरण भी कहा जाता है । इस प्रकार यह सर्वोत्तम अनुमान है जो कुछ ऐसी शर्त रखता है जो प्रदशित नहीं की जा सकती बल्कि जिसके परीक्षण की आवश्यकता होती है । इससे पूर्व कि हम उपकल्पना का विस्तार से अध्ययन करें यह समझ लेना अधिक उपयुक्त होगा कि उपकल्पना एवं उससे मिलते - जुलते कुछ शब्दों का आशय क्या है ?' उपकल्पना ' को सामान्यतः एक कार्यकारी तर्क - वाक्य ' या एक ' काम चलाऊ सामान्यीकरण माना जाता है । इस तर्क - वाक्य अथवा सामान्यीकरण की अनुसन्धान के दौरान परीक्षा की जाती है एवं यह सत्य भी हो सकता है तथा असत्य भी । अनेक विद्वानों एवं समाजशास्त्रियों ने उपकल्पना को परिभाषित किया है । उनमें में कुछ प्रमुख परिभाषाएँ हम यहाँ प्रस्तुत करते हैं । ' प्राक्कल्पना ' अंग्रेजी के शब्द ' Hypothesis ' का हिन्दी रूपान्तर है जिसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है - Hypo ' तथा Thesis | प्रथम शब्द का अर्थ ' कल्पना ' या ' काल्पनिक ' ( Tentative ) है , जबकि दूसरे का अर्थ ' प्रस्तावना ' ( State ment ) है । अतः ' उपकल्पना ' का शाब्दिक अर्थ ही ' काल्पनिक प्रस्तावना ' है । यह साधारणतः ऐसा कथन है जो किसी सिद्धान्त , संस्कृति , उपमा या व्यक्तिगत अनुभव से प्राप्त किया जाता है । परन्तु इसमें कोई नई बात कही जाती है जिसकी जाँच - परख की जानी हो । अतः प्राक्कल्पना से शोध का विषय निर्दिष्ट किया जाता है । परन्तु कोई प्राक्कल्पना सही है या गलत , इसका निर्णय वास्तविक शोध के आधार पर ही किया जा सकता है । विद्वानों ने इसे निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है ' वेस्टर्स न्यू इण्टरनेशनल डिक्शनरी ' - " एक प्राक्कल्पना एक मान्यता , शर्त अथवा सिद्धान्त है जिसे शायद विश्वास के बिना मान लिया जाता है ताकि इसके तार्किक परिणाम ज्ञात हो सकें तथा इस ढंग के द्वारा उसकी उन अन्य तथ्यों से समानता का परीक्षण किया जा सके जो ज्ञात हैं अथवा निर्धारित किए जा सकते हैं ।


    गुडे एवं हट्ट ने अपनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक ' मैथड्स इन सोशयल रिसर्च ' में इसे परिभाषित करते हुए लिखा है कि " उपकल्पना भविष्य की ओर देखती है । यह एक तर्कपूर्ण वाक्य है , जिसकी वैधता की परीक्षा की जा सकती है । यह सत्य भी सिद्ध हो सकती है और असत्य भी है । " ' वेबस्टर्स न्यू इन्टरनेशनल डिक्शनरी ऑफ इंग्लिश लैंग्वेज ' के अनुसार , " उपकल्पना एक विचार , दशा या सिद्धान्त होती है , जो कि सम्भवतः बिना किसी .अनुसन्धान का आधार बन जाता है । ई . एस . बोगार्डस् ने ' सोश्योलोजी ' में इसे स्पष्ट करते हुए लिखा है कि " परीक्षित किया जाने वाला तर्क - वाक्य एक उपकल्पना है । "


    जॉन गाल्टंग ने अपनी पुस्तक ' थ्योरी एण्ड मेथडस् ऑफ सोशल रिसर्च ' में उपकल्पना को अधिक स्पष्ट एवं गणितीय आधार पर स्पष्ट किया है । गणितीय आधार पर उपकल्पना को सामान्यतः P . ( X , X , XX . . . . . . . . X . ) के रूप में विवेचित किया जाता है । इसका आशय निम्नांकित है P = Probability ( सम्भावना ) S = Set of Units ( इकाइयाँ ) , एवं XXXX = Variables ( चर ) गाल्टु ग के अनुसार उनका कहना था कि समस्त अनुसन्धानों में निम्न तत्त्व होते हैं

    ( 1 ) इकाई ( Unit ) , जिसके बारे में सूचना ग्रहण की जा रही है ,

    ( 2 ) चर ( Variable ) , जिसके बारे में सूचना ली जा रही है , एवं

    ( 3 ) मूल्य ( Value ) , जिसके बारे में किसी इकाई में प्राप्त किसी चर के गुण अथवा परिभाषा है । इस प्रकार गाल्टंग के अनुसार , " उपकल्पना चरों के द्वारा कुछ इकाइयों के सम्बन्ध में उनके विशिष्ट मूल्यों से सम्बन्धित कथन है , एवं यह स्पष्ट करती है कि इकाइयों का सम्बन्ध कितने एवं किस प्रकार के चरों से है । " 5 उदाहरण से लिए , यदि यह उपकल्पना हो कि " पुरुष स्त्रियों से अधिक बुद्धिमान होते हैं तो इसमें पुरुष और स्त्रियाँ इकाइयाँ हैं , बुद्धि चर हैं , तथा अधिक

    मूल्य है । इस प्रकार इस उपकल्पना में पुरुष तथा स्त्री इकाइयों के सम्बन्ध में तथा बुद्धि , चर का मूल्यों के सम्बन्ध में वर्णन किया गया है । एफ . एन . कलिजर के अनुसार - " उपकल्पना दो या अधिक चल राशियों अथवा चरों के सम्बन्धों का कथन है । " इसके अनुसार भी उपकल्पना दो या अधिक चरों का सम्बन्ध - सूचक घोषणात्मक कथन है । चरों के सम्बन्ध सामान्य अथवा विशिष्ट प्रकार के हो सकते हैं । अतएव उपकल्पना सम्बन्धी कथन इन्हीं दो प्रकार के होते हैं ।


    एफ . जे . मेक्गुइगन ने उपकल्पना की परिभाषा करते हुए कहा है कि " उपकल्पना दो या अधिक चरों के कार्यक्षम सम्बन्धों का परीक्षणयोग्य कथन है । " उपर्युक्त परिभाषा भी प्रयोगात्मक अनुसन्धानों से सम्बन्धित है । प्रयोगात्मक अनुसन्धान में प्रयोगकर्ता तथ्यों के अनुभवाश्रित सम्बन्धों का परीक्षण करता है । उपकल्पना अनुभवाश्रित इसलिए होती है क्योंकि इसका सम्बन्ध उन तथ्यों से होता है जिन्हें हम प्रकृति के निरीक्षण में स्वतः ही पाते हैं । अनुभवाश्रित उपकल्पना के चरों की कार्यवाहक परिभाषा की जा सकती है । इसके अतिरिक्त ये चर उन घटनाओं की ओर इंगित करते हैं जिन्हें प्रत्यक्ष रूप में निरीक्षित किया का सकता है तथा जिन्हें मापन योग्य बनाया जा सकता है । ये परिभाषाएँ कुछ विशेष तकनीकी हैं ।


    वास्तव में , टाउनसेण्ड की परिभाषा सबसे सरल एवं उपयुक्त है । इनका कहना है कि - " उपकल्पना अनुसन्धान की समस्या के लिए सुझाया गया उत्तर है । "


    बर्नार्ड तथा फिलिप्स के अनुसार , " वे उपकल्पनाएँ किसी घटना में विद्यमान सम्बन्धों के विषय में अस्थाई कथन हैं । . . . . . " उपकल्पनाओं को प्रकृति से पूछे गये प्रश्न कहा जाता है और वे वैज्ञानिक अनुसन्धान में प्राथमिक महत्त्व के यन्त्र होते हैं । "


    प्राक्कल्पना मानव ज्ञान के पूर्व अनुमानों पर आधारित होती है । इसीलिए इसमें निरीक्षण तथा परिवर्तन करने की आवश्यकता बनी रहती है । इस संदर्भ में पी . वी . यंग का कहना है कि " कार्यकारी या कामचलाऊ प्राक्कल्पना का निर्माण वैज्ञानिक पद्धति का प्रथम चरण ' प्राक्कल्पना ' शब्द दो शब्दों का योग है . - - ' प्रा ' ( अर्थात् प्रारम्भिक ) + ' कल्पना ' ( अर्थात् विचार ) । इस प्रकार प्राक्कल्पना अनुसन्धान विषय के सम्बन्ध में प्रारम्भिक विचार है । सामाजिक जीवन से सम्बन्धित जो अनुसन्धान किए जाते हैं , उनकी प्राक्कल्पना या उपकल्पना एक भी हो सकती है और अनेक भी । यदि समस्या जटिल तो एक ही प्राक्कल्पना को आधार बनाकर शोध या अनुसन्धान कार्य को आगे घटाना चाहिए । इसके विपरीत , यदि समस्या का स्वरूप सरल है तो एक से अधिक पाक्कल्पनाओं को आधार बनाया जा सकता है ।


    लुण्डबर्ग - " प्राक्कल्पना एक काल्पनिक सामान्यीकरण है जिसकी प्रामाणिकता की जाँच करना अभी शेष है । प्रारम्भिक स्तर पर एक प्राक्कल्पना प्रतिभा , अनुमान , काल्पनिक विचार या सहज ज्ञान हो सकता है जो क्रिया या शोध का आधार बन सकता है । "


    पी . वी . यंग - " एक कार्यवाहक विचार , जो उपयोगी खोज का आधार बनता है , कार्यवाहक प्राक्कल्पना माना जाता है । उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि प्राक्कल्पना एक काल्पनिक प्रस्तावना है जो सामाजिक तथ्यों एवं घटनाओं की खोज करने एवं विभिन्न चरों में कार्य - कारण सम्बन्धों का पता लगाने का आधार बनती है । सैल्टिज आदि का कहना है कि हम शोध में तब तक एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते जब तक कि हम सम्भावित व्याख्या अथवा समस्या के समाधान के बारे में न सोचें । जब काल्पनिक व्याख्याओं का निर्माण प्रस्तावनाओं के रूप में किया जाता है तो इन्हें प्राक्कल्पना कहा जाता है ।








    एक अच्छी उपकल्पना या प्राक्कल्पना की विशेषताएँ

    ( Characteristics of a Good Hypothesis )


    प्राक्कल्पनाओं का निर्माण शोध का एक महत्त्वपूर्ण चरण है । अतः इनके निर्माण में विशेष सावधानी रखने की जरूरत है । एक अच्छी अथवा कार्यवाहक प्राक्कल्पना में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ होनी अनिवार्य हैं


    ( 1 ) अवधारणात्मक स्पष्टता ( Conceptual clarity ) - प्राक्कल्पना अवधारणा की दृष्टि से स्पष्ट होनी चाहिए अर्थात् इसमें भाषा सम्बन्धी स्पष्टता होनी चाहिए । प्राक्कल्पना में प्रयोग किए जाने वाली प्रत्येक अवधारणा एवं शब्द का अर्थ सुनिश्चित एवं स्पष्ट होना चाहिए ताकि इसे सरलता से समझा जा सके ।


    ( 2 ) विशिष्टता तथा यथार्थता ( Specificity and precision ) - प्राक्कल्पना अध्ययन विषय के विशिष्ट पहलू से सम्बन्धित होनी चाहिए । यदि प्राक्कल्पना सामान्य है तो इसे विशिष्ट प्राक्कल्पनाओं में विभाजित किया जा सकता है । प्राक्कल्पना का परिसीमन इस प्रकार से किया जाना चाहिए कि यह पूर्णतः विशिष्ट तथा निश्चित हो जाए ताकि तथ्यों की खोज अपेक्षाकृत सुविधाजनक रूप से की जा सके ।


    ( 3 ) आनुमविक सन्दर्भ ( Empirical reference ) - एक अच्छी प्राक्कल्पना ऐसी होनी चाहिए जिसकी प्रामाणिकता की जाँच अनुभवाश्रित रूप से की जा सके । यह आदर्शात्मक नहीं होनी चाहिए क्योंकि आदर्शात्मक निर्णयों को अनिवार्य रूप से अनुभवाश्रित विधि द्वारा प्रमाणित नहीं किया जा सकता । वास्तव में , यदि प्राक्कल्पना में आनुभविक सिद्धता का गुण नहीं है तो उसे उपकल्पना कहा ही नहीं जा सकता ।


    ( 4 ) सरलता ( Simplicity ) - प्राक्कल्पना का सरल एवं प्रसंग के अनुरूप होना अनिवार्य है चाहे यह सामान्य व्यक्ति की समझ में न आए । अधिक सरल प्राक्कल्पनाओं को ओक्कम का उस्तरा ( Occam ' s razor ) कहा गया है तथा राजनीतिशास्त्र एवं अर्थशास्त्र में प्रचलित अनेक सरल उपकल्पनाएँ अधिक घातक होती हैं ।


    ( 5 ) उपलब्ध प्रविधियों से सम्बन्धित ( Related to available techniques ) - एक अच्छी प्राक्कल्पना वह मानी जाती है जिसकी प्रामाणिकता की जाँच उपलब्ध प्रविधियों द्वारा की जा सके । यदि उपलब्ध प्रविधियों द्वारा प्राक्कल्पना की जाँच सम्भव नहीं है तो ऐसी प्राक्कल्पना अव्यावहारिक कहलाती है । गुडे तथा हॉट का कहना है सिद्धान्तकार यह नहीं जानता कि उसकी प्राक्कल्पना के परीक्षण के लिए कौन - सी जो एक - दूसरे के विरोधी नहीं हैं । उपलब्ध प्रविधियाँ हैं , वह व्यावहारिक प्रश्नों के निर्माण में असफल रहा है ।


    ( 6 ) सिद्धान्त से सम्बन्धित ( Related to theory ) - प्राक्कल्पना विषय में प्रचलित किसी - न - किसी पूर्व - निर्मित सिद्धान्त से सम्बन्धित होनी चाहिए और साथ ही उसमें सिद्धान्त का परिष्कार , समर्थन अथवा संशोधन करने की क्षमता होनी चाहिए ।













    उपकल्पनाओं के प्रायाम या विमितियाँ

    ( Dimensions of Hypothesis )


    उपकल्पनाओं की विशेषतायों की विवेचना के बाद अब हमें उपकल्पना के विभिन्न आयाम , तत्त्व या विमितियों पर प्रकाश डालना चाहिए । जॉन गाल्टग ने उपकल्पनाओं की इन विमितियों का उल्लेख किया है ज निम्नलिखित है



    1. विशिष्टता ( Specificity ) - उपकल्पना की सामान्य परिभाषा से दो प्रकार की विशिष्टताएं होती हैं - - एक तो ' चरों की विशिष्टता ' एवं दूसरी इन चरा के वितरण की विशिष्टता ' । इस सन्दर्भ में वे विशिष्ट चर महत्वपूर्ण हैं . . जिनके पाघार पर उपकल्पना का निर्माण किया जाता है । द्वि - खण्डीय उपकल्पना से त्रि - खण्डीय उपकल्पनायें एवं द्वि - खण्डौय से बहखण्डीय अधिक महत्वपूर्ण ब श्रेष्ठ हैं । किसी भी उपकल्पना की ग्रानुभाविक विशेषता को संद्धान्तिक विशेषता के स्तर तक लाना चाहिए , ताकि तथ्यों के सन्दर्भ में उपकल्पना को परिष्कृत किया जा सके ।


    2.निश्चयवादिता ( Determinancy ) - इस विमिति का अायाम के भीतर हम परिस्थितियों का विवरण इतने अच्छे ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि हम निश्चयवादिता या निश्चयात्मकता के साथ यह कह सकते हैं कि इकाइयों की वास्तविक स्थिति क्या है ? सामाजिक अनुसन्धान में सम्भावनापूर्ण उपकल्पना की अपेक्षा निश्चयात्मकता उसकी विशिष्टता से सम्बन्धित होती है और किसी भी उपकल्पना की विशिष्टता को कम करने के बाद हम किसी भी सीमा तक उसमें निश्चयात्मकता प्राप्त कर सकते हैं । आदर्शात्मक स्थिति यह होती है कि दोनों ही गुणों का समावेश उपकल्पना में हो , लेकिन सामान्यतः सामाजिक विज्ञानों में इस प्रकार का अनुपात कम हो होता है ।


    3.भविष्यवाणीयता ( Predictibility ) - उपकल्पना की एक और विमिति उसकी भविष्यवाणीयता है । इसके अन्तर्गत चरों के मध्य पाए जाने वाले सम्बन्ध की भविष्यवाणी की जाती है । सामाजिक विज्ञानों में भविष्यवाणी करने की क्षमता इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है जितनी सामाजिक प्रघटनाओं को स्पष्ट करने की अावश्यकता । इस प्रकार सामाजिक अनुसन्धान के दौरान उपलब्ध तथ्यों के प्रकाश में अपनी उपकल्पनाओं में परिवर्तन एवं संशोधन करता रहता है ।


    4. संवहनशीलता ( Communicability ) - कोई भी उपकल्पना उस सीमा तक संवहनशील होती है , जहाँ तक दूसरे लोग उसके अर्थ को ग्रहण कर सके तथा वे भी उपकल्पना का वही अर्थ लगायें जिस उद्देश्य से अनुसन्धानकर्ता ने उसे बनाया था अर्थात् सूचना प्रदान करने वाले तथा सूचना प्राप्त करने वाले व्यक्तियों द्वारा एक ही अर्थ निकाला जाए । यह संवहन ती स्तरों पर हो सकता है - उपकल्पना का संवहन , उसके सन्दर्भ में एकत्र किए गए तथ्यों का संवहन तथा उनके मध्य सम्बन्धों का मूल्यांकन ।


    5. पुनरुत्पादकता ( Reproductibility ) - एक उपकल्पना उस सीमा तक पुनरुत्पादन के योग्य होती है जब तक कि उसे उसके निष्कर्षों के साथ दोहराया जा सके अर्थात् यदि कोई अनसन्धानकर्ता उसी प्रकार के तथ्यों को एकत्रित करता है तो वह उस प्रक्रिया को समझने के साथ - साथ उन्हीं अर्थों में स्वीकार भी करे ।


    6. विश्वसनीयता ( Reliability ) - उपकल्पना का यह तत्त्व इस बात की ओर संकेत करता है कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उपकल्पना की जाँच होनी है , जिसे पुष्टीकरण की मात्रा के नाम से पुकारा जा सकता है । जैसे - जैसे किसी उपकल्पना का मिथ्या प्रमाणित होना या उसका समर्थन नहीं होना अथवा पुष्टि होना या सत्य प्रमाणित होना । ये वे विमितियाँ अथवा प्रायाम हैं , जो कम या अधिक मात्रा में प्रत्येक उपकल्पना में पाए जाते हैं तथा उपकल्पना को सामान्य विचार से पृथक् करते हैं ।


    7. सामान्यता ( Generality ) - सामान्यता से हमारा प्राशय उन परिस्थितियों का ब्यौरा देने से है , जिनमें उपकल्पना को लाग किया जा सकता है । किसी एक स्थान अथवा परिस्थिति विशेष के लिए प्रमाणित तथ्यों को सामान्यी करण प्राप्त करने हेतु अन्य स्थानों अथवा परिस्थितियों पर लागू किया जाता है । इस प्रकार के परीक्षा से या तो उपकल्पना की पुष्टि हो जाती है अथवा कहते असत्य प्रमाणित हो जाती है ।


    8. जटिलता ( Complexity ) - जटिलता से हमारा प्राशय प्रयोग में लाये गये चरों की संख्या के स्पष्टीकरण से है । सबसे सामान्य या सरल उपकल्पना वह होती है , जिसमें मात्र एक ही चर होता है । उपकल्पना की जटिलता के साथ _ _ _ साथ उसके चरों की संख्या भी बढ़ती जाती है । सामाजिक प्रघटनामों के विश्लेपण में उपकल्पना का यह पक्ष पर्याप्त महत्त्वपूर्ण है , क्योंकि जितनी जटिल उपकल्पनामों की पुष्टि होगी सामाजिक प्रघटनों का विश्लेषण उतना ही श्रेष्ठ होगा । इसप्रकार अधिक सामान्यीकरण प्राप्त करने के लिए जटिल उपकल्पनाओं का निर्माण आवश्यक है ।


    9. मिथ्यात्मकता ( Falsifiability ) - शोधकर्ता को अपने अनुसन्धान में उपकल्पना को इस प्रकार प्रस्तुत करना चाहिए कि इसके सत्य अंश , अनिश्चित अंश एवं मिथ्या ग्रंश आदि की सीमाएं स्पष्ट रूप से अलग - अलग हों । इसका उद्देश्य वस्तुतः यह पता लगाना होता है कि उपलब्ध तथ्यों में मिथ्या पक्ष का माप , कहाँ तक सम्भव है । जैसे - जैसे उपकल्पना की पुष्टि होती है , उसके मिथ्या प्रमाणित होने के अवसर प्राप्त होते जाते हैं ।


    10. परीक्षणीयता ( Testability ) - - उपकल्पना की एक अन्य विमिति परीक्षणीयता या उसकी जाँच की योग्यता है । यहाँ उपकल्पना की परीक्षणीयता से हमारा आशय यह है कि जब उपकल्पना की तुलना आनुभविक आवंटन से की जाए । तो इसकी सत्यता अथवा असत्यता सम्बन्धी निष्कर्ष निकल सके । किसी उपकल्पना की जाँच के निष्कर्ष कुछ भी हो सकते हैं । यदि उस उपकल्पना की पुष्टि होती है तो वह सत्य प्रमाणित होती है और यदि उसकी स्थिति अनिश्चित रहे तो वह मिथ्या प्रमाणित हो सकती है ।









    उपकल्पनाओं या प्राक्कल्पनाओं के प्रकार

    ( Types of Hypotheses )


    सामाजिक घटनाओं , तथ्यों एवं समस्याओं की प्रकृति अति जटिल होती है , इसलिए वैज्ञानिक शोध में अनेक प्रकार की प्राक्कल्पनाएँ प्रयोग में लाई जाती हैं । गुडे तथा हॉट के अनुसार प्राक्कल्पनाओं को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है , जोकि इस प्रकार हैं


    ( 1 ) आनुभविक समानताएँ बताने वाली प्राक्कल्पनाएँ ( Hypotheses stating existing empirical uniformities ) - ये वे प्राक्कल्पनाएँ हैं जोकि व्यक्ति के सामान्य दैनिक जीवन में प्रचलित विचारधाराओं , मान्यताओं , निषेधों , व्यवहार प्रतिमानों इत्यादि पर आधारित होती हैं । यद्यपि ऐसी प्राक्कल्पनाओं का आधार सामान्य ज्ञान है तथापि वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सकता है ।


    ( 2 ) जटिल आदर्श - प्ररूप से सम्बन्धित प्राक्कल्पनाएँ ( Hypotheses con cerned with complex ideal - types ) - इन प्राक्कल्पनाओं का निर्माण अनुभवाश्रित एकरूपता पर आधारित विभिन्न कारकों में तार्किक अन्तर्सम्बन्धों का परीक्षण करने हेतु किया जाता है । इनमें सामग्री संकलन के पश्चात कारकों के तर्कपूर्ण क्रम को आदर्श मानकर सामान्यीकरण किया जाता है ।


    ( 3 ) विवेचनात्मक चरों में सम्बन्ध बताने वाली प्राक्कल्पनाएँ ( Hypotheses related with analytical variables ) - इस प्रकार की प्राक्कल्पनाएँ जटिल आदर्श - प्ररूपों से भी अधिक अमूर्त होती हैं । इनका प्रयोग परिवर्तन के लिए उत्तरदायी विभिन्न कारकों के तर्कपूर्ण विश्लेषण करने के साथ - साथ अनेक पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों का पता लगाने के लिए भी किया जाता है ।








    उपकल्पन के स्त्रोत

    ( Sources of Hypotheses )


    प्राक्कल्पना के अनेक स्त्रोत होते हैं । किसी घटना के बारे में हमारे अपने विचार , हमारे व्यक्तिगत अनुभव एवं प्रतिक्रियाएँ , सामाजिक - सांस्कृतिक पर्यावरण , सिद्धान्तों में पाए जाने वाले अपवाद , समरूपता तथा साहित्य इत्यादि प्राक्कल्पनाओं के निर्माण में सहायक हो सकते हैं । गुडे तथा हॉट ने प्राक्कल्पना के निम्नांकित चार स्त्रोत बताए हैं


    1 . सामान्य संस्कृति ( General culture ) - सामान्य संस्कृति प्राक्कल्पना के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण स्त्रोत है । विभिन्न संस्कृतियों की विशेषताएँ , प्रथाएँ , माया , लोकरीतियाँ , विश्वास , कहावतें इत्यादि प्राक्कल्पनाओं के निर्माण

    में सहायक स्त्रोत हैं । सामाजिक - सांस्कृतिक इकाइयों ; जैसे भारत में जाति प्रथा , संयक्त परिवार , ग्रामीण संरचना , विवाह इत्यादि में होने वाले परिवर्तन भी प्राक्कल्पनाओं के निर्माण में सहायता देते हैं । गडे तथा हॉट का कहना है कि अमेरिकी संस्कृति में व्यक्तिगत सख को बड़ा महत्त्व दिया जाता है तथा इससे सम्बन्धित अनेक कारण उपकल्पनाओं के स्त्रोत हो सकते हैं ।


    2. वैज्ञानिक सिद्धान्त ( Scientific theory ) - अनेक प्राक्कल्पनाओं का निर्माण स्वयं विज्ञान तथा वैज्ञानिक सिद्धान्तों द्वारा ही होता है । प्रत्येक विज्ञान में भिन्न विषयों के बारे में कुछ सामान्यीकरण प्रचलित होते हैं और यह सामान्यीकरण अन्य विज्ञानों में समस्याओं को भी प्रभावित करते हैं । यह सामान्यीकरण तथा इनमें पाए जाने वाले सार्वभौमिक तत्त्व प्राक्कल्पनाओं के मुख्य स्त्रोत हैं । सिद्धान्तों में पाए जाने वाले आपबाद भी प्राक्कल्पना के स्त्रोत हो सकते हैं ।


    3. समरूपताएँ ( Analogies ) - प्राक्कल्पनाओं के निर्माण में दो विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाने वाली उपमाओं का भी विशेष महत्त्व है । उपमाओं के आधार पर शोधकर्ता एक क्षेत्र में पाए जाने वाले तथ्य या व्यवहार को दूसरे क्षेत्र में ढूँढने का प्रयास करता है । यदि दो भिन्न परिस्थितियों में हमें कछ समानता दिखाई देती है तो स्वाभाविक रूप में शोधकर्ता के मन में यह प्रश्न पैदा होता है कि ऐसा क्यों है ? अतः विभिन्न व्यवहार क्षेत्रों में पाई जाने वाली समानताएँ प्राक्कल्पनाओं के उदगम में महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं ।


    4 . व्यक्तिगत अनुभव ( Personal experience ) - व्यक्तिगत अनुभव भी प्राक्कल्पनाओं के निर्माण का महत्त्वपूर्ण स्त्रोत है । एक कुशल शोधकर्ता अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर जिन सामाजिक समस्याओं को वह अपने दैनिक जीवन में देखता है , उनके प्रति अपने दृष्टिकोण के आधार पर अनेक घटनाओं के सम्बन्ध के बारे में प्राक्कल्पनाओं का निर्माण कर सकता है । परम्परागत व्यवहार में जो परिवर्तन हम देखते हैं उसके बारे में जो हम सोचते हैं या विभिन्न इकाइयों की जो परिवर्तित परिस्थितियों पाई जाती हैं उनसे भी प्राक्कल्पनाओं के निर्माण में सहायता मिलती है ।







    उपकल्पना का महत्त्व

    ( importance of Hypotheses)




    1. अध्ययन के उद्देश्य का निर्धारण ( Stating the purpose of study ) - प्राक्कल्पना से अध्ययन के उद्देश्य का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है क्योंकि किसी अमुक घटना या समस्या के अध्ययन के पीछे अनेक उद्देश्य हो सकते हैं । प्राक्कल्पना से हमें यह पता चलता है कि हम किसकी खोज करें ।


    2. सम्बद्ध तथ्यों के संकलन में सहायक ( Helpful in collection of relevant data ) - प्राक्कल्पना अध्ययन को दिशा प्रदान करके इसमें केवल निश्चितता ही नहीं लाती अपित समस्या से सम्बन्धित तथ्यों के संकलन में भी सहायता देती है । शोधकर्ता केवल उन्हीं तथ्यों को एकत्रित करता है जिनके आधार पर प्राक्कल्पना की सत्यता की जाँच हो सकती है तथा इस प्रकार वह अनावश्यक तथ्यों के संकलन से बच जाता है ।


    3.निष्कर्ष निकालने में सहायक ( Helpful in drawing conclusions ) - प्राक्कल्पना द्वारा दो चरों में जिस प्रकार के सम्बन्ध का अनुमान लगाया गया है वह शोध द्वारा या तो सत्य प्रमाणित होता है या असत्य । अतः यह निष्कर्ष निकालने तथा यहाँ तक कि समस्याओं के समाधान निकालने में सहायक सिद्ध । हो सकती है ।


    4. सत्यता की खोज करने में सहायक ( Helpful in searching the : truth ) - प्राक्कल्पना अध्ययन को स्पष्ट एवं निश्चित बनाकर तथा प्रमाणित आँकडों के कारण सत्यता की खोज में सहायता देती है क्योंकि प्राक्कल्पना की जाँच वास्तविक तथ्यों के आधार पर ही की जाती है ।


    5. अध्ययन - क्षेत्र को सीमित करना ( Delimiting the scope of study ) - शोधकत्ता किसी घटना , इकाई या समस्या का अध्ययन सभी पहलुओं को सामने रखकर नहीं कर सकता । अतः गहन एवं वास्तविक अध्ययन के लिए अध्ययन - क्षेत्र को सीमित करना अनिवार्य है । प्राक्कल्पना इस कार्य में हमारी सहायता करती है । इससे हमें यह पता चलता है कि किसी वस्तु का क्या , कितना और कैसे अध्ययन करना है । शोध क्षेत्र जितना सीमित होगा , त्रुटियों की सम्भावना उतनी ही कम होती जाएगी ।


    6. अध्ययन को उचित दिशा प्रदान करना ( Providing suitable direction to the study ) - प्राक्कल्पना केवल अध्ययन क्षेत्र को सीमित करने में ही सहायक नहीं है अपितु यह अध्ययन को उचित दिशा भी प्रदान करती है । पी . वी . यंग का कहना है कि प्राक्कल्पना दृष्टिहीन खोज ( Blind search ) से हमारी रक्षा करती है । यह हमें पहले से ही इस बात की ओर इशारा करने में सहायता देती है कि हमें किस दिशा में आगे बढ़ना है । इससे व्यर्थ का परिश्रम बच जाता है और व्यय भी कम होता है ।


    7. अध्ययन में निश्चितता लाना ( Bringing definiteness in the study ) - प्राक्कल्पना शोध को सुनियोजित एवं सुनिश्चित बनाने में सहायता देती है । इससे हमें यह पता चल जाता है कि कौन सी सूचनाएँ , कहाँ से तथा कब प्राप्त करनी हैं । अतः इससे अनुसन्धान में अस्पष्टता एवं अनिश्चितता की सम्भावना प्रायः समाप्त हो जाती है ।














    उपकल्पनाओं की सीमाएँ

    ( Limitations of Hypotheses )





    1. प्राक्कल्पना में अटूट विश्वास ( Perfect confidence in hypothesis ) प्राक्कल्पना क्योंकि शोधकर्ता के अपने अनुभव पर आश्रित है तथा कई बार उसे प्रारम्भ में ही प्राक्कल्पना में अटूट विश्वास हो जाता है । अतः वह सभी तथ्यों को तोड़ - मरोड़ कर प्राक्कल्पना को सत्य साबित करने का प्रयास करता है जोकि हो सकता है कि वास्तविकता के विपरीत हो ।


    2. तथ्य संकलन की सीमित प्रकृति ( Limited nature of data collection ) - यदि अनुभवहीनता के कारण प्राक्कल्पना का निर्माण ठीक प्रकार से नहीं किया गया है तो हो सकता है कि घटना की वास्तविकता का कभी भी पता न चले , क्योंकि प्राक्कल्पना तो शोधकर्ता को केवल सीमित ( अर्थात् प्राक्कल्पना से सम्बन्धित ) तथ्यों के संकलन करने पर ही बल देती है ।


    3 ,.पक्षपात ( Bias ) - प्राक्कल्पना के निर्माण में पक्षपात या अभिनति हो सकती है । यदि शोधकर्ता को किसी विशेष प्रकार के सम्प्रदाय के प्रति रुचि है तो हो सकता है कि प्राक्कल्पनाओं का निर्माण , सामग्री संकलन एवं निष्कर्ष पक्षपातपूर्ण हो । प्राक्कल्पना के महत्त्व तथा दोषों की विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि यदि प्राक्कल्पना का निर्माण सावधानीपूर्वक किया जाता है तो यह निश्चित रूप से वैज्ञानिक अन्वेषण का एक महत्त्वपूर्ण चरण हो सकती है ।









  • OBSERVATION17:57

    अवलोकन

    ( Observation )

    प्राकृतिक विज्ञानों की भांति , सामाजिक विज्ञानों में भी अवलोकन के महत्व को कम नहीं आंका जा सकता । निरीक्षण पद्धति का प्रयोग समाज - वैज्ञानिक द्वारा वर्ग , समुदाय , स्त्री - पुरुष , संस्थाओं के अध्ययन के लिए किया जा रहा है । जैसे - जैसे प्राधुनिक यन्त्रों का सामाजिक अनुसंधान में प्रयोग होता जा रहा है , अवलोकन पद्धति को उतना ही महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया जा रहा है । ऐसी अनेक पद्धतियों की खोज हुई है जिनके द्वारा निरीक्षण अधिक विश्वसनीय होता जा रहा है । अवलोकन ग्रेजी शब्द ' Observation ' का पर्यायवाची है , जिसका अर्थ निरीक्षण करना है । अग्रेजी शब्दकोष के अनुसार , " कार्य - कारण अथवा पारस्परिक सम्बन्ध को जानने के लिए घटनामों को ठीक अपने उसी रूप में देखना और उनका पालम मारना , अवलोकन कहलाता है । अवलोकन सामाजिक यथार्थ ( Social Reality ) से सम्बन्धित तथ्यों के संकलन की एक ऐसी विधि है जिसमें कानों और ध्वनि की अपेक्षा नेत्रों का प्रयोग निहित होता है । इसके अन्तर्गत घटनाएँ जिस रूप में होती हैं , उसे उसी रूप में देखना , निरीक्षण , परीक्षण व आलेखन करना होता है । जैसे — बाल श्रमिकों के जीवन का अवलोकन , विधवाओं के साथ किया जानेवाला व्यवहारों का अवलोकन एवं मजदूर - मालिक के सम्बन्ध का अवलोकन आदि - आदि । कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ निम्न हैं



    " सी . ए . मोजर के शब्दों में , " ठोस अर्थ में अवलोकन का अर्थ कानों तथा वाणी की अपेक्षा आँखों का अधिक प्रयोग है । "

    पी . वी . यंग के अनुसार , " अवलोकन आँखों द्वारा विचारपूर्वक अध्ययन की प्रणाली के रूप में काम में लाया जाता है जिससे कि सामूहिक व्यवहार और जटिल सामाजिक संस्थानों के साथ - ही - साथ सम्पूर्णता की रचना करने वाली पृथक इकाइयों का अध्ययन किया जा सके । "


    विलियम जे . गडे एवं पॉल के हद्र william J . Goode and Paul K . Hatt ) ने लिखा है , " विज्ञान का शुभारंभ अवलोकन से होता है और इसे अपनी लिम प्रामाणिकता को जाच हेतु अन्ततः अवलोकन पर ही लौटना पड़ता है । "सभी विज्ञानों में अवलोकन एक मूलभूत विधि मानी जाती है । कोई भी वैज्ञानिक किसी घटना या अवस्था को उस समय तक स्वीकार नहीं करता , जब तक कि वह स्वयं । उसका अपनी दृष्टि से अनुभव न कर ले ।


    पी०वी० यंग ( P . V . Young ) के शब्दों में , " अवलोकन आँखों के द्वारा स्वाभाविक घटनाओं का उनके घटित होते समय एक व्यवस्थित एवं सुविचारित अध्ययन है । " इस परिभाषा से स्पष्ट होता है - ( 1 ) अवलोकन एक व्यवस्थित एवं सुविचारित विधि है । ( 2 ) इसमें आखों का प्रयोग मुख्य है । ( 3 ) इसमें सामाजिक घटनाओं का उनके स्वाभाविक रूप में अवलोकन किया जाता है । इसी रूप में यह एक वैज्ञानिक विधि माना जाता है ।

    सी०ए० मोजर ( C . A . Moser ) के अनुसार , " ठोस अर्थ में , अवलोकन में कानों व वाणी की अपेक्षा आँखों का उपयोग होता है । " इस कथन से पता चलता है कि इस विधि में शोधकर्ता कही - सुनी बातों पर विश्वास न कर घटनाओं को स्वयं देखकर समझने का प्रयत्न करता है ।

    ऑक्सफोर्ड कन्साइज शब्दकोश ( Oxford Concise Dictionary ) में लिखा है , ' ' घटनाएं , कार्य - कारण अथवा पारस्परिक सम्बन्धों के विषय में जिस रूप में उपस्थित होती हैं , का यथार्थ निरीक्षण एवं वर्णन ही अवलोकन है । "

    इससे स्पष्ट होता है ( 1 ) अवलोकन में यथार्थ निरीक्षण एवं वर्णन रथ जाता है । ( 2 ) इसमें व्यवहार का अध्ययन स्वाभाविक स्थितियों में होता है । ( 3 ) इसमें कार्य कारण सम्बन्धों को जाने का प्रयास किया जाता है ।


    जे० गाल्लुंग ( J . Galtung ) के अनुसार , " अवलोकन सभी प्रकार की इंद्रियग्राह्य विषय - वस्तु का आलेखन है । " इससे स्पष्ट होता है कि अवलोकन की प्रक्रिया में शोधकर्ता की सारी ज्ञानेद्रियों सक्रिय होती है । इसके अन्तर्गत शोधकर्ता घटना को स्वयं प्रत्यक्ष रूप में से अवलोकित कर आलेखन करता है ।

    ए वुल्फ ( A . Wolf ) का कहना है , " वस्तुओं तथा घटनाओं . उनकी विशेषताओं एवं उनके मूर्त सम्बन्धों को समझने और उनके सम्बन्ध में हमारे मानसिक अनुभवों की प्रत्यक्ष चेतना को जानने की क्रिया को अवलोकन कहते हैं । " इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि अवलोकन के द्वारा मात्र घटनाओं को देखा ही नहीं जाता है , बल्कि उसकी विशेषताओं और अन्तर्सम्बम्धों को जानने का प्रयास भी किया जाता है । उपरोक्त वर्णन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अवलोकन एक ऐसी विधि है जिसमें नेत्रों के द्वारा प्राथमिक तथ्यों का विचारपूर्वक संकलन किया जाता है ।


    सैलिज , जहोदा , डेयुटस्च तथा कुक के अनुसार सामान्य देखना एक वैज्ञानिक पद्धति के रूप में अवलोकन का रूप धारण कर लेता है जब उसमें निम्न विशेषताएँ जुड़ जाती हैं


    ( 1 ) जब अवलोकन का एक विशिष्ट उद्देश्य हो ।

    ( 2 ) जब अवलोकन नियोजित तथा सुव्यवस्थित रूप में किया गया हो ।

    ( 3 ) जब अवलोकन की प्रामाणिकता तथा विश्वसनीयता पर अावश्यक नियन्त्रण एवं प्रतिबन्ध लगाया गया हो ।

    ( 4 ) जब अवलोकन के निष्कर्षों को क्रमबद्ध रूप में लिखा गया हो तथा सामान्य उपकल्पना के साथ उसका सह - सम्बन्ध स्थापित किया गया हो ।


    पी . वी . यंग ने वैज्ञानिक अवलोकन की निम्न विशेषताओं का उल्लेख किया है


    ( 1 ) निश्चित उद्देश्य ,

    ( 2 ) योजना तथा प्रलेखन की व्यवस्था ,

    ( 3 ) वैज्ञानिक परीक्षण तथा नियन्त्रण हेतु उपयोगी ।











    अवलोकन की विशेषताएँ

    ( Characteristics of observation )


    अवलोकन में किसी घटना का घटित होते हुए अपनी आँखों से सुव्यवस्थित एवं सुविचारित रूप में देखना ही विशेष रूप से आवश्यक है । इसमें निम्नांकित प्रमुख विशेषताएं पाई जाती हैं

    1. निष्पक्षता ( Impartiality ) : अवलोकनकर्ता स्वयं अपनी आँखों से घटना का निरीक्षण करता है न उसकी भली - भांति जाँच करता है । उसका निर्णय दूसरों के निर्णय या कहने - सुनने पर आधारित नहीं होता । स्वयं का सूक्ष्म व गहन अध्ययन उसे अभिमति से बचाता है ।

    2.स्वाभाविकता ( Spontaneity ) : अवलोकन की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें घटनाओं का अध्ययन । उस समय किया जाता है , जिस समय वह घटित होती रहती है । इस प्रकार स्वाभाविक घटनाओं का अवलोकन हाना । सम्भव हो पाता है ।

    3,इन्द्रियों का उपयोग ( Use of Senses ) : अवलोकन विधि में मानव इन्द्रियों का उपयोग होता है । इसमें आँखों , कानों व वाणी सभी का उपयोग किया जा सकता है । लेकिन विशेषकर आंखों के उपयोग पर अधिक बल दिया जाता है । 4. व्यवस्थित एवं सुविचारित अध्ययन ( Systematic and Deliberate Study ) : अवलोकन एक व्यवस्थित एवं सुविचारित अध्ययन की विधि है । इसमें अवलोकनकर्ता स्वयं घटनाओं का व्यवस्थित व विचारपूर्वक अवलोकन कर तथ्यों का संकलन करता है । वह दूसरों की कही हुई या सुनी हुई बातों पर आश्रित नहीं रहता ।

    5. प्राथमिक सामग्री का संकलन ( Collection of Primary Data ) : अवलोकन विधि के माध्यम से प्राथमिक तथ्य सामग्री को प्राप्त करना होता है । अध्ययनकर्ता स्वयं क्षेत्र में जाकर प्रत्यक्ष अध्ययन करता है ।

    6..सूक्ष्मता ( Minuteness ) : अवलोकन विधि में मात्र देखना ही नहीं आता है , बल्कि घटना का गहरा एवं सूक्ष्म अध्ययन भी करना है । सूक्ष्म अध्ययन से वह उद्देश्य की प्राप्ति में सफल होता है , अन्यथा इधर - उधर भटकता रहता है ।

    7.कारण - परिणाम सम्बन्ध का पता लगाना ( To find out the Cause - Effect Relationship ) : अवलोकन की एक प्रमुख विशेषता कारण - परिणाम का पता लगाना है । अवलोकनकर्ता स्वयं घटना को देखकर आवश्यक कारणों व परिणामों के मध्य सम्बन्ध स्थापित करता है ।

    7.अनुभवाश्रित अध्ययन ( Empirical Study ) : अवलोकन अनुभव पर आधारित विधि है . कल्पना पर आधारित नहीं । अनुभवाश्रित अध्ययन चाहे किसी संस्था का हो या समुदाय का , सामाजिक अनुसंधान में बड़ा उपयोगी है ।






    अवलोकन विधि का महत्त्व या गुण

    ( Importance or Merits of Observation Method )


    अवलोकन विधि सभी वैज्ञानिक अन्वेषणों का आधार है । विज्ञान की शुरुआत अवलोकनों के द्वारा ही हुई है । सामाजिक अनुसंधान में अवलोकन विधि का विशेष महत्त्व है । यह विधि मानवीय व्यवहार व सामाजिक घटना को जितनी सरल पर निर्भर नहीं रहना पर से प्राप्त कर सकता है । इस वैतानिकता से प्रकट कर पाता है , उतनी अन्य कोई भी विधि नहीं कर पाती है । इस विधि के महत्त्वों या गुणा के दिनांकित रूप में समझा जा सकता है

    1. विस्तृत प्रचलन ( Wider Use ) : अवलोकन विधि का उपयोग लगभग सभी प्रकार के विज्ञानों में किया जाता है । जॉन मेज ( John Madge ) ने लिखा है , " समस्त आधुनिक विज्ञान अवलोकन पर ही आधारित है । " ( " All modern science is rooted in observation " ) आजकल न केवल सामाजिक सर्वेक्षणों में ही , बल्कि प्रयोगात्मक अध्ययनों में अवलोकन और भी अधिक प्रचलित होता जा रहा है ।

    2. सरलता ( Simplicity ) : अवलोकन विधि सबसे अधिक सरल मानी जाती है । साधारण प्रशिक्षण के द्वारा व्यक्ति अवलोकन करने में समर्थ हो सकता है । अन्य विधियों की भांति इसके प्रयोग में उतनी कठिनाइयाँ नहीं आती हैं । एक सामान्य व्यक्ति भी अपनी इन्द्रियों के प्रयोग के द्वारा घटना का अवलोकन कर सकता है । मानव इन्द्रियों के प्रयोग के द्वारा घटना का अवलोकन सर्वाधिक सरल है । । ( 8 ) वैज्ञानिक ज्ञान का आधार ( Basis of Scientific Knowledge ) : प्रायः सभी वैज्ञानिक मानते हैं कि अवलोकन सभा वैज्ञानिक अन्वेषणों का आधार है । विज्ञान की शरुआत अवलोकन के द्वारा ही हुई है । साथ ही सिद्धांतों की सत्यता का परीक्षा के लिए भी अवलोकन की जरूरत पड़ती है । जिस किसी विषय ( Discipline ) को विज्ञान का दर्जा पाना होता वह अधिक - से - अधिक अवलोकन के प्रयोग पर जोर देता है । उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि अवलोकन विधि सामाजिक अनुसंधान की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विधि माना सा हा सी . ए . मोजर ( CAMoser ने लिखा है , " अवलोकन वैज्ञानिक खोज की एक अत्यन्त उच्च कोटि की विधि । । सकता है । "


    3.अध्ययन की प्रत्यक्ष विधि ( Direct Method of Studi : अवलोकन विधि में अनसंधानकर्ता स्वयं घटनाआ । वलोकन कर स्थिति का जायजा ले सकता है । इसके अन्तर्गत अनुसंधानकर्ता को सुचनादाता के अनुभवों तथा उत्तरा नहीं रहना पड़ता हा माजर का कहना है कि व्यक्तियों की दैनिक क्रियाओं का अवलोकन समाजशास्त्रियों का पकार के तथ्य प्रदान करन म सक्षम होता है , जो कि वह किसी अन्य साधन द्वारा कठिनाई से ही विश्वसनीय रूप कर सकता है । इस रूप में अवलोकन सर्वाधिक उपयोगी है ।

    4. स्वाभाविक व्यवहार का अध्ययन ( Studyof Natural Behaviour ) : अवलोकन विधि के द्वारा मानवीय व्यवहार - उनकी स्वाभाविक स्थिति म अध्ययन किया जाना सम्भव है , जो कि किसी अन्य विधि द्वारा नहीं किया जा सकता । जिन जीवन इतिहास तथा गहन साक्षात्कारों के द्वारा भी वह वास्तविकता नहीं आ पाती . जो कि अवलोकन के द्वारा आती है ।

    5. गहन अध्ययन ( Intensive Study ) : अवलोकन विधि गहराई के साथ घटना की व्याख्या में सहायक होता है । का मल कारण यह है कि अनुसंधानकर्ता स्वयं घटना स्थल पर उपस्थित रहता है । साथ ही वह केवल घटने वाला लाओं को ही नहीं देखता है , बल्कि उन घटनाओं के बीच पाए जाने वाले सम्बन्धों को भी समझने का प्रयास करता ऐसी स्थिति में अवलोकन द्वारा गहन अध्ययन स्वाभाविक रूप में हो जाता है ।

    6. यथार्थता और विश्वसनीयता ( Accuracy and Reliability ) : अवलोकन विधि द्वारा एकत्रित सूचनाएँ अन्य विधियों की तुलना में अधिक यथार्थ एवं विश्वसनीय होती हैं । अन्य विधियों में अनसंधानकर्ता को सूचनादाता पर निर्भर रहना पड़ता है । सुनी हुई घटना का वृत्तान्त गलत हो सकता है । लेकिन जिस घटना को अवलोकनकर्ता ने स्वयं देखा व परखा है , उसे गलत होने की सम्भावना नहीं के बराबर है । यही कारण है कि इस विधि द्वारा प्राप्त सूचनाएं अधिक यथार्थ एवं विश्वसनीय होती हैं ।

    7. प्राक्कल्पना के निर्माण में सहायक ( Helpful in the Formation of Hypothesis ) : विज्ञान की बहुत सी प्राक्कल्पनाओं का जन्म घटनाओं के अवलोकनों के द्वारा ही हुआ है । प्राक्कल्पनाओं का निर्माण वैज्ञानिक प्रक्रिया का प्रथम चरण है । इस निर्माण कार्य में अवलोकन विधि का विशेष महत्त्व है । इसका कारण यह है कि अवलोकन बार - बार करने से अनुसंधानकर्ता के अनुभव में वृद्धि होती है । इस अनुभव के आधार पर प्राक्कल्पनाओं का निर्माण करना सम्भव होता है ।




    अवलोकन विधि की सीमाएँ या दोष

    ( Limitations or Demerits of Observation Method )

    वलोकन विधि का सामाजिक अनसंधान में एक विशेष महत्त्व है , फिर भी इस विधि की अपनी कुछ सीमा हैं । इस विधि का दोष बन जाता है । इसकी सीमाओं का उल्लेख करते हुए पी०वी० यंग ( P . V . Young ) ने लिखा है । " सभी घटनाए अवलोकन के लिए स्वतंत्र अवसर प्रदान नहीं करतीं . सभी घटनाएँ जिनका अवलोकन किया जा सकता ह , उस समय नहीं घटती जब अवलोकनकर्ता उपस्थित होता है , सभी घटनाओं का अध्ययन अवलोकन विधियों के दाम किया जाना सम्भव नहीं है । " इस प्रकार अवलोकन विधि का प्रयोग प्रत्यक स्थिति में नहीं किया जा सकता है । इसके प्रमुख दोषों या सीमाओं को निम्नांकित रूप में समझा जा सकता है ।

    1. अमूर्त घटनाओं के लिए अनुपयुक्त : कुछ घटनाएँ अमूर्त होती हैं जिनका कि अवलोकन हो ही नहीं सकता । जैसे - व्यक्तियों के विचारों , विश्वासों , मनोवृत्तियों व मूल्यों आदि ऐसे विषय हैं जिन्हें देखा जाना सम्भव नहीं है । अत : ऐसे समस्याओं के अध्ययन में अवलोकन विधि अनुपयुक्त सिद्ध होती है ।

    2.अभिमति की सम्भावना : अवलोकन विधि द्वारा अध्ययन में अनुसंधानकर्ता स्वतंत्र - सा होता है । तथ्यों व घटनाओं को देखने में प्रत्येक व्यक्ति का नजरिया अलग - अलग हो सकता है । एक व्यक्ति जिस संस्कृति में पलता है , उसका प्रभाव उसके दृष्टिकोण पर पड़ता है । अत : अनुसंधानकर्ता के व्यक्तिगत अभिमति का प्रभाव अवलोकित तथ्य पर पड़ सकता है जो कि वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए हानिकारक है ।

    3. व्यवहारों में कृत्रिमता : साधारणतया ऐसा पाया जाता है कि जिन व्यक्तियों का अवलोकन किया जा रहा है , जब कभी उन्हें इस बात का आभास हो जाता है , तब वे जानबूझकर बनावटी व्यवहार प्रदर्शन करने का प्रयत्न करते हैं । ऐसी स्थिति में अवलोकन द्वारा उनके वास्तविक एवं स्वाभाविक व्यवहार का अध्ययन कठिन हो जाता है ।

    4. भ्रामक निरीक्षण : अवलोकन आँखों के प्रयोग पर निर्भर है । लेकिन आँखों द्वारा देखी हुई घटना का विवरण भ्रामक हो सकता है । अधिकांश अवलोकन चयनात्मक ढंग से किया जाता है । अतः एक घटना जो एक व्यक्ति के लिए महत्त्वपूर्ण होती है , सम्भव है वह दूसरे के लिए कोई महत्त्व नहीं रखती हो । इस प्रकार भ्रामक निरीक्षण अवलोकन विधि का दोष है ।

    5. अधिक समय लेनेवाली एवं खर्चीली विधि : अवलोकन विधि में अध्ययन की गति धीमी होती है । विश्वसनीय निरीक्षण जल्दबाजी में सम्भव नहीं है । इसके द्वारा अध्ययन में काफी समय लगता है । समय अधिक लगने के वजह से इसमें खर्च भी अधिक होते हैं । इस प्रकार अवलोकन विधि की अपनी कुछ सीमाएँ या दोष हैं । इसके बाबजूद यह सभी प्रकार के अनुसंधान - अध्ययनों की प्रारंभिक एवं आधारभूत विधि है । अधिकांश वैज्ञानिक ज्ञान का संचय इसी विधि के द्वारा किया गया है । यदि अनुसंधानकर्ता सूझ - बूझ व ईमानदारी के साथ इस विधि का उपयोग करे तो इसके दोषों से बचा जा सकता है ।

    6. अवलोकन की अनुमति नहीं : कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिनका अवलोकन हेतु अनुसंधानकर्ता को अनमति प्राप्त नहीं होती है । जैसे - पारिवारिक जीवन में पति - पत्नी के सम्बन्ध का अवलोकन करने की अनुमति , अनुसंधानकर्ता को नहीं भी दी जा सकती है । इस प्रकार ऐसी घटनाओं का अध्ययन अवलोकन विधि द्वारा करना कठिन है ।

    7. घटनाओं की अनिश्चितता : कछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो अनिश्चित होती हैं । ऐसी घटनाओं का अध्ययन अवलोकन विधि द्वारा सम्भव नहीं है । जैसे - कॉलेज में लड़ाई - झगड़े का अध्ययन अनुसंधानकर्ता करना चाहता है । हो सकता है कि जब अनुसंधानकर्ता कॉलेज में मौजूद हों तो घटना न घटे और जब अनुसंधानकर्त्ता न रहे , तो घटना घट जाए ।

    8. भूतकालीन घटनाओं का अध्ययन सम्भव नहीं : अवलोकन विधि द्वारा अनुसंधानकर्ता प्रत्यक्ष रूप में जो कुछ देखता है , उसी का अध्ययन करता है । इसलिए भूतकाल में जो घटनाएं घटी हों या जो स्थितियाँ उत्पन्न हुई हों , उसका अध्ययन अवलोकन विधि द्वारा नहीं किया जा सकता है ।


    अवलोकन विधि के प्रकार

    ( Types of Observation Method )

    अवलोकन योग्य सामाजिक घटनाओं की प्रकृति विविध एवं जटिल है । फलस्वरूप सामाजिक अनुसंधान में अवलोकन के कई रूपों का विभिन्न स्थितियों में प्रयोग किया गया है । अत : अवलोकन के अनेक प्रकार बतलाए जाते हैं । अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इसे निम्न रूप में समझा जा सकता है


    ( 1 ) अनियन्त्रित अवलोकन ( Uncontrolled Observation ) ,

    ( 2 ) नियन्त्रित अवलोकन ( Controlled Observation ) ,

    ( 3 ) सहभागी अवलोकन ( Participant Observation ) ,

    ( 4 ) असहभागी अवलोकन ( Non - Participant Observation ) ,

    ( 5 ) अर्द्ध - सहभागी अवलोकन ( Quasi - Participant Observation )

    ( 6 ) सामूहिक अवलोकन ( Collective Observation ) ।



    ( 1 ) नियंत्रित अवलोकन ( Controlled Observation ) : नियंत्रित अवलोकन में अवलोकनकर्ता एवं अवलोकन करना । वाली सामाजिक घटना पर नियंत्रण किया जाता है । अवलोकनकर्ता पर नियंत्रण के लिए कई प्रकार के साधनों का प्रयोग किया जाता है , जैसे - अवलोकन की विस्तृत योजना बना लेना , अनुसूची व प्रश्नावली का प्रयोग मानचित्र का प्रयोग क्षेत्रीय नोटस , डायरी , फोटोग्राफ , कैमरा व टेपरिकार्डर आदि का प्रयोग । सामाजिक घटना पर नियंत्रण के लिए उन परिस्थितियों या घटकों पर नियंत्रण किया जाता है जिनका अवलोकन किया जाना है । इस प्रकार एक ऐसे कृत्रिम वातावरण की सष्टि की जाती है जिसमें परिस्थितियाँ या घटक यथावत बनी रहे ।

    ( 2 ) अनियंत्रित अवलोकन ( Uncontrolled Observation ) : अनियंत्रित अवलोकन में स्वाभाविक व वास्तविक जीवन की घटनाओं का सतर्कतापूर्वक अध्ययन किया जाता है । इसके अन्तर्गत घटनाएँ जिस रूप में घटित हो रही हैं , उन्हें उसी रूप में देखने का प्रयत्न किया जाता है । इसमें न तो अवलोकनकर्ता पर और ना ही घटना या परिस्थिति पर नियंत्रण होता है । इसके तीन रूप हैं —

    ( 1 ) सहभागी अवलोकन ,

    ( II ) असहभागी अवलोकन एवं

    ( III ) अर्द्ध - सहभागी अवलोकन

    ( 1 ) सहभागी अवलोकन ( Participant Observation ) : इसका प्रयोग सर्वप्रथम लिंडमैन ( Lindeman ) ने 1924 में किया था । सहभागी अवलोकन के माध्यम से अध्ययन के लिए अवलोकनकर्ता उस समूह का सदस्य बनता है जिसका अध्ययन करना है । समूह की क्रियाओं में भाग लेते हुए अवलोकन करता रहता है । सहभागिता के सन्दर्भ में दो विचारधाराएँ हैं । प्रथम , अमेरिकन समाज वैज्ञानिकों के अनुसार अपना परिचय को अवलोकनकर्ता गुप्त रखें । द्वितीय , भारतीय समाज वैज्ञानिकों के अनुसार अपना परिचय व अध्ययन - उद्देश्य को गुप्त नहीं रखना चाहिए ।

    ( II ) असहभागी अवलोकन ( Non - Participant Observation ) : असहभागी अवलोकन में अवलोकनकर्ता समुदाय या समूह का न तो अस्थाई सदस्य बनता है और न ही उसकी क्रियाओं में भागीदार बनता है , एक तटस्थ व्यक्ति की तरह घटनाओं को देखता है व उसकी गहराई तक पहुंचने का प्रयास करता है ।

    ( III ) अर्द्ध - सहभागी अवलोकन ( Quasi Participant Observation ) : अर्द्ध - सहभागी अवलोकन सहभागी व असहभागी अवलोकन का सम्मिलित रूप है । इस प्रकार के अवलोकन में अवलोकनकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समुदाय या समूह के कुछ कार्यों में भाग लेता है और अधिकांशत : तटस्थ भाव से बिना भाग लिए उसका अवलोकन करता है ।

    ( 3 ) सामूहिक अवलोकन ( Mass Observation ) : जब अवलोकन कार्य अनेक व्यक्तियों के द्वारा सामूहिक रूप से किए जाते हैं , तब इसे सामूहिक अवलोकन कहा जाता है । सामूहिक अवलोकन के अन्तर्गत एक घटना के विभिन्न विषयों से सम्बन्धित अनेक विशेषज्ञ होते हैं । ये विशेषज्ञ अपना - अपना अवलोकित तथ्य एक केन्द्रीय व्यक्ति के पास जमा कर देते हैं । उस केन्द्रीय व्यक्ति के द्वारा उन एकत्रित तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है ।



  • QUESTIONNAIRE12:25




    तथ्यों के प्राथमिक तथा द्वितीयक स्त्रोत

    ( Primary and Secondary Sources of Data )



    । अनुसन्धान या शोध की सफलता इसी बात पर निर्भर रहती है कि अनुसन्धानकर्ता अपने अध्ययन - विषय के सम्बन्ध में कितने वास्तविक निर्भरयोग्य सूचनाओं और तथ्यों को एकत्रित करने में सफल होता है । यह सफलता सूचना प्राप्त करने के स्त्रोतों की विश्वसनीयता पर निर्भर करती है । अतः सूचना या तथ्यों के स्त्रोत के महत्व को सामाजिक अनुसन्धान के क्षेत्र में कम नहीं किया जा सकता । साथ ही , ये सूचनाएँ या तथ्य एक ही प्रकार के नहीं होते हैं , इनमें भी कई प्रकार भेद हैं । इन प्रकारों के विषय में भी स्पष्ट ज्ञान का होना एक सफल अनुसन्धानकर्ता के लिए आवश्यक है । किस स्त्रोत से किस प्रकार की सूचना उसे प्राप्त हो सकती है इस बात की स्पष्ट जानकारी न होने पर अनुसन्धानकर्ता केवल इधर - उधर भटकता ही रहेगा और उसका काफी समय तथा श्रम व्यर्थ चला जाएगा । अतः सूचना या तथ्या क प्रकार तथा स्त्रोतों के बारे में ज्ञान आवश्यक है ।



    तथ्यों या सूचना के प्रकार

    ( Types of Data or Information )


    सामाजिक अनुसन्धान या शोध में दो प्रकार की सूचनाओं या तथ्यों की आवश्यकता होती है - ( 1 ) प्राथमिक तथ्य या सूचनाएँ तथा ( 2 ) द्वितीयक तथ्य या सूचनाएँ । • प्राथमिक तथ्य या सूचनाएँ ( Primary Data or Information ) प्राथमिक तथ्य वे मौलिक सूचनाएँ या आँकड़े होते हैं जो कि एक अनुसन्धानकत्ता वास्तविक अध्ययन - स्थल ( field ) में जाकर विषय या समस्या से सम्बन्धित जीवित व्यक्तियों से साक्षात्कार ( interview ) करके अथवा अनसूची और प्रश्नावली का सहायता से एकत्रित करता है अथवा प्रत्यक्ष निरीक्षण के द्वारा प्राप्त करता है । प्राथमिक तथ्य प्राथमिक इस अर्थ में होते हैं कि उन्हें अनुसन्धानकर्ता अपने अध्ययन - उपकरणों की सहायता से प्रथम बार एकत्रित करता है अथवा निरीक्षण करता है ।

    पी . वी . यंग के अनुसार , " प्राथमिक तथ्य - सामग्री का तात्पर्य उन सचनाओं व आंकड़ों से है जिनको पहली बार संकलित किया गया हो तथा जिनके संकलन का उत्तरदायित्व शोधकर्ता या सर्वेक्षणकर्ता का अपना है । " यहाँ यह बात स्पष्ट है कि प्राथमिक तथ्यों का संकलन या तो शोधकर्ता स्वयं करता है या अपनी देखरेख में सहायकों से कराता है । इस प्रकार की सामग्री या तथ्य क्षेत्रीय कार्य के आधार पर प्राप्त किए जाते हैं । इस प्रकार प्राथमिक तथ्यों को एकत्रित करने के दो प्रमुख स्त्रोत ( sources ) हैं ।


    पहले स्त्रोत के अंतर्गत वे व्यक्ति आते हैं जो कि अध्ययन - विषय या समस्या के सम्बन्ध में ज्ञान रखते हैं अथवा दीर्घ समय से उसके घनिष्ठ सम्पर्क में हैं । प्राथमिक तथ्यों का दूसरा स्त्रोत प्रत्यक्ष निरीक्षण है । इस प्रकार के निरीक्षणों के द्वारा एक समुदाय या समूह के जीवन सम्बन्धी अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों को एकत्रित किया जा सकता है यदि निरीक्षण के दौरान अनुसन्धानकर्ता बिल्कुल निष्पक्ष रहे । व्यक्ति के व्यवहार सम्बन्धी तथ्यों को एकत्रित करने के लिए प्रत्यक्ष निरीक्षण एक अति उत्तम स्त्रोत है । सहभागी निरीक्षण के द्वारा सामुदायिक जीवन से सम्बन्धित अति आन्तरिक व गुप्त बातों को भी जाना जा सकता है




    द्वितीय तथ्य या सूचनाएँ तथ्य

    ( Secondary Data or Information )


    द्वितीयक तथ्य वे सूचनाएँ और आँकड़े हैं जो कि अनुसन्धानकर्ता को प्रकाशित व अप्रकाशित प्रलेखों ( documents ) , रिपोर्ट , सांख्यिकी ( statistics ) , पाण्डुलिपि , पत्र - डायरी , टेप , वीडियो कैसेट या इन्टरनेट आदि से प्राप्त होते हैं । द्वितीयक तथ्यों की उल्लेखनीय विशेषता यह होती है कि ये तथ्य , सूचनाएँ या आँकड़े स्वयं , अनुसन्धानकर्ता अपने कार्य में उपयोग करने के लिए एकत्रित कर लेता है । पी . वी . यंग के अनुसार , " द्वितीयक तथ्य वे होते हैं जिन्हें मौलिक स्त्रोतों से एक बार प्राप्त कर लेने के पश्चात् काम में लिया गया हो एवं जिनका प्रसारण अधिकारी उस व्यक्ति से भिन्न होता है जिसने प्रथम बार तथ्य संकलन को नियन्त्रित किया था । " स्पष्ट है कि द्वितीयक तथ्य वे होते हैं जिनका एकत्रीकरण स्वयं शोधकर्ता या उसके सहायकों द्वारा नहीं किया गया हो , परन्तु जिसने किसी अन्य अध्ययन हेतु किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा संकलित सामग्री का उपयोग किया हो । इस सामग्री या तथ्यों का उपयोग करने वाला इसके क्षेत्रीय संकलन से सम्बन्धित नहीं होता र अन्य शब्दों में जब कोई शोधकर्ता , अन्य शोधकर्ता , संस्था , संगठन या किसी सरकारी या गैर - सरकारी एजेन्सी द्वारा एकत्रित सामग्री या तथ्यों का स्वयं के अध्ययन हेतु उपयोग करता है तो उसके लिए वह सामग्री द्वितीयक सामग्री या तथ्य होंगे । यहाँ इसे एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करना उचित रहेगा । यदि कोई शोधकर्ता 2001 की जनगणना - रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित सामग्री में से कुछ तथ्यों का चयन कर अपने अध्ययन हेतु उपयोग करता है तो ऐसे तथ्य उसके लिए द्वितीयक तथ्य कहलाएंगे । किर्स अध्ययन में द्वैतीयक तथ्यों का उपयोग उस समय किया जाता है जब विषय की प्रकृति ऐसी हो कि सभी तथ्यों को नवीन सिरे से एकत्र करना आवश्यक नहीं हो तथा उस विषय से सम्बन्धित अन्य द्वारा एकत्रित तथ्य पहले से उपलब्ध हों । शोधकर्ता को अपने सीमित साधनों के कारण भी कई बार द्वितीयक समाग्री का उपयोग करना पड़ता है । द्वितीयक सामग्री को काम में लेने हेतु शोधकर्ता का कार्य - कुशल और सूझ - बूझ वाला होना आवश्यक है । यह सामग्री काफी विविधता लिए हुए होती है । अतः इसमें से शोधकर्ता को आवश्यक तथ्यों को संकलित करना होता है । द्वितीयक तथ्यों के भी दो प्रमुख स्त्रोत होते हैं - पहले व्यक्तिगत प्रलेख ( personal documents ) जैसे - आत्मकथा , डायरी , पत्र आदि और दूसरे सार्वजनिक प्रलेख ( public documents ) जैसे - रिकार्ड , पुस्तकें , जनगणना रिपोर्ट , विशिष्ट कमेटियों की रिपोर्ट , समाचारपत्र व पत्रिकाओं में प्रकाशित सूचनाएँ , न्यूज़रील , कम्प्यूटर सी . डी . या इन्टरनेट वैबसाइट आदि । लुण्डबर्ग के अनुसार शिलालेख , स्तूप विभिन्न खुदाइयों से प्राप्त अस्थिपिंजर , भौतिक वस्तु आदि ऐतिहासिक स्त्रोत से प्राप्त तथ्य या सूचनाएँ भी द्वितीयक तथ्यों के अन्तर्गत आते हैं ।



    प्राथमिक तथा द्वितीयक तथ्यों में अन्तर

    ( Distinction between Primary and Secondary Data )



    उपर्युक्त विवेचना के आधार पर प्राथमिक तथा द्वितीयक तथ्यों में पाए जाने वाले


    अन्तर को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है


    ( 1 ) वास्तव में प्राथमिक एवंद्वतीयक तथ्य सापेक्ष हैं । किसी अध्ययन में कौन तथ्य प्राथमिक और कौन से तथ्य द्वितीयक होंगे , यह शोध के लक्ष्य से सम्बन्धित एक शोधकर्ता के लिए जो तथ्य प्राथमिक हैं . वे ही अन्य शोधकर्ताओं के अध्ययन में प्रयुक्त होने पर द्वितीयक कहलायेंगे ।


    ( 2 ) प्राथमिक तथ्यों को द्वितीयक तथ्यों की तुलना में अधिक मौलिक ( Original ) माना जाता है । क्योंकि इनका संकलन स्वयं शोधकर्ता के द्वारा अध्ययन की आवश्यकता के अनुसार किया जाता है । इस मौलिकता का द्वैतीयक तथ्यों में सापेक्ष रूप से अभाव पाया जाता है ।


    ( 3 ) प्राथमिक तथ्य द्वितीयक तथ्यों की तुलना में अधिक विश्वसनीय होते हैं । क्योंकि इन्हें शोधकर्ता या अन्वेषणकर्ता अपनी प्राक्कल्पनाओं के परीक्षण हेतु अथवा अध्ययन - विषय के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए किसी वैज्ञानिक प्रविधि द्वारा वस्तुनिष्ठ तरीके से स्वयं या अपने निर्देशन में संकलित करता है । ये तथ्य ऐसे होते हैं जिनका अन्य वैज्ञानिकों द्वारा सत्यापन किया जा सकता है । यहाँ हमें यह नहीं सोच लेना चाहिए कि द्वितीयक तथ्य प्राथमिक तथ्यों की तुलना में घटिया किस्म के होते हैं । कहने का तात्पर्य केवल यही है कि प्राथमिक तथ्य तुलनात्मक दृष्टि से अधिक विश्वसनीय एवं प्रामाणिक होते हैं ।


    ( 4 ) प्राथमिक तथ्य क्षेत्रीय कार्य के आधार पर प्रथम बार एकत्रित किये जाने के कारण नवीन होते हैं । जबकि द्वितीयक तथ्य पूर्व में किये गये अन्वेषणों के अन्तर्गत संकलित किये जाने के कारण पुराने होते हैं । उनका यह पुरानापन कई बार वर्तमान का विश्लेषण करने में कठिनाई पैदा करता है ।


    ( 5 ) प्राथमिक तथ्यों का प्रयोग प्रथम बार किया जाता है अर्थात प्रथम बार एकत्रित किये गये तथ्यों का प्रथम बार उपयोग किया जाता है । उन्हीं तथ्यों का दूसरी बार उपयोग करने पर वे द्वितीयक तथ्यों के नाम से जाने जाते हैं ।


    ( 6 ) प्राथमिक तथ्य शोधकर्ता के स्वयं के निर्देशन में एकत्रित किये जाते हैं । जबकि द्वितीयक तथ्य अन्य के द्वारा एकत्रित एवं उपयोग किये हुए होते हैं ।


    ( 7 ) प्राथमिक तथ्यों का संकलन शोधकर्ता अपनी अध्ययन - समस्या के अनुरूप स्वयं करता है । अतः वह सुगमता से इस बात का निर्णय कर पाता है कि उसके अध्ययन के लिए कौनसे तथ्य उपयोगी हैं , और कौनसे अनुपयोगी हैं , किन्हें , अध्ययन में सम्मिलित किया जाना चाहिए और किन्हें हटा दिया जाना चाहिए । द्वितीयक तथ्यों के संकलनकर्ता को कई बार उन महत्वपूर्ण तथ्यों के संकलन से वंचित । रहना पड़ता है जिन्हें निरर्थक समझकर प्राथमिक तथ्यों के संकलनकर्ता ने अध्ययन में सम्मिलित नहीं किया । इन अन्तरों को संक्षेप में निम्न प्रकार से समझा जा सकता है I


    ( 1 ) मौलिकता - अधिक मौलिक माना ( 1 ) अपेक्षाकृत कम मौलिक माना जाता जाता है । ( 2 ) विश्वसनीयता - अधिक विश्वसनीय ( 2 ) तुलनात्मक दृष्टि से कम विश्वसनीय होते हैं । होते हैं । ( 3 ) स्वरूप - प्राथमिक तथ्य नवीन होते ( 3 ) -संकलित किये जाने के कारण पुराने होते हैं । ( 4 ) प्रयोग - प्रथम बार किया जाता है । ( 4 ) बार - बार प्रयोग किया जाता है । ( 5 ) संकलन - शोधकर्ता के स्वयं के निर्देशन ( 5 ) अन्य के द्वारा एकत्र या उपयोग किये में होता है । _ _ गये होते हैं । ( 6 ) आवश्यकता - शोधकर्ता अपने ( 6 ) शोधकर्ता को पूरी तरह द्वितीयक तथ्यों अध्ययन के आवश्यकतानुसार तथ्य पर निर्भर रहना पड़ता है । संकलित करता है ।


    आँकड़ों के प्रकार , स्वरूप एवं स्रोतों की विस्तृत विवेचना के उपरान्त अब हम आँकड़ों को संकलित करने की प्रमुख प्रविधियों ( Techniques ) की विस्तृत विवेचना करेंगे ये प्रमुख प्रविधियाँ निम्नांकित हैं


    1 . प्रश्वावली ( Questionnaire ) ,

    2 . अनुसूची ( Schedule ) ,

    3 . साक्षात्कार ( Interview ) ,

    4 . अवलोकन ( Observation ) ।






    प्रश्नावलियां

    ( Questionnaires )




    प्रश्नावली ( Questionnaire ) सामाजिक अनुसन्धान प्रक्रिया में अनुसन्धानकर्ता आँकड़े एकत्रित करने के लिए जिन विधियों क प्रयोग करता है , उनमें प्रश्नावली ( Questionnaire ) का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । प्रश्नावली अनेक प्रश्नों ( Questions ) से युक्त एक मी मची होती है , जिसमें अध्ययन - विषय से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों के बारे में पहले से तैयार किए गए प्रश्नों का समावेश होता है । अनुसन्धानकर्ता इस मची को डाक ( Mail ) से उत्तरदाताओं के पास भेजता है । उत्तरदाता स्वयं उसे पढ़कर , समझकर एवं उसमें पूछे गये प्रश्नों के उत्तर भरकर पुनः डाक से उसे अनुसन्धान कर्ता को प्रेषित कर देते हैं । आधुनिक अनुसंधानों में प्रश्नावली का उद्देश्य अध्ययन - विषय से सम्बन्धित प्राथमिक तथ्य - सामग्री ( Primary Data ) को एकत्र करता है । प्रश्नावली का अर्थ उस सुव्यवस्थित तालिका से है जो विषय के सम्बन्ध में सूचनाएँ प्राप्त करने में सहयोग देती है । सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक सर्वेक्षणों में तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करने के लिए , प्रश्नावली को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पद्ध ति माना जाता है । साधारणतः किसी विषय से सम्बन्धित व्यक्तियों से सूचना प्राप्त करने के लिए बनाए गए . प्रश्नों की सुव्यवस्थित सूची को प्रश्नावली की संज्ञा दी जाती है । इटेक द्वारा . भेज कर सूचना प्राप्त की जाती है ।


    गुडे तथा हॉट्ट के शब्दों में , " सामान्य रूप से , " प्रश्नावली ' शब्द प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने की उस प्रणाली को कहते हैं जिसमें स्वयं उत्तरपसा द्वारा भर । जाने वाले पत्रक ( Form ) का प्रयोग किया जाता हैं । "


    लुण्डबर्ग ( Lundberg ) के शब्दों में , " मौलिक रूप में , प्रश्नावली प्रेरणाओं का एक समूह है जिसे कि शिक्षित लोगों के सम्मुख , उन प्रेरणाओं के अन्तर्गत उनके मौखिक व्यवहारों का अवलोकन करने के लिए प्रस्तुत किया जाता है । " विल्सन - गी के शब्दों में , " यह ( प्रश्नावली ) बड़ी संख्या में लोगों से अथवा छोटे चुने हुए एक समूह से जो विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है , सीमित मात्रा में सूचना प्राप्त करने की एक सुविधाजनक प्रणाली है । "


    बोगार्डस के अनुसार , " प्रश्नावली विभिन्न व्यक्तियों को उनर देने के लिए दी गई प्रश्नों की एक तालिका है । "



    अच्छी प्रश्नावली की विशेषताएँ

    ( Features of aGood Questionnaire )


    - ए० एल० बॉउले ( A . L . Bowley ) के अनुसार अच्छी प्रश्नावली की निम्नलिखित विशेषताएं हैं

    ( 1 ) प्रश्नों की संख्या कम होनी चाहिए ।

    ( 2 ) प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनका उत्तर ' हाँ ' या ' नहीं ' में दिया जा सकता हो ।

    ( 3 ) प्रश्नों की संरचना ऐसी होनी चाहिए कि व्यक्तिगत पक्षपात प्रवेश ही न कर पाए ।

    ( 4 ) प्रश्न सरल , स्पष्ट और अर्थ वाले होने चाहिए ।

    ( 5 ) प्रश्न एक दूसरे को पुष्ट करने वाले हों ।

    ( 6 ) प्रश्नों की प्रकात ऐसी होनी चाहिए कि अभीष्ट सूचना को प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त किया जा सके ।

    ( 7 ) प्रश्न अशिष्ट नहीं होने चाहिए ।


    प्रश्नावली की विश्वसनीयता ( Reliability of Questionnaire ) अब प्रश्न यह उठता है कि उत्तरदाताओं ने जो फूछ सूचनाएं दी है , वे कहाँ तक विश्वसनीय है । विश्वसनीयता का पता तभी लग जाता है जब अधिकतर प्रश्नों के अर्थ अलग - अलग लगाए गए हों , ऐसी स्थिति में शंका उत्पन्न हो जाती है । अविश्वसनीयता की समस्या निम्नलिखित कारणों से उत्पन्न होती है


    गलत एवं प्रसंगत प्रश्न ( Wrong and Irrelevant Questions ) जब गलत और असंगत प्रश्नों को प्रश्नावली में सम्मिलित किया जाता है तो उनके उत्तर भी उत्तरदाता अपने - अपने दृष्टिकोण से देते हैं । ऐसी स्थिति में उत्तरदाताओं द्वारा दी गई सूचनाएँ विश्वसनीय नहीं हो सकतीं ।


    पक्षपातपूर्ण निदर्शन ( Biased Sample ) - - निदर्शन का चयन करते समय यदि सावधानी नहीं रखी गई तो उसके परिणामों में विश्वसनीयता नहीं आ सकती है । यदि सूचनादाताओं के चयन में अनुसंधानकर्ता प्रभावित हुआ है तो निश्चित रूप से प्राप्त सूचना प्रतिनिधित्वपूर्ण नहीं हो सकती ।


    नियन्त्रित पक्षपातपूर्ण उत्तर ( Controlled and Biased Responses ) — प्रश्नावली प्रणाली द्वारा प्राप्त उत्तर बहुधा कम सही होते हैं । कुछ लोग गोपनीय एवं व्यक्तियत सूचनाएं देने से संकोच करते हैं और अपने हाथ से लिख कर देने से डरते हैं । अत : उनके उत्तरों में पक्षपात की भावना होती है । उनके उत्तरों में या तो तीव्र आलोचना मिलेगी या पूर्ण सहमति । संतुलित उत्तर प्राप्त नहीं हो पाते ।


    विश्वसनीयता की जांच ( Test of Reliability ) - - प्रश्नावलियों में दिए गए उत्तरों में विश्वसनीयता प्रायः कम पाई जाती है इसीलिए उनकी जांच कर लेनी चाहिए । इसके कतिपय तरीके निम्नवत हैं


    ( i ) प्रश्नावलियों को पुन : मेजना ( Sending Questionnaire Again ) विश्वसनीयता की परख के लिए प्रश्नावलियों को उत्तरदाताओं के पास पुनः भेज देना चाहिए । यदि उनके उत्तर इस बार भी पहले की तरह मेल खाते हैं तो प्राप्त सूचना पर विश्वास किया जा सकता है । यह जांच तभी उपयोगी सिद्ध हो सकती है जब उनरदाना की सामाजिक , आर्थिक या मानसिक परिस्थिति में कोई परिवर्तन न हुअा हो


    (ii)समान वर्गों का अध्ययन ( Study of Similar Groups ) विश्वसनीयता की जांच के लिए वही प्रश्नावली अन्य समान वर्गों के पास भेजी जाए । यदि उनमे प्राप्त उत्तरों और पहले वाले वर्गों द्वारा दिए गए उत्तरों में समानता है ।तो दी गई सूचना पर विश्वास किया जा सकता है । यदि दोनों में काफी अन्तर है तो विश्वास नहीं किया जा सकता ।


    ( iii ) उपनिवर्शन का प्रयोग करना ( Using a Sub - sample ) - यह भी जांच करने की एक महत्वपूर्ण विधि है । प्रमुख निदर्शन में से एक उपनिदर्शन का चयन कर , प्रश्नावली की परख की जा सकती है । उपनिदर्शन से प्राप्त सूचनामों और प्रमुख निदर्शन से प्राप्त सूचनाओं में यदि काफी अन्तर पाया जाता है तो प्रश्नावली अविश्वसनीय समझी जाएगी । यदि दोनों में बहुत कम असमानता है तो इसे विश्वसनीय समझा जाएगा ।


    ( iv ) अन्य तरीके ( Miscellaneous Methods ) - प्रश्न पद्धतियों में साक्षात्कार , अनुसूची एवं प्रत्यक्ष निरीक्षण को सम्मिलित किया जा सकता है । इन विधियों द्वारा प्रश्नों के उत्तर लगभग समान हों तो प्रश्नावली को विश्वसनीय समझा जाएगा , अन्यथा नहीं ।





















    प्रश्नावली के प्रकार

    ( Types of Questionnaire )



    सभी प्रश्नावलियां समान प्रकृति की नहीं होती । अध्ययन की प्रकृति , प्रश्नों के प्रकार तथा उत्तरदाताओं की विशेषताओं के दष्टिकोण में एक - दूसरे से भिन्न अनेक प्रकार की प्रश्नावली बनाई जा सकती हैं । लण्डबर्ग ने प्रश्नावली के दो मुख्य प्रकारों का उल्लेख किया है - तथ्य सम्बन्धी प्रश्नावली , तथा मत पीर मनोवृत्ति सम्बन्धी प्रश्नावली । । प्रथम श्रेणी की प्रश्नावलियो ये हैं जिनका उपयोग किसी समूह की सामाजिक अथवा प्राथिक दशाओं से सम्बन्धित तथ्यों का संग्रह करने के लिए किया जाता है । दूसरी श्रेणी की प्रश्नावली का उद्देश्य एक विशेष विषय पर उत्तरदाताओं की रुचियों , विचारों अथवा मनोवृत्तियों को जानना होता है ।


    लुण्डबर्ग के अनुसार , इसके दो प्रकार हैं


    ( i ) तथ्य सम्बन्धी प्रश्नावली ( Questionnaire of fact ) सामाजिक तथ्यों को एकत्र करने के लिए काम में लाई जाती है ।

    ( ii ) मत तथा मनोवृत्ति सम्बन्धी प्रश्नावली ( Questionnaire of opinion and attitude )

    उत्तरदाता की अभिरुचि से सम्बन्धित सूचनामों को प्राप्त करने के लिए काम में लाई जाती है । श्रीमती यंग ने भी दो प्रकार बतलाए हैं - - ( i ) संरचित प्रश्नावली ( Structured Questionnaire ) - इसको रचना अनुसंधान शुरू करने से पूर्व कर ली जाती है ।( ii ) असंरचित प्रश्नावली ( Non - structured Questionnaire ) - इसके अन्तर्गत प्रश्नों को पहले से नहीं बनाया जाता है बल्कि मात्र अध्ययन विषय , क्षेत्र आदि के सम्बन्ध में उल्लेख होता है ।

    इसके अलावा प्रश्नावली के कुछ और भी प्रकार हैं - -


    ( क ) खुली प्रश्नावली ( Open Questionnaire ) - - जिन प्रश्नावलियों में पाताा को अपना उत्तर व्यक्त करने में पर्ण स्वतन्त्रता हो , उसे खली प्रश्नावली कहते हैं । वह अपनी स्वेच्छा से उत्तर दे सकता है , उस पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगाया जाता ।


    ( ख ) चित्रमय प्रश्नावली ( Pictorial Questionnaire ) - - चित्रमय प्रश्नावली में प्रश्नों के उत्तर चित्रों द्वारा दिखाए जाते हैं । उत्तरदाता के समक्ष अलग - अलग चित्र होते हैं जिनके आगे लिखा होता है कि क्या आप छोटे परिवार को पसंद करते हैं या बड़े परिवार को । इन चित्रों में परिवार को छोटे से बड़ा बताया जाता है , उत्तरदाता को सिर्फ उसके आगे निशान अंकित करना होता है । इस प्रश्नावली द्वारा बाद में लोगों के मतों का पता लगा लिया जाता है । यह प्रणाली विशेष रूप से कम पढ़े लिखे लोगों तथा बालकों के लिए बड़ी उपयोगी है ।


    ( ग ) मिश्रित प्रश्नावली ( Mixed Questionnaire ) - - इसमें सभी प्रकार को प्रश्नावलियों को सम्मिलित किया जा सकता है । कुछ सामाजिक तथ्य इतने जटिल होते हैं कि उनके बारे में जानकारी किमी एक निश्चित प्रश्तावली द्वारा नहीं हो सकती , अत : सुविधा और उपयोगिता की दृष्टि से विभिन्न प्रश्नावलियों को सम्मिलित किया जाता है ।



    पी . वी . यंग ने भी प्रश्नावली के दो भागों का उल्लेख किया है - संरचित प्रपनावली तथा असंरचित प्रश्नावली । प्रस्तुत विवेचन में हम प्रश्नावली के उन सभी सामान्य प्रकारों का वर्गीकरण प्रस्तुत करेंगे जिसका उपयोग विभिन्न परिस्थितियों में किया जा सकता है


    ( 1 ) संचरित प्रश्नावली ( Structured Questionnaire ) संरचित प्रश्नावली सामाजिक सर्वेक्षण अथवा अनुसन्धान में प्रयोग की जाने वाली वह प्रश्नावली है जिसकी रचना वास्तविक अध्ययन प्रारम्भ होने से पहले ही कर ली जाती है और साधारणतया बाद में इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया जाता है । पी . वी . यंग ने लिखा है " संरचित प्रश्नावलियाँ वे होती हैं जिनमें कि निश्चित . स्पष्ट तथा पूर्व - निर्धारित प्रश्नों के अतिरिक्त ऐसे अतिरिक्त प्रश्न भी सम्मिलित रहते हैं जो अपर्याप्त उत्तरों में स्पष्टीकरण करने या अधिक विस्तृत उत्तर प्राप्त करने के लिए आवश्यक समझे जाते हैं । " सम्भवतः इसी आधार पर जहोदा एवं कुक ने संरचित प्रश्नावली को ' मानक प्रश्नावली ' का नाम दिया है । मी प्रश्नावली का उपयोग एक विस्तृत अध्ययन क्षेत्र में फैले हुए व्यक्तियों से प्राथमिक तथ्यों का संकलन करने तथा संकलित तथ्यों की पुनपरीक्षा करने के लिए किया जाता है । संरचित प्रश्नावली में जिन प्रश्नों का समावेश किया जाता है वे अत्यधिक निश्चित , क्रमबद्ध और स्पष्ट होते हैं तथा प्रत्येक उत्तरदाला के लिए इनकी प्रकृति समान होती है । इसके परिणामस्वरूप ऐसी प्रश्नावली से प्राप्त उत्तरों का वर्गीकरण करना अधिक सरल हो जाता है । साधारणतया किसी समूह की सामाजिक - प्राथिक विशेषतामों का अध्ययन करने अथवा प्रशासनिक स्तर पर परिवर्तन हेतु व्यक्तिरों के सुझाव जानने के लिए ऐसी प्रश्नावली का उपयोग किया जाता है ।


    ( 2 ) असरचित प्रश्नावली ( Unstructured Questionnaire ) कैण्ट का कथन है कि " असंरचित प्रश्न वली वह होती है जिसमें कुछ निश्चित विषय - क्षेत्रों का समावेग होता है और जिनके बारे में साक्षात्कार के दौरान ही सुचना प्राप्त करनी होती है लेकिन इस प्रणाली में प्रश्नों के स्वरूप और उनके क्रम का निर्धारण करने में अध्ययनकर्ता को काफी स्वतन्त्रता प्राप्त होती है । इससे स्पष्ट होता है कि असरचित प्रश्नावली का निर्माण वास्तविक अध्ययन करने से पहले ही नहीं कर लिया जाता । इसके अन्तर्गत केवल उन विषयों का उल्लेख होता है जिनके सम्बन्ध में उत्तरदाता से सूचनाएँ प्राप्त करनी होती हैं । एक अध्ययनकर्ता ऐसी प्रश्नावली की सहायता से प्रारम्भ में यह ज्ञात करने का प्रयत्न करता है कि किस प्रकार के प्रश्नों और उनके एक विशेष क्रम के द्वारा सर्वोत्तम सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं । यही कारण है कि ऐसी प्रश्नावली ' साक्षात्कार निर्देशिका ' हमें तभी लाभदायक होती है जब अध्ययन का क्षेत्र सीमित हो तथा प्रत्येक उत्तरदाता से सम्पर्क स्थापित करना सम्भव हो । इसके पश्चात् भी कुछ विद्वान् असंरचित प्रश्नावली को प्रश्नावली का एक प्रकार न मानकर साक्षात्कार विधि के आधार के रूप में देखते हैं । इसका कारण यह है कि प्रश्नावली के अन्तर्गत साक्षात्कार की प्रक्रिया का कोई स्थान नहीं होता । इस दष्टिकोण से प्रश्नावली के प्रकारों में पी . वी . यंग द्वारा प्रस्तुत असरचित प्रश्नावली का उल्लेख करना अधिक उपयुक्त पतीत नहीं होता ।


    ( 3 ) बन्द प्रश्नावली ( Closed Questionnaire ) प्रश्नावली का यह प्रकार प्रत्यधिक महत्वपूर्ण है । इसके अन्तर्गत प्रत्येक प्रश्न के सामने उसके अनेक सम्भावित उत्तर दे दिये जाते हैं तथा उत्तरदाता को उन्हीं उत्तरों में से किसी एक उत्तर को चूनकर अपने विचारों को अभिव्यक्त करना होता है । उदाहरण के लिए , यदि प्रश्न की प्रकृति इस प्रकार हो कि - 1984 के आम चुनाव में पापने अपना वोट किस आधार पर दिया ? दल की नीतियों और कार्यक्रमों को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवार के गुणों को देखते हुए यह देखते हए कि अधिक लोग किसे वोट दे रहे हैं / पड़ौसियों के दबाव को देखते हुए कोई निश्चित आधार नहीं ; तो ऐसे प्रश्न को हम ' बन्द प्रश्न ' तथा इस प्रकार के प्रश्नों से बनने वाली प्रश्नावली को बन्द अथवा प्रतिबन्धित प्रश्नावली कहेंगे । ऐसे प्रश्नों के अनेक दूसरे भी उदाहरण हो सकते हैं - जैसे आप किस पाय वर्ग के अन्तर्गत पाते हैं ? 100 रु . मासिक से कम / 100 से 200 रु . तक 200 से 300 रु . तक / 300 से 400 रु . तक / 400 रु . से अधिक । स्पष्ट है कि बन्द प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उत्तरदाता को अनेक विकल्पों में से किसी एक विकल्प का चयन करना पड़ता है । ऐसी प्रश्नावली का प्रमुख लाभ यह है कि इससे प्राप्त सूचनाओं का सरलता से सारणीयन करके उनका वर्गीकरण किया जा सकता है ।


    ( 4 ) खुली हुई प्रश्नावली ( Open Questionnaire ) इस प्रकार की प्रश्नावली में प्रश्नों के साथ उनके सम्भावित उत्तर नहीं दिए जाते बल्कि उत्तरदाता से यह आशा की जाती है कि वह अपनी इच्छानुसार कोई भी उत्तर दे । इसमें प्रत्येक प्रश्न के सामने कुछ स्थान रिक्त छोड़ दिया जाता है जिससे उस खाली स्थान पर उत्तरदाता अपना उत्तर लिख सके ।


    5 ) चित्रमय प्रश्नावली ( Pictorial Questionnaire ) साधारणतया प्रश्नावली का उपयोग केवल शिक्षित समूह के लिए ही किया जाता है लेकिन यदि कोई समूह कम शिक्षित हो और दूसरी ओर यहाँ व्यक्तियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित करना किसी कारण कठिन समझा जाता हो तो ऐसी स्थिति में चित्रमय प्रश्नावली के द्वारा तथ्यों का संग्रह करने का प्रयत्य किया जाता है । ऐसी प्रश्नावली में प्रत्येक प्रश्न को बहुत सरल ढंग से प्रस्तुत किया जाता है और उसके सम्भावित उत्तरों के स्थान पर विभिन्न चित्र इस प्रकार प्रदशित किए जाते हैं जिससे उत्तरदाता चित्रों के आधार पर अपने उत्तर को सरलता से चिह्नित कर सके । उदाहरण के लिए यदि प्रश्न यह हो कि आप गांव में रहना पसन्द करेंगे अथवा नगर में ? तथा प्रश्न के आगे नगर और गाँव का चित्र बना दिया जाए तो उत्तरदाता सरलता से किसी एक पर चिह्न लगाकर अपनी पसन्द अभिव्यक्त कर सकता है । बच्चों की मनोवृत्तियों अथवा रुचि का अध्ययन करने के लिए भी ऐसी प्रश्नावलियां उपयोग में लाई जाती हैं ।


    6 ) मिश्रित प्रश्नावली ( Mixed Questionnaire ) जैसा कि नाम से स्पष्ट है , मिश्रित प्रश्नावली वह होती है जिसमें प्रश्नों की प्रकृति किसी एक स्वरूप तक ही सीमित न होकर अनेक प्रकार के प्रश्नों से सम्बन्धित होती है । ऐसी प्रश्नावली में साधारणतया बन्द और खुले हए सभी प्रकार के प्रश्नों का समावेश होता है । एक विशेष सूचना अथवा विचार प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार के प्रश्न को सबसे अधिक उपयुक्त समझा जाता है , उसका ऐसी प्रश्नावली में समावेश कर लिया जाता है । वास्तविकता यह है कि सामाजिक तथ्य इतने जटिल और विविधतापूर्ण होते हैं कि एक विशेष प्रकृति के प्रश्नों द्वारा हो उन सभी को ज्ञात कर सकना बहुत कठिन होता है । विषय का व्यापक और गहन अध्ययन करने के लिए मिश्रित प्रश्नावली का उपयोग करके ही विश्वसनीय तथ्य प्राप्त किए जा सकते हैं । यही कारण है कि सामाजिक सर्वेक्षण तथा अनुसन्धान में मिश्रित प्रश्नावली का उपयोग सबसे अधिक किया जाता है । गातावली के निर्माण में सावधानियाँ








    प्रश्नावली की प्रकृति

    ( Nature of the Questionnaire )


    प्रश्नावली की प्रकृति व अन्य पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए । इस सम्बन्ध में कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं - -



    1.इकाइयों को स्पष्टता ( Clarity of Units ) - अध्ययनकर्ता जिन इकाइयों को प्रयोग में ला रहा है , उनको स्पष्ट रूप से परिभाषित करना चाहिए ताकि अलग - अलग उत्तरदाता अपने - अपने दृष्टिकोण से उनकी व्याख्या न करें ।


    2. उपयोगी प्रश्न ( Useful Questions ) - प्रश्न उपयोगी होने चाहिए । अनर्गल प्रश्नों से उत्तरदाता स्वयं भी परेशान होता है और अनुसन्धानकर्ता का स्वयं का भी उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता है , अतः ऐसे योग्य प्रश्न पूछे जाने चाहिए जिनसे कि उत्तरदाता भी उनका जवाब निःसंकोच होकर दे । ( स ) विशिष्ट प्रश्नों से बचाव ( Avoidance of Specific Questions ) नों का सम्बन्ध व्यक्तिगत जीवन , भावनाओं तथा रहस्यात्यक जीवन से होता से प्रश्नों से बचना चाहिए । कोई व्यंगात्मक प्रश्न भी नहीं पूछे जाने चाहिए , तरदाता की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है । यदि इस प्रकार के प्रश्नों नहीं बना गया तो अनुसन्धान का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा ।


    3.प्रश्नों का प्राकार ( Size of Questions ) - प्रश्नों का आकार बड़ा ही होना चाहिए क्योंकि उत्तरदाता बड़े आकार को देखते ही विचलित हो जाता है अतः छोटी प्रश्नावलियां अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं ।


    4.भाषा की स्पष्टता ( Clarity of Language ) - प्रश्नावलियों की भाषा इतनी सरल और स्पष्ट होनी चाहिए कि एक साधारण उत्तरदाता उनके अर्थ व प्रयोग को समझ सके । भाषा को जटिल व मुहावरेदार नहीं बनाना चाहिए । किसी प्रकार की पारिभाषिक शब्दावलियों , वहप्रर्थक शब्दों को जहाँ तक सम्भव हो सके , स्थान नहीं देना चाहिए । जितने प्रश्न सरल होंगे , उनके उत्तर उतने ही स्पष्ट होंगे ।







    प्रश्नावली की विश्वसनीयता

    ( Reliability of Questionnaire )


    अब प्रश्न यह उठता है कि उत्तरदाताओं ने जो कुछ सूचनाएं दी हैं , वे कहाँ तक विश्वसनीय हैं । विश्वसनीयता का पता तभी लग जाता है जब अधिकतर प्रश्नों के अर्थ अलग - अ नग लगाए गए ही , ऐसी स्थिति में ण का उत्पन्न होती है अविश्वसनीयता की समस्या निम्नलिखित कारणों से उत्पन्न होती है


    1.पक्षपातपूर्ण निदर्शन ( Biased Sample ) - - - निदर्शन का चयन करते समय यदि सावधानी नहीं रखी जाती है तो उसके परिणामों में विश्वसनीयता नहीं आ सकती । यदि सूचनादाताओं के चयन में अनुसन्धान का प्रभावित हया है तो निश्चित रूप से प्राप्त सूचना प्रतिनिधित्वपूर्ण नहीं हो सकती ।


    2. नियन्त्रित व पक्षपातपूर्ण उत्तर ( Controlled and Biased Responses ) - प्रश्नावली प्रणाली द्वारा प्राप्त उत्तर अक्सर कम सही होते हैं । कुछ गोपनीय एवं व्यक्तिगत सूचनाएँ देने से वे संकोच करते हैं क्योंकि वे अपने हाथ से लिखकर देने से डरते हैं , अतः उनके उत्तरों में पक्षपात की भावना होती है । उनके उत्तरों में या तो तीव्र आलोचना मिलेगी या पूर्ण सहमति मिलेगी । सन्तुलित उत्तर प्राप्त नहीं हो पाते ।


    3.गलत एवं असंगत प्रश्न ( Wrong and Irrelevant Questions ) - जब गलत और असंगत प्रश्नों को प्रश्नावली में सम्मिलित किया जाता है तो उनके उत्तर भी उत्तरदाता अपने - अपने दष्टिकोण से देते हैं । ऐसी स्थिति में उत्तरदातागो द्वारा दी गई सूचनाएँ विश्वसनीय नहीं हो सकतीं ।


    4 विश्वसनीयता की जाँच ( Test of Reliability ) - - प्रश्नावली में दिए गए उत्तरों में विश्वसनीयता प्रायः कम पाई जाती है इसीलिए उनकी जाँच कर लेनी चाहिए । इसके कतिपय तरीके अग्रवत् हैं -


    ( i ) प्रश्नावलियों को पुनः भेजना ( Sending Questionnaire Again ) विश्वसनीयता की परख के लिए प्रपनावलियों की उत्तरदाताओं क

  • RESEARCH DESIGN23:02





    शोध अभिकल्प ( प्ररचना )

    ( Research Design )



    अन्वेषण ( Inquiry ) प्रारम्भ करने से पूर्व हम प्रत्येक अनुसन्धान समस्या के विषय में उचित रूप से सोच - विचार करने के पश्चात् यह निर्णय ले लें कि हम किन ढंगों एवं कार्यविधियों ( Proecdures ) का प्रयोग करते हुए कार्य करना है तो नियन्त्रण को लागू करने की प्राशा बढ़ जाती है । अनुसन्धान व प्ररचना निर्णय की वह प्रक्रिया है जो उन परिस्थितियों के पूर्व किए जाते हैं जिनमें ये निर्णय कार्य रूप में लाए जाते हैं । अनेक सामाजिक वैज्ञानिकों ने अनुसन्धान प्ररचना को परिभाषित किया है । यहाँ कुछ परिभाषाओं को हम देख सकते हैं । सेलिज , जहोदा , ड्यूश एवं कुक ने अपनी पुस्तक ' रिसर्च मेथड्स इन सोशल रिलेशन्स ' में अनुसन्धान प्ररचना को परिभाषित करते हुए लिखा है कि " एव अनुसन्धान प्ररचना प्रांकड़ों के एकत्रीकरण एवं विश्लेषगा के लिए उन दणामों का प्रबन्ध करती है जो अनुसन्धान के उद्देश्यों की संगतता को कायरीतियों में पाथिक नियन्त्रण के साथ सम्मिलित करने का उद्देश्य रखती है । " प्रार . एल . ऐकॉफ ने अपनी पुस्तक का नाम ही ' दि डिजाइन ऑफ सोशल रिसर्च ' रखा है । आपके अनुसार , " प्ररचित करना नियोजित करना है , अर्थात प्ररचना ( Design ) उस परिस्थिति के उत्पन्न होने से पूर्व निर्णय लेने की प्रक्रिया जिसमें निर्णय को लाग किया जाना है । यह एक सम्भावित स्थिति को नियन्त्रण में लाने की दिशा में एक पूर्व प्राशा ( Anticipation ) की प्रक्रिया है ।अभिकल्प या प्ररचना ( Design ) शब्द का अभिप्राय पूर्व निर्धारित रूपरेखा है । एकोफ ने प्ररचना शब्द की व्याख्या या उपमा ( Analogy ) द्वारा की है । एक भवन निर्माणकर्ता भवन का अभिकल्प या प्ररचना पहले से ही बना लेता है कि यह कितना बड़ा होगा , इसमें कितने कमरे होंगे , कौन - सी सामग्री का प्रयोग इसमें किया जाएगा इत्यादि । ये सब निर्णय वह भवन - निर्माण से पहले ले लेता है ताकि भवन के बारे में एक ' नक्शा ' बना ले तथा यदि इसमें किसी प्रकार का संशोधन करना है तो निर्माण शुरू होने से पहले ही किया जा सके । शोध अभिकल्प या प्ररचना की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं एकोफ - “ अभिकल्प या प्ररचना का अर्थ योजना बनाना है , अर्थात् प्ररचना पूर्व निर्णय लेने की प्रक्रिया है ताकि परिस्थिति पैदा होने पर इसका प्रयोग किया जा सके । यह सूझ - बूझ एवं पूर्वानुमान की प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य अपेक्षित परिस्थिति पर नियन्त्रण रखना है ।


    सामाजिक शोध में समस्या के चुनाव व निरूपण तथा प्राक्कल्पनाओं का निर्माण कर लेने के पश्चात् शोध अभिकल्प या प्ररचना बनाई जाती है । इसका कार्य शोध को एक निश्चित दिशा प्रदान करना है । किसी भी सामाजिक शोध की प्रक्रिया को समुचित रूप में पूरा करने के लिए प्रारम्भ में ही निर्धारित की गई योजना की रूपरेखा को सामाजिक शोध की प्ररचना कहा जाता है । एक अच्छी शोध प्ररचना , सामग्री के संकलन की त्रुटियों को कम करके मानवीय श्रम की बचत भी करती है तथा बाद में आने वाली त्रुटियों तथा कठिनाइयों की सम्भावना प्रायः पहले ही समाप्त कर देती है ।शोध अभिकल्प या प्ररचना शब्द का अर्थ समझने के लिए पहले ' शोध ' तथा ' अभिकल्प ' या ' प्ररचना ' शब्दों का अर्थ समझ लेना जरूरी है ।

    सेनफोर्ड लेबोबिज एवं रॉबर्ट हैगडान ने भी ' इन्ट्रोडक्शन टू सोशल रिसर्च ' में इसे परिभाषित करते हुए लिखा है कि " एक अनुसन्धान प्ररचना उस ताकिक ढंग को प्रस्तुत करती है , जिसमें व्यक्तियों एवं अन्य इकाइयों की तुलना एवं विश्लेषण किया जाता है । यह आंकड़ों के लिए विवेचन का आधार है । प्ररचना का उद्देश्य ऐसी तुलना का आश्वासन दिलाना है , जो विकल्पीय विवेचनों से प्रभावित न हो । "



    सैल्टिज , जहोदा तथा अन्य के अनुसार , “ सामाजिक अनुसन्धान का अर्थ सामाजिक घटनाओं तथा तथ्यों के बारे में नवीन जानकारी प्राप्त करना है अथवा पूर्व अर्जित ज्ञान में संशोधन , सत्यापन एवं संवर्द्धन करना है । "



    ' सैल्टिज , जहोदा तथा अन्य - “ शोध प्ररचना आँकड़ों के संकलन तथा विश्लेषण की दशाओं की उस व्यवस्था को कहते हैं जिसका लक्ष्य शोध के उद्देश्य की प्रासंगिकता तथा कार्यविधि की मितव्ययिता का समन्वय करना एकोफ , सैल्टिज , जहोदा तथा अन्य विद्वानों के विचारों से यह स्पष्ट हो जाता है कि शोध अभिकल्प या प्ररचना पूर्व निर्णय की एक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य मितव्ययिता के आधार पर समस्या से सम्बन्धित आँकड़े एकत्रित करना और आने वाली परिस्थितियों को नियन्त्रित करना है । साथ ही , शोध के लक्ष्य के आधार पर भिन्न प्रकार की प्ररचनाएँ बनाई जा सकती हैं । यह बात ध्यान देने योग्य है कि शोध प्ररचना का सम्बन्ध शोध के दो प्रमुख चरणों - सामग्री के संकलन तथा सामग्री के विश्लेषण - से है । अतः अनुसंधान प्ररचना इनसे सम्बन्धित सर्वाधिक उपयुक्त एवं सुविधाजनक योजना या रूपरेखा है जिसका उद्देश्य शोधकर्ता को दिशा प्रदान करना तथा मानव - श्रम की बचत करना है ।
















    एक अच्छी शोध अभिकल्प ( प्ररचना ) की विशेषताएँ

    ( Characteristics of a Good Research Design )



    शोध की सम्पूर्ण प्रक्रिया इसकी ठीक प्रकार से बनाई गई प्ररचना पर निर्भर करती है । अतः एक अच्छी शोध प्ररचना में समस्या की प्रकृति के अनुरूप अगले चरणों हेतु सही पूर्व निर्णय लेना अनिवार्य होता है । एक अच्छी शोध अभिकल्प या प्ररचना में निम्नलिखित विशेषताओं का होना अनिवार्य है


    ( 1 ) यह लचीली ( Flexible ) होनी चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर किसी भी चरण में थोड़ा - बहुत परिवर्तन किया जा सके ।


    ( 2 ) यह उपयुक्त ( Appropriate ) होनी चाहिए ताकि विश्वसनीय सामग्री का संकलन किया जा सके ।


    ( 3 ) यह कार्यकुशल ( Efficient ) होनी चाहिए ताकि शोध के उद्देश्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त किया जा सके ।


    ( 4 ) यह मितव्ययी ( Economical ) होनी चाहिए ताकि उपलब्ध साधनों की सीमाओं के अन्तर्गत ही सम्पूर्ण शोध को पूरा किया जा सके । ? वास्तव में , अच्छी शोध प्ररचना उसी को कहा जाता है जो पक्षपात की सम्भावना तो कम करती है , जबकि संकलित की जाने वाली सामग्री को विश्वसनीय रूप से संकलित करने में सहायता प्रदान करती है । प्रयोगात्मक प्ररचनाओं में वे प्ररचनाएँ अच्छी मानी जाती हैं जिनमें कम - से - कम त्रुटियाँ होती हैं । इसी प्रकार , वह शोध प्ररचना भी अच्छी मानी जाती है जो समस्या के विभिन्न पहलुओं के बारे में अधिकतम सामग्री संकलित करने में सहायक होती हैं । इसीलिए शोध प्ररचना समस्या की प्रकृति पर निर्भर करती है ।
















    शोध अभिकल्प ( प्ररचना ) के उद्देश्य

    ( Objectives of Research Design )



    सैल्टिज , जहोदा तथा अन्य के अनुसार शोध के उद्देश्यों के आधार पर विभिन्न प्रकार की शोध प्ररचनाएँ हो सकती हैं । प्रत्येक अध्ययन का अपना एक विशिष्ट उद्देश्य होता है । शोध के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं


    ( 1 ) किसी घटना के बारे में जानकारी प्राप्त करना अथवा इसके बारे में नवीन ज्ञान प्राप्त करना ताकि अधिक यथार्थ ( Precise ) शोध समस्या अथवा प्राक्कल्पनाओं का निर्माण किया जा सके ।


    ( 2 ) किसी व्यक्ति , परिस्थति अथवा समूह की विशेषताओं का सही चित्रण करना ( इन विशेषताओं की प्रकृति से सम्बन्धित प्रारम्भिक प्राक्कल्पनाओं सहित अथवा रहित ) ।


    ( 3 ) किसी वस्तु के घटित होने की आवृत्ति ( Frequency ) निर्धारित करना अथवा इसका किसी अन्य वस्तु के साथ सम्बन्ध निर्धारित करना सामान्यतः परन्तु अनिवार्य रूप से नहीं , किसी प्राक्कल्पना की सहायता से ।


    ( 4 ) विभिन्न चरों में कार्य - कारण सम्बन्धों वाली प्राक्कल्पनाओं का परीक्षण करना ।







    अनुसन्धान अभिकरूप की विषयवस्तु

    ( Subject - Matter of Research Design )


    एक सामान्य अनुसन्धान - अभिकल्प में निम्नलिखित विषयों का उल्लेख किया जाता है ।


    ( 1 ) शोध का विषय ( Topic of Research ) - ऐसा करने से अध्ययन के विषय का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है तथा उसके क्षेत्र एवं सीमाओं का पता चल पाता है । उसके स्वरूप निर्धारण , खोज अादि के विषय में उपलब्ध साहित्य , पत्र पत्रिकाओं आदि का अध्ययन करना पड़ता है । अध्ययन के स्रोत सरकारी , गैर सरकारी , व्यक्तिगत , पुस्तकालयों या परिवेश सम्बन्धी हो सकते हैं ।


    ( 2 ) अध्ययन को प्रकृति ( Nature of Study ) - इसमें शोध का प्रकार एवं स्वरूप निर्धारित करना पड़ता है । वह सांख्यिकीय , व्यक्तिगत , तुलनात्मक , प्रायोगिक , विश्लेषणात्मक , अन्वेषणात्मक या मिश्रित प्रकार का हो सकता है ।


    ( 3 ) प्रस्तावना एवं पृष्ठभूमि ( Introduction & Background ) - इसमें उस विषय को चुनने की पृष्ठभूमि बतानी पड़ती है तथा उसकी शुरूआत करनी पड़ती है । इससे पता चल जाता है कि शोधक की उक्त विषय में रुचि किस प्रकार उत्पन्न हई तथा समस्या का स्वरूप एवं स्थिति क्या थी । अब तक उस समस्या का किस - किस ने तथा किन परिणामों को प्राप्त एवं अध्ययन किया ? उनमें क्या कमियाँ एवं त्रुटियाँ रहीं ? उनको अब दूर किया जाना किस प्रकार सम्भव एवं वांछनीय है ? आदि ।


    ( 4 ) उद्देश्य ( Objectives ) - इसमें अनुसन्धानकर्ता या गवेषक अपना उद्देश्य बताता है । इसमें वह उप - उद्देश्य या लक्ष्य भी प्रकट करता है , अर्थात प्रमखउद्देश्यों का उल्लेख करता है । ये प्रायः चार या पांच वाक्षों में स्पष्ट किए जाते हैं ।


    ( 5 ) अध्ययन का सामाजिक , सांस्कृतिक , राजनीतिक एवं भौगोलिक सन्दर्भ ( Social , Cultural , Political & Geographical Context of Study ) - - इसमें शोधक स्पष्ट करता है कि वह किस प्रकार के समाज एवं संस्कृति के पर्यावरण में रह रहा है तथा उसके प्रमुख मूल्य , परम्परा , मान्यताएँ आदि क्या हैं ? इसमें स्थानीय मानक रीति - रिवाज . परिपाटियाँ आदि भी पा जाती . इसके सन्दर्भ में राजनीतिक व्यवस्था , व्यवहार एवं मल्यों का उल्लेख कर दिया जाता है । भौगोलिक सन्दर्भ में मानव - व्यवहार को प्रभावित करने वाले तथ्य , स्थिति . जलवाय . प्राकृतिक बनाबट प्रकृति उत्पादन आदि पाते हैं । यदि सम्भव हो तो आर्थिक परिवेश का भी परिचय दे दिया जाना चाहिए । राजनीतिक शोध को सामाजिक , साँस्कृतिक , आर्थिक एवं औद्योगिक प्रआयामों में सामायोजित करना चाहिए ।


    ( 6 ) अवधारणा , चर एवं प्रकल्पना ( Concept , Variable & Hypothesis ) - इस क्षेत्र में सबसे पहले यदि कोई सिद्धान्त या अवधारणात्मक रूपरेखा को आधार बनाया गया है , तो उसका उल्लेख किया जाना आवश्यक है । उसके सन्दर्भ में प्रमुख अवधारणाओं को स्पष्ट किया जाना चाहिए । उनको सुनिश्चित बनाने के लिए उनकी कार्यकारी परिभाषाएँ दी जानी चाहिए । जैसे यदि ' भ्रष्टाचार ' की अवधारणा को प्रयुक्त किया गया है तो यह बताया जाना चाहिए कि उसे किन अर्थों में प्रयोग किया गया है । इसी तरह यह बताया जा सकता है कि किन - किन चरों को केन्द्रीय विषय बनाया जा रहा है तथा उनसे सम्बन्धित कौन - कौन सी प्रकल्पनायों का निर्माण किया गया हैं । जैसा कि पीछे बताया जा चका है कि प्रकल्पना यों का निर्माण गवेषणा को सुनिश्चित बना देता है तथा उनसे _ _ोध की दिशा , सीमा , क्षेत्र प्रादि निर्धारित हो जाते हैं । ना कोहन एवं नगेल ने बताया है कि हम समस्या को प्रस्तावित व्याख्यानों या समाधान के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते । ये समस्या से सम्बद्ध विषय - सामग्री तथा शोधक के पूर्वज्ञान द्वारा सुझाए जाते हैं । जब इन सुझावों या व्याख्यानों को प्रस्तावनाओं की तरह रखा जाता है , वे प्रकल्पना कहलाती हैं । ये प्रकल्पनाएँ तथ्यों में सुव्यवस्था लाकर शोध को निर्देशित कर देती हैं ।


    ( 7 ) काल - निर्देश ( Period - Indication ) - इसमें यह बताया जाता है हिशोध किस समय , काल या रिवेश से सम्बन्धित है । समय राजनीतिक अनुसन्धान में एक अतिशय महत्त्वपूर्ण कारक होता है ।


    ( 8 ) तथ्य - सामग्री के चयन के आधार एवं संकलन प्रविधियाँ ( Basis of Selection of Datas and Techniques of Collection ) - इसमें तथ्य सामग्री के चयन के माघार बताए एवं निश्चित किए जाते हैं । यहाँ उनका औचित्यभी स्पष्ट किया जाना चाहिए । ये आधार प्रले वीय , भौतिक अथवा वैचारिक प्रेक्षणीय आदि हो सकते हैं । तथ्य - संकलन की प्रविधियाँ मानवीय या मशीनी हो सकती हैं । अवलोकन , प्रश्नावली , साक्षात्कार , प्रेक्षपण आदि युक्तियों के द्वारा तथ्य एकत्र किए जा सकते हैं । इनकी उपयुक्तता पर ध्यान दिया जाना प्रावश्यक होता है ।


    ( 9 ) विश्लेषण एवं निर्वचन ( Analysis and Interpretation ) सामग्री के एकत्रित होने के बाद उसके सारणीयन , वर्गीकरण एवं विश्लेषण प्रणालियों का संकेत दिया जा सकता है । उसके निर्वचन में कौन सी पद्धतियों का सहारा लिया जाएगा ? अथवा उसकी सामान्यता या प्रामाणिकता की मात्रा क्या होगी ? आदि बातों का उल्लेख न्यूनाधिक मात्रा में किया जा सकता है ।


    ( 10 ) सर्वक्षरण - काल , समय एवं धन ( Survey - Period , Time and Money ) - इसमें यह भी संकेत दिया जाना चाहिए कि सर्वेक्षण कितने समय के भीतर सम्पन्न हो जाएगा । उसे लगातार एक ही बार , या कई बार किया जाएगा ? इसी प्रकार शोध में लगने वाले समय एवं धन का अनुमान भी बताया जाना चाहिए ।



    संक्षेप में , अनुसन्धान प्ररचना के महत्वपूर्ण चरणों को क्रमश : इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है


    1 . अनुसन्धान प्ररचना में सर्वप्रथम अध्ययन समस्या ( Study Problem ) का प्रतिपादन किया जाना चाहिए ।

    2 . वर्तमान में जो अनुसन्धान कार्य किया जा रहा है उसको अनुसन्धान समस्या से स्पष्ट रूप से सम्बन्धित करना अनुसन्धान प्ररचना का दूसरा मुख्य

    3 . वर्तमान में हमें जो अनुसन्धान कार्य करना है उसकी सीमाओं ( Boundries ) को स्पष्ट रूप से निर्धारित करना ।

    4 . अनुसन्धान प्ररचना का चौथा चरण अनुसन्धान के विभिन्न क्षेत्रों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने का है ।

    5 . अनुसन्धान प्ररचना के इस चरण में हम अनुसन्धान परिणामों के प्रयोग के विषय में निर्णय लेते हैं । _ _ _

    6 . इसके पश्चात् हमें अवलोकन , विवरण तथा परिमापन के लिए उपयुक्त चरों का चयन करना चाहिए तथा इन्हें स्पष्ट रूप से परिभाषित करना चाहिए ।

    7 . तदुपरान्त अध्ययन क्षेत्र ( Study Area ) एवं समग्र ( Universe ) का उचित चयन एवं इनकी परिभाषा प्रस्तुत करनी चाहिए ।

    8 . इसके बाद अध्ययन के प्रकार एवं विषय - क्षेत्र के विषय में विस्तृत निर्णय लेने चाहिए ।

    9 . अनुसन्धान प्ररचना के आगामी चरण में हमें अपने अनुसन्धान के लिए उपयुक्त विधियों ( Hethods ) एवं प्रविधियों ( Techniques ) का चयन करना चाहिए ।

    10 . इसके बाद अध्ययन में निहित मान्यताओं ( Assumptions ) एवं उपकल्पनाओं ( Mypothesis ) का स्पष्ट उल्लेख करना चाहिए ।

    11 . बाद में उपकल्पनाओं की परिचालनात्मक परिभाषा ( Operational Definition ) करते हए उसे इस रूप में प्रस्तुत करना चाहिए कि वह परीक्षण के योग्य हो ।

    12 . अनुसन्धान प्ररचना के आगामी चरण के रूप से हमें अनुसन्धान के दौरान प्रयुक्त किए जाने वाले प्रलेखों ( Documents ) , रिपोर्टो ( Reports ) एवं अन्य प्रपत्रों का सिंहावलोकन करना चाहिए ।

    13 . तदपरान्त अध्ययन के प्रभावपूर्ण उपकरणों का चयन एवं इनका निर्माण करना तथा इनका व्यवस्थित पूर्व - परीक्षण ( Pre - Testing ) करना ।

    14 . आंकड़ों के एकत्रीकरण का सम्पादन ( Editing ) किस प्रकार किया जाएगा इसको विस्तृत व्यवस्था का उल्लेख करना ।

    15 . आँकड़ों के सम्पादन की व्यवस्था के उल्लेख के बाद उनके वर्गीकरण ( Classification ) हेतु उचित श्रेणियों ( Categories ) का चयन किया जाना एवं उनकी परािभाषा करना ।

    16 . आंकड़ों के सकेतीकरण ( Codification ) के लिए समुचित व्यवस्था का विवरण तैयार करना ।

    17 . आँकड़ों को प्रयोग योग्य बनाने हेतु सम्पूर्ण प्रक्रिया की समुचित व्यवस्था का विकास करना ।

    18 . आँकड़ों के गुणात्मक ( Qualitative ) एवं संख्यात्मक ( Quantita tive ) विश्लेषण के लिए विस्तृत रूपरेखा तैयार करना ।

    19 . इसके पश्चात् अन्य उपलब्ध परिणामों की पृष्ठभूमि में समुचित विवेचन की कार्यविधियों का उल्लेख करना ।

    20 . अनुसन्धान प्ररचना के इस चरण में हम अनुसन्धान प्रतिवेदन ( Research Report ) के प्रस्तुतीकरण के बारे में निर्णय लेते हैं ।

    21 . अनुसन्धान प्ररचना का यह चरण सम्पूर्ण अनुसन्धान प्रक्रिया में लगने वाला समय , धन एवं मानवीय श्रम का अनुमान लगाने का है । इसी दौरान हम प्रशासकीय व्यवस्था की स्थापना एवं विकास का अनुमान भी लगाते हैं ।

    22 . यदि आवश्यक हो तो पूर्व - परीक्षणों ( Pre - Tests ) एवं पर्वगामी अध्ययनों ( Pilot - Studies ) का प्रावधान करना ।

    23 . अनुसन्धान प्ररचना के इस चरण में हम कार्यविधियों ( Procedures ) से सम्बन्धित सम्पूर्ण प्रक्रिया , नियमों , उपनियमों को विस्तारपूर्वक तैयार करते हैं ।

    24 . अनुसन्धान के इस चरण में हम कर्मचारियों , अध्ययनकत्तात्रों के प्रशिक्षण के ढंग एवं कार्य विधियों का उल्लेख करते हैं ।

    25 . अनुसन्धान प्ररचना के इस अन्तिम चरण में हम यह प्रावधान करते हैं कि समस्त कर्मचारी एवं अध्ययन अनुसन्धानकर्ता एक सामंजस्य की स्थिति वो बनाए रखते हुए कार्य के नियमों , कार्यविधियों की पालना करते हुए किस प्रकार सन्तोषप्रद ढंग से कार्य को पूर्ण करेंगे ।










    अनुसन्धान प्ररचना का वर्गीकरण या प्रकार


    ( Classifications or Types of Research Design )



    विभिन्न अनुसन्धान प्ररचनाओं को अनेक प्राधारों पर वर्गीकृत किया गया है । सामान्यतः अनुसन्धान का वर्गीकरण दो अाधारों पर किया जा सकता है

    1 . अध्ययन के उद्देश्य के आधार पर , एवं

    2 . अध्ययन के उपागम ( Approach ) के आधार पर ।


    1. अध्ययन के उद्देश्य के आधार पर ( On the basis of the object of the study ) - अध्ययन के उद्देश्य के आधार पर अनुसन्धान प्ररचनायों को पून . निम्न चार उपवर्गों में विभाजित किया जा सकता है

    A . अन्वेषणात्मक अनुसन्धान प्ररचना ( Exploratory Research F Design ) ;

    B . विवरणात्मक या निदानात्मक अनुसन्धान प्ररचना ( Descriptive or Diagnostic Research Design ) ;

    C . प्रयोगात्मक अनुसन्धान प्ररचना ( Experimental Research Design ) ; D . मूल्यांकनात्मक अनुसन्धान प्ररचना ( Evaluative Research Design ) .


    2 . अध्ययन के उपागम के आधार पर ( On the basis of the approach of the study ) - अध्ययन के उपागम के आधार पर भी अनुसन्धान प्ररचनामों को पाँच उपवर्गों में रखा जा सकता है A . सर्वेक्षणात्मक अनुसन्धान प्ररचना ; B . क्षेत्र अध्ययन सम्बन्धी अनुसन्धान प्ररचना C . प्रयोग सम्बन्धी अनुसन्धान प्ररचना : D . ऐतिहासिक अनुसन्धान प्ररचना ; E . वैयक्तिक अध्ययन सम्बन्धी अनुसन्धान प्ररचना । लेकिन अनेक समाज वैज्ञानिकों ने भी अनुसन्धान प्ररचना को अनेक आधारों . पर अनेक प्रकारों में वर्गीकृत किया है । क्लेयर सेलिज तथा अन्य ने अपनी कृति ' रिसर्च मेथड्स इन सोशल रिलेशन्स ' में अनुसन्धान प्ररचना का वर्गीकरण प्रमुख रूप से तीन श्रेणियों में किया है ! .


    1 . प्रतिपादनात्मक अथवा अन्वेषणात्मक अध्ययन ( Formulative or Exploratory Studies ) - इसका मूल उद्देश्य अधिक सूक्ष्मता के साथ अध्ययन करने , अथवा उपकल्पनाओं का विकास करने अथवा अग्रिम अनुसन्धान के लिए प्राथमिकतामों ( Priorities ) की स्थापना करना होता है ।


    2 विवरणात्मक अथवा निदानात्मक अध्ययन ( Descriptive or Diagnostic Studies ) - - इस प्रकार की प्ररचनाओं का उद्देश्य एक दी हुई परिस्थिति की विशेषताओं का वर्णन करना होता है ।


    3 . प्रयोगात्मक अध्ययन ( Experimental Studies ) - इस प्रकार की प्ररचनाओं का उद्देश्य उपकल्पनाओं का परीक्षण करना होता है ।

    पाल्मड जे . कान्ह ने भी प्ररचना स्तर ( Level of Design ) के आधार पर चार प्रकार की अनुसन्धान प्ररचनाओं का उल्लेख किया है

    1 . देवीय अवलोकन पूर्व - अनुसन्धान पक्ष ( Random Observation Pre - Research Phase ) ,

    2 . अन्वेषणात्मक अथवा प्रतिपादनात्मक अध्ययन ,

    3 . निदानात्मक अथवा विवरणात्मक अध्ययन ,

    4 . प्रयोगात्मक प्ररचनाएँ ।


    सैन्फोर्ड लेबोबिज एवं रोबर्ट हैगडोर्न के अनुसार अनुसन्धान प्ररचनाओं को तीन वर्गों में रखा जा सकता है :

    1 . वैयक्तिक अध्ययन ( Case Studies ) ,

    2 . सर्वेक्षण प्ररचनाएँ ( Survey Designs ) , A . सह - सम्बन्धात्मक अध्ययन ( Correlational Study ) B . पैनल प्ररचना ( Panel Design ) ,

    3 . प्रयोगात्मक प्ररचना ( Experimental Design ) , हम यहां किसी एक विद्वान् के वर्गीकरण को न प्रस्तुत कर इनके आधार पर प्रमुख प्ररचनाओं की विस्तार से व्याख्या करेंगे । हमारे अनुसार प्रमखत : अनसन्धान प्ररचनाओं को तीन प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है , वे हैं

    1 . प्रतिपादनात्मक अथवा अन्वेषणात्मक अनुसन्धान प्ररचना ।

    2 . विवरणात्मक अथवा निदानात्मक अनुसन्धान प्ररचना ।

    3 . प्रयोगात्मक अनुसन्धान प्ररचना ।



    अन्वेषणात्मक या निरूपणात्मक शोध अभिकल्प ( Exploratory or Formulative Research Design ) अन्वेषणात्मक शोध अभिकल्प वह प्ररचना है जिसका उद्देश्य अज्ञात तथ्यों की खोज करना अर्थात् तथ्यों के बारे में नवीन अन्तर्दृष्टि प्राप्त करना है ताकि यथार्थ समस्या का निर्माण किया जा सके अथवा प्राक्कल्पनाएँ बनाई जा सकें । किसी संरचनात्मक अध्ययन करने से पहले शोधकर्ता द्वारा किसी प्रकरण के बारे में जानकारी » प्राप्त करने , अवधारणाओं का स्पष्टीकरण करने , अग्रिम शोध के लिए प्राथमिकताओं का पता लगाने अथवा महत्त्वपूर्ण समस्याओं का पता लगाने इत्यादि उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी इस शोध अभिकल्प या प्ररचना का निर्माण किया जाता है ।

    अन्वेषणात्मक शोध अभिकल्प या प्ररचना के निर्माण में निम्नलिखित तीन विधियाँ सहायक हो सकती हैं –

    ( 1 ) सामाजिक विज्ञान या अन्य सम्बन्धित साहित्य का पुनरीक्षण ;

    ( 2 ) अध्ययन समस्या से सम्बन्धित अनुभवी व्यक्तियों का सर्वेक्षण तथा

    ( 3 ) अन्तर्दृष्टि - प्रेरक उदाहरणों का विश्लेषण ।


    साहित्य का पुनरीक्षण सबसे सरल एवं लाभदायक विधि है जिसके द्वारा शोध समस्या को स्पष्ट किया जा सकता है तथा प्राक्कल्पनाओं का निर्माण किया जा सकता है । इससे शोधकर्ता को अन्य विद्वानों द्वारा प्रतिपादित अनेक अवधारणाओं एवं सिद्धान्तों को अपने अध्ययन क्षेत्र में लागू करने का अवसर मिल जाता है । अनुभवी व्यक्तियों के सर्वेक्षण से शोधकर्ता को नवीन विचार प्राप्त होते हैं तथा विभिन्न चरों में पाए जाने वाले सम्बन्ध भी स्पष्ट होते हैं । यदि ऐसे अनुभवी व्यक्तियों की सहायता उपलब्ध न हो तो अन्तर्दृष्टि प्रेरक उदाहरण भी काफी सहायक सिद्ध हो सकते हैं । इसमें कुछ चयनित उदाहरणों का अध्ययन किया जाता है । इस कार्य हेतु उपलब्ध सामग्री का अवलोकन किया जा सकता है या असंरचित साक्षात्कार किया जा सकता है या किसी अन्य साधन का प्रयोग किया जा सकता है । भारत में हो रहे अधिकांश अध्ययनों की प्रकृति अन्वेषणात्मक प्रकार की है , क्योंकि उनका उद्देश्य नवीन बातों का पता लगाना है । इन अध्ययनों की सहायता से बाद में प्राक्कल्पनाओं का निर्माण किया जाता है । ऐसी शोध प्ररचनाएँ अधिक लचीली होती है तथा जैसे - जैसे शोधकर्ता को समस्या के विभिन्न पहलुओं का पता चलता रहता है वह इन्हें अपने अध्ययन में सम्मिलित करता रहता है ।


    वर्णानात्मक शोध अभिकल्प ( Descriptive Research Design ) वर्णनात्मक शोध अभिकल्प या प्ररचना वह है जिसका उद्देश्य समस्या के सम्बन्ध में पूर्ण , यथार्थ एवं विस्तृत तथ्यों की जानकारी प्राप्त करना है । इसके द्वारा वास्तविक तथ्यों का संकलन किया जाता है और इन तथ्यों के आधार पर समस्या का वर्णनात्मक विवरण अथवा चित्रण प्रस्तुत किया जाता है । इस प्रकार की प्ररचना की मूल आवश्यकता यथार्थता अथवा पूर्ण सूचनाएँ हैं । इसलिए इसका निमाण इस प्रकार से किया जाता है कि पक्षपात कम - से - कम हो और तथ्यों की विश्वसनीयता अधिक हो । शोध प्ररचना द्वारा समुदाय का चित्रण , इसके सदस्यों के आयु वितरण , राष्ट्रीय तथा धार्मिक पृष्ठभूमि , भौतिक तथा मानसिक स्वास्थ्य तथा शिक्षा के स्तर पर अथवा 5 = सामुदायिक सुविधाओं , मकानों के प्रकार , उपलब्ध पुस्तकालयों तथा अपराधों की संख्या अथवा सामाजिक संगठन की संरचना तथा व्यवहार के प्रमुख प्रतिमानों आदि विविध विषयों का अध्ययन किया गया है । जनजातियों के चित्रण , सामाजिक संगठन प्र की संरचना तथा अपराधों की संख्या एवं विवरण सम्बन्धी अध्ययनों में इस प्ररचना का प्रयोग किया गया है ।


    सैल्टिज , जहोदा तथा अन्य विद्वानों ने वर्णनात्मक शोध अभिकल्प या प्ररचना के निम्नलिखित चरण बताए हैं

    ( 1 ) अध्ययन के उद्देश्यों का निर्धारण ;

    ( 2 ) तथ्यों के संकलन की विधियों की प्ररचना ;

    ( 3 ) निदर्शन का चयन

    ( 4 ) सामग्री का संकलन तथा परीक्षण तथा

    ( 5 ) परिणामों का विश्लेषण


    इस प्रकार , वर्णनात्मक अध्ययनों का प्रथम चरण अध्ययन के उद्देश्यों को पूर्णतः स्पष्ट करना है ताकि उपयुक्त सामग्री का संकलन किया जा सके । तत्पश्चात् सामग्री संकलन हेतु प्रविधियों के चयन का प्रश्न सामने आता है । शोध की समस्या तथा समग्र की प्रकृति को सामने रखते हुए यह निर्णय लिया जाता है कि प्रस्तावित अध्ययन हेतु कौन - सी प्रविधि सर्वाधिक उपयुक्त होगी । कई बार एक से अधिक प्रविधियों को एक - साथ प्रयोग में लाया जाता है । वर्णनात्मक अध्ययन निदर्शन पर आधारित होते हैं तथा उपयुक्त निदर्शन पद्धति एवं निदर्शन के आकार के बारे में पूर्व निर्णय लिया जाना अनिवार्य है ।


    निदानात्मक शोध अभिकल्प ( Diagnostic Research Design ) जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि शोध - कार्य का आधारभूत उद्देश्य ज्ञान की प्राप्ति तथा ज्ञान की वृद्धि है । परन्तु यह भी हो सकता है कि शोध - कार्य का उद्देश्य किसी समस्या के कारणों के सम्बन्ध में वास्तविक ज्ञान प्राप्त करके उस समस्या के समाधानों को भी प्रस्तुत करना हो । इसी प्रकार की शोध अभिकल्प या प्ररचना का निदानात्मक शोध - प्ररचना कहते हैं । अर्थात् विशिष्ट सामाजिक समस्या के निदान का खोज करने वाले शोध - कार्य को निदानात्मक शोध कहते हैं । इस प्रकार के शोधम शोधकत्ता समस्या का हल प्रस्तुत करता है , न कि स्वयं उस समस्या को हल करना प्रयास में जुट जाता है । समस्या को हल करना समाज - सुधारक , प्रशासक तथा नता का काम होता है । शोधकर्ता केवल वैज्ञानिक पद्धतियों के द्वारा समस्या के कारणों का लेने के बाद उसका उचित समाधान किस ढंग से सर्वोत्तम रूप में हो सकता बात की खोज करता है । इसीलिए निदानात्मक शोध - कार्य में समस्या का पूर्ण एवं विस्तृत अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से करके समस्या की गहराई में पहँचने का प्रयास किया जाता है जिससे कि समस्या के प्रत्येक सम्भावित कारण का पता ठीक ढंग से लग सका । इस प्रकार की खोज इस कारण की जाती है क्योंकि समस्या - विशेष का हल तत्काल ही करने की आवश्यकता होती है । सम्भावित हल को ध्यान में रखते हुए प्राक्कल्पना ( Hypothesis ) का निर्माण किया जाता है जिससे कि अध्ययन - काय वैज्ञानिक ढंग से किया जा सके ।


    परीक्षणात्मक शोध अभिकल्प ( Experimental Research Design ) परीक्षणात्मक शोध प्ररचना प्रयोगशाला में प्रयोग की तरह दो चरों के परस्पर सम्बन्ध का अध्ययन करने के लिए बनाई जाती है । इसमें एक नियन्त्रित ( Controlled ) समूह बनाया जाता है तथा दूसरा प्रायोगिक ( Experimental ) समूह । नियन्त्रित समूह को जैसे वह है वैसे ही रहने दिया जाता है , जबकि प्रायोगिक समूह में जिस कारक का प्रभाव देखना है उसका प्रकाशकरण ( Exposure ) किया जाता है । अध्ययन में वैज्ञानिक विधि के सभी चरण अपनाए जाते हैं ।

    परीक्षणात्मक शोध के तीन प्रकार ( types ) होते हैं

    ( 1 ) पश्चात् परीक्षण ( After - only experiment ) - इसके अन्तर्गत सभी दृष्टि से प्रायः समान विशेषताओं व प्रकृति ( nature ) वाले दो समूहों को चुन लिया जाता है जिनमें से एक समूह नियन्त्रित समूह और दूसरा परीक्षणात्मक समूह कहलाता है । नियन्त्रित समूह में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं लाया जाता है , जबकि परीक्षणात्मक समूह में किसी एक कारक के द्वारा परिवर्तन लाने का प्रयत्न किया जाता है । इस प्रकार यदि प्रथम समूह दूसरे समूह से भिन्न हो जाता है तो उसी कारक को उस परिवर्तन का कारण मान लिया जाता है । उदाहरणार्थ , दो समान समूहों में से एक समूह में , जिसे परीक्षणात्मक समूह माना गया है , सह - शिक्षा का प्रसार किया जाए । कुछ समय के पश्चत् उस समूह की तुलना दूसरे से की जाए । यदि दोनों में कुछ अन्तर ( जैसे प्रेम - विवाह की अधिक घटनाएँ ) देखने को मिलता है तो वह सह - शिक्षा के कारण समझा जाएगा ।

    ( 2 ) पूर्व - पश्चात् परीक्षण ( Before - after experiment ) - इसके अन्तर्गत अध्ययन के लिए केवल एक ही समूह का चुनाव किया जाता है और उसी का अध्ययन एक अवस्था विशेष के पहले और बाद में किया जाता है । इन दोनों अध्ययनों के अन्तर को देखा जाता है और उसे परिवर्तित परिस्थिति का परिणाम मान लिया जाता है । उदाहरणार्थ , संयुक्त परिवार प्रणाली का अध्ययन औद्योगीकरण के पूर्व और फिरऔधोगीकरण के पश्चात् किया जाता है और यदि इन दोनों अध्ययनों की तुलना से यह पता चले कि औद्योगीकरण के पूर्व संयक्त परिवार संगठित अवस्था में था जबकि औद्योगीकरण के पश्चात उसमें विघटन की प्रक्रिया आरम्भ हो गई तो संयुक्त परिवार के विघटन को औद्योगीकरण का परिणाम मान लिया जाएगा ।

    ( 3 ) कार्यान्तर - तथ्य परीक्षण ( Expost - facts experiment ) - इस प्रकार का परीक्षण किसी ऐतिहासिक घटना का अध्ययन करने के लिए किया जाता है । पर ऐतिहासिक घटनाओं को दोहराना शोधकर्ता के वश में नहीं होता । अतः वह दो समूहों का चुनाव करता है जिनमें से एक में वह घटना ( जिसका कि अध्ययन उसे करना है ) घटित हो चुका ह जबकि दूसरे में नहीं । इन दोनों समूहों की पुरानी परिस्थितियों का तुलनात्मक अध्ययन करके यह पता लगाने का प्रयल किया जाता है कि जिस समूह में वह घटना घटित हुई है वह किन कारणों से हई है । संक्षेप में , ऐतिहासिक घटना - चक्रों का परीक्षण कर वर्तमान घटनाओं या अवस्थाओं के कारणों की खोज कार्यान्तर - तथ्य परीक्षण कहलाता है ।



    अन्वेषणात्मक एवं वर्णनात्मक शोध प्रारूप में तुलना अन्वेषणात्मक एवं वर्णनात्मक शोध


    - प्रारूपों में निम्नलिखित आधारों पर तुलना की जा सकती है अन्वेषणात्मक शोध पारूप की तुलना में वर्णनात्मक शोध प्रारूप ज्यादा संरचित होता है ।


    1.अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप में उपकल्पना का निर्माण अध्ययन के अंत में किया जाता है जबकि वर्णनात्मक शोध - प्रारूप में उपकल्पना का निर्माण प्रथम चरण में ही कर लिया जाता है और तब इसकी जाँच की जाती है ।


    2.अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप की तुलना में वर्णनात्मक शोध प्रारूप में उपकल्पना ज्यादा विशेषीकृत होती है । दोनों ही शोध प्रारूपों का प्रयोग एक ही अध्ययन में भी संभव है , जैसे - पहले अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप का प्रयोग कर समस्या के विषय में जानकारी हासिल करके अंत में उपकल्पना का निर्माण कर लिया जाएऔर तब इस उपकाल्पता को जाँच वर्णनात्मक शोध बाका के द्वारा की जाए ।


    3.अन्वेषधायक

  • SAMPLING METHOD14:31
  • SCHEDULE11:47

    अनुसूची

    ( Schedule )

    अनुसूचियों ( Schedunes ) तथ्य - सामग्री को संकलित करने की एक और प्रविधि है - वह है अनुसूचियों का प्रयोग । अनुसूची प्रश्नों की एक लिखित सूची है जो अध्ययनकर्ता द्वारा अध्ययन विषय को ध्यान में रख कर बनाई जाती है । इसमें अनुसंधानकर्ता स्वयं घर - घर जाकर प्रश्नों के उत्तर अनुसूचियों द्वारा प्राप्त करता है । एम . एच . गोपाल के शब्दों में , " अनूसूची एक ऐसी प्रविधि है जिसे विशेष रूप से सर्वेक्षण प्रणाली के अन्तर्गत क्षेत्रीय सामग्री एकत्र करने में प्रयोग किया जाता है । " यह सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि है क्योंकि इसका राथार्थ एवं वास्तविक आँकड़ों को प्रत्यक्ष रूप में संकलन करने में महत्त्वपूर्ण स्थान है । यह प्रश्नों की एक सूची है जिसे अनुसन्धानकर्ता सूचनादाता के पास लेकर जाता है तथा उससे प्रश्नों के उत्तर पूछ कर स्वयं उन्हें अनुसूची में अंकित करता है । क्योंकि इसमें साक्षात्कार तथा निरीक्षण या अवलोकन पूरक ( सहायक ) प्रविधियाँ का कार्य करती हैं , अतः यह अधिक विश्वसनीय आँकड़ों के संकलन में सहायक है । भारतीय समाज में हो रहे सामाजिक अनुसन्धानों में इस प्रविधि का सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है क्योंकि के द्वारा शिक्षित तथा अशिक्षित दोनों प्रकार के सूचनादाताओं से आँकड़े एकत्रित किए जा सकते हैं । अनुसूची प्रश्नों की एक सूची है अर्थात् यह अनुसन्धान समस्या से सम्बन्धित आँकड़े एकत्रित करने के लिए बनाए गए प्रश्नों की एक तालिका है जिसे अनुसन्धानकर्ता प्रत्येक सूचनादाता के पास लेकर जाता है तथा साक्षात्कार द्वारा उन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करके उन्हें स्वयं उस प्रपत्र पर अंकित करता है , जिस पर कि प्रश्न अंकित है । इसमें अनुसन्धानकर्ता को प्रत्येक सूचनादाता से प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता प्रायः लोग अनुसूची तथा प्रश्नावली ( Questionnaire ) को एक ही समझ लेते हैं क्योंकि प्रश्नावली भी प्रश्नों की एक सूची है । परन्तु प्रश्नावली को लेकर अनुसन्धानकर्ता स्वयं सूचनादाता के पास नहीं जाता अपितु इसे डाक द्वारा भेजता है जिसके कारण इसे डाक प्रश्नावली ( Mailed questionnarire ) कहते हैं । यदि सूचनादाता एक ही स्थान पर उपलब्ध हैं तो अनुसन्धानकर्ता प्रत्येक सूचनादाता को एक - एक प्रश्नावली दे देता है जिसका उत्तर स्वयं सूचनादाता भरते हैं । अतः अनुसूची तथा प्रश्नावली एक ही नहीं हैं वरन् इनमें उत्तर प्राप्त करने के ढंग तथा उत्तरों को अंकित करने की दृष्टि से मूलभूत अन्तर हैं । प्रमुख विद्वानों ने अनुसूची की परिभाषाएँ निम्नलिखित शब्दों में दी हैं

    गुडे तथा हॉट - “ अनुसूची प्रायः ऐसे प्रश्नों के समूह का नाम है जिन्हें एक साक्षात्कारकर्ता अन्य व्यक्ति से आमने - सामने की स्थिति में पूछता है तथा उनके उत्तर स्वयं भरता है ।


    गुडे तथा हॉट्ट के अनुसार , " अनसूची उन प्रश्नों के एक समूह का नाम है जो साक्षात्कारकर्ता द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति से आमने - सामने की स्थिति में पूछे और भरे जाते हैं । " बोगाईस के शब्दों में , " अनुसूची तथ्यों को प्राप्त करने के लिए एक औपचारिक पद्धति का प्रतिनिधित्व करती है जो वैषयिक स्वरूप में है और जो सरलता से पता लगाने योग्य है । अनुसूची , अन्वेषणकर्ता स्वयं द्वारा भरी जाती है । "


    सी . ए . मोजर के अनुसार , " चूकि यह साक्षात्कारकर्ताओं द्वारा संचालित होती है , यह स्पष्टतया एक औपचारिक प्रलेख हो सकती है जिसमें आकर्षण की बजाय क्षेत्र संचालन की कुशलता मे कार्यशील विचार है । "


    " बोगार्डस - " अनुसूची तथ्यों को एकत्रित करने के लिए एक औपचारिक प्रणाली का प्रतिनिधित्व करती है जो वस्तुनिष्ठ रूप में है एवं आसानी से प्रत्यक्ष अनुभव किए जाने योग्य है । . . . . . अनुसूची स्वयं अनुसन्धानकर्ता द्वारा भरी जाती है । "


    पी . वी . यंग - “ अनुसूची औपचारिक तथा मानक अनुसन्धानों में प्रयोग किए जाने वाला एक ऐसा उपकरण है जिसका प्रमुख उद्देश्य बहुस्तरीय गणनात्मक आँकड़े संकलन करने में सहायता प्रदान करना है ।


    " मेकोर्मिक - “ अनुसूची प्रश्नों की एक सूची से अधिक कुछ भी नहीं है जिनका उपकल्पना या उपकल्पनाओं की जाँच के लिए उत्तर देना आवश्यक दिखाई देता है । " उपयुक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि अनुसूची एक ऐसा प्रपत्र या फार्म है जिस पर अनुसन्धान की समस्या से सम्बन्धित विभिन्न प्रश्नों को निश्चित क्रम में लिखा हआ होता है तथा जिसे लेकर अनुसन्धानकर्ता सूचनादाता के पास जाता है और औपचारिक साक्षात्कार द्वारा इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करके इनके उत्तर स्वयं भरता है ।






    अनुसूची की विशेषताएँ

    ( Characteristics of Schedule )


    अनुसूची की परिभाषाओं से एक अच्छी अनुसूची की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं



    1. प्रश्नों की सूची ( Proper sequence of questions ) - अनुसूची एक प्रपत्र या फॉर्म है . जिस पर अनुसन्धान समस्या से सम्बन्धित प्रश्नों को लिखा गया ( छपवाया ) होता है अर्थात यह प्रश्नों की एक सूची है । प्रश्नों की संख्या कितनी होगी . यह अनुसन्धान समस्या तथा सूचनादाताओं पर निर्भर करता है ।


    2.प्रत्यक्ष सम्पर्क ( Easy and clear questions ) - अनुसूची में अनुसन्धानकर्ता ( या साक्षात्कारकर्ता ) को स्वयं प्रत्येक सूचनादाता से सम्पर्क स्थापित करके ही प्रश्नों को औपचारिक रूप से पूछ कर उनके उत्तर प्राप्त करने पड़ते हैं ।


    ( 3 ) प्रमुख क्षेत्रीय अनुसन्धान प्रविधि ( Limited size ) - अनुसूची क्षेत्रीय अनुसन्धानों में सूचना संकलन करने की एक प्रमुख प्रविधि है तथा अधिकांश सामाजिक अनुसन्धानों में तथ्यों का संकलन इसी प्रविधि द्वारा किया जाता है ।


    ( 4 ) अन्य प्रविधियों का प्रयोग ( Accurate communication ) - अनुसूची के अन्तर्गत दो अन्य प्रविधियाँ - निरीक्षण या अवलोकन तथा साक्षात्कार - सहायक अथवा पूरक प्रविधियों के रूप में प्रयोग की जाती हैं । अतः इसमें अवलोकन तथा साक्षात्कार की मुख्य विशेषताएँ भी पाई जाती हैं । एक प्रकार से इसमें तीन प्रविधियों का एक साथ प्रयोग होता है ।


    5. प्रश्नों का उचित क्रम ( Proper sequence of questions ) - एक अच्छी अनुसूची की पहली विशेषता प्रश्नों का उचित क्रम है । इतने क्रमबद्ध रूप से प्रश्नों को लिखा जाता है कि प्रश्नों में आन्तरिक सम्बद्धता ( Internal consistency ) आ जाती है अर्थात प्रश्न एक - दूसरे से जुड़े होते हैं जिससे कि सूचनादाता को यह अनुभव हो कि समस्या से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं के बारे में व्यवस्थित रूप से जानकारी प्राप्त की जा रही है ।


    6. सरल एवं स्पष्ट प्रश्न ( Easy and clear questions ) - एक अच्छी अनुसूची की दूसरी प्रमुख विशेषता प्रश्नों की इस प्रकार से रचना करना है कि वे सरल होने के साथ - साथ स्पष्ट भी हों ताकि सूचनादाता उन्हें अच्छी प्रकार से समझ सकें । यद्यपि इस प्रविधि में अनुसन्धानकर्ता स्वयं सूचनादाता के समक्ष रह कर ही प्रश्न पूछता है , फिर भी यह प्रयास किया जाना चाहिए कि सरल एवं स्पष्ट प्रश्नों का निर्माण किया जाए जिन्हें विभिन्न सूचनादाता एक ही अर्थ में समझ सकें ।


    7. सीमित आकार ( Limited size ) - प्रश्नों की संख्या कितनी होनी चाहिए यद्यपि यह समस्या की प्रकृति पर निर्भर करता है , फिर भी एक अच्छी अनुसूची का आकार सीमित होना चाहिए । केवल अनुसन्धान की समस्या से सम्बन्धित प्रश्नों को ही इसमें सम्मिलित किया जाना चाहिए ।


    8. सही सन्देशवाहन ( Accurate communication ) - एक अच्छी अनुसूची में प्रश्नों की रचना इस प्रकार से करना अनिवार्य है जिससे कि सूचनादाता के मन में किसी प्रकार की गलत धारणा विकसित न हो और वह सही अर्थों में प्रश्नों को समझ सकें ।


    9. सही प्रत्युत्तर ( Accurate response ) - एक अच्छी अनुसूची की एक अन्य प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें प्रश्नों का निर्माण इस प्रकार से किया जाए कि उनसे केवल आवश्यक , उपयोगी एवं यथार्थ आँकड़े ही एकत्रित किए जा सकें ।

    10. क्रॉस - प्रश्नों की व्यवस्था ( Provision of cross - questions ) - एक अच्छी अनुसूची उसे कहा जाता है जिसमें समस्या से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं के बार म क्रॉस - प्रश्न पूछे जाने की व्यवस्था हो ताकि सूचनादाता द्वारा दी गई सूचना की जाच विभिन्न प्रश्नों के आधार पर ही की जा सके ।ओं पर प्रश्नों का लिखा अनुसूची का भौतिक स्वरूप ( Physical Features of a Schedule ) पर्यस्त विशेषताओं के अतिरिक्त अनुसूची की बाह्य आकृति अर्थात आकार . ग - रूप तथा मद्रण भी ठीक होना चाहिए । यद्यपि इसे अनसन्धानकर्ता स्वयं अपने पास रखता है फिर भी शिक्षित व्यक्ति हो सकता है एक बार इसे देखना चाहें । अतः अनुसूची का भौतिक स्वरूप इस प्रकार होना चाहिए











    अनुसूची के उद्देश्य

    ( Objectives of Schedule )




    1.प्रामाणिक अध्ययन ( Valid Study ) - प्रामाणिक उत्तर पाने के लिए , अनुसंधानकर्ता स्वयं व्यक्तिगत रूप में व्यक्तियों से सम्बन्ध स्थापित करता है । अनसंधानकर्ता वही उत्तर प्राप्त करने की कोशिश करता है जो उसकी दृष्टि में उपयोगी एवं सार्थक हैं । अतः उत्तरदाताओं को विभिन्न अर्थ लगाने का मौका नहीं | मिलता । इससे अध्ययन में प्रामाणिकता पाती है ।

    2. अनुपयोगी संकलन से बचाव ( Guard Against Useless Collection ) अनसूची का उद्देश्य विषय से सम्बन्धित प्रश्नों का क्रमबद्ध उत्तर प्राप्त करना होता है । अनुसूची के अभाव में निरर्थक बातों की जानकारी भी सम्भव होती है क्योंकि स्मरण शक्ति पर पूर्ण भरोसा नहीं किया जा सकता कि दिमाग में पहले से जो प्रश्न तय किए हैं , वे ही पूछे जाएंगे । अनुसूची में ऐसी कोई गलती नहीं हो सकती क्योंकि प्रश्न लिखिल व क्रमबद्ध है । अतः वह केवल सम्बन्धित तथ्यों को ही संकलित करेगा ।


    3. संख्यात्मक आंकड़ों के संकलन में उपयोगी ( Useful in Collecting Numerical Facts ) - यह प्रविधि संख्यात्मक सूचना NCES ) - यह प्रविधि संख्यात्मक सुचनामों एवं प्राँकड़ों को एकत्र करने में अधिक उपयोगी है । विचारात्मक सचनायों या भावनात्मक जानकारी के लिए यह प्रबिधि उपयुक्त नहीं है ।


    4. अवलोकन में सहायता प्रदान करना ( Helpful in observation ) - अनुसूची विशष रूप से अवलोकन अनसची ) का उद्देश्य अवलोकनकर्ता की निरीक्षण क्षमता को बढ़ाना तथा अवलोकन को अधिक वैज्ञानिक बनाना है क्योंकि यह प्रविधि वस्तुनिष्ठ अभिलेखन एवं अनिवा र्य सूचना संकलन करने में विशेष रूप से सहायता प्रदान करती को विभिन्न पहलुओं के बारे में अवलोकन का अवसर प्रदानकरके अध्ययन को अधिक विश्वसनीय बनाती है । अतः यह अवलोकन में निम्न प्रकार से योगदान प्रदान करती है ( i ) यह प्रविधि निरीक्षणकर्ता की अवलोकन क्षमता को बढ़ाने में सहायता प्रदान करती है ; ( ii ) यह प्रविधि निरीक्षण को उद्देश्यों के अनुरूप बनाती है ; ( iii ) यह प्रविधि निरीक्षण को अधिक वस्तुनिष्ठ बनाती है ; तथा ( iv ) यह प्रविधि निरीक्षण परिणामों का प्रमापीकरण ( Standardization ) करने में सहायता प्रदान करती है ।

    5. अध्ययन को गहन एवं अधिक अर्थपूर्ण बनाना ( To make study inten sive and more meaningful ) - अनुसूची क्योंकि निरीक्षण एवं साक्षात्कार प्रविधियों को भी अपने में सन्निहित करती है । अतः यह अध्ययन को अन्य प्रविधियों की अपेक्षा अधिक गहन एवं अर्थपूर्ण बनाने में सहायक है ।


    6. मूल्यांकन अध्ययनों में सहायता प्रदान करना ( Helpful in evaluation studies ) - अनुसूची का उद्देश्य मूल्यांकन अध्ययनों में सहायता प्रदान करना है । इससे हम सूचनादाताओं के मतों , रायों , रुचियों , मनोवृत्तियों तथा विचारों में पाए जाने वाली भिन्नताओं एवं समानताओं का पता लगा सकते हैं अर्थात् उनके मूल्यों का मूल्यांकन कर सकते हैं ।


    7. सभी प्रकार के आँकड़े संकलन करने में सहायता प्रदान करना ( Helpful in collection of all types of data ) - अनुसूची केवल प्राथमिक आँकड़े संकलन करने में ही सहायक नहीं है , अपितु प्रलेखीय या ऐतिहासिक आँकड़ें संकलन करने में भी सहायक है । संस्था सर्वेक्षण अनुसूची या प्रलेख अनुसूची द्वितीयक आँकड़ों के संकलन में सहायता प्रदान करती है ।








    आवश्यक स्तर

    ( Necessary Sages )


    उपर्युक्त अनुसूचियों को तथ्यों के संकलन के लिए काम में लाया जाता है । अनुसूची द्वारा सामग्री प्राप्त करने के लिए कुछ अावश्यक स्तरों ( Stages ) से गुजरना पड़ता है , जिन्हें हम इस प्रकार प्रस्तुत कर सकते हैं


    ( 1 ) उत्तरदाताओं का चयन ( Selection of Respondents ) - अनुसूची के प्रयोग करने में सर्वप्रथम उत्तरदाताओं का चयन किया जाता है जिनसे कि सूचना एकत्र करनी है । इसके अन्तर्गत दो प्रकार की प्रणालियों को अपनाया जा सकता है - - संगगणना पद्धति ( Census Method ) और निदर्शन पद्धति । जहाँ समूह के भी व्यक्तियों से माक्षात्कार करके अनुसूची को भरा जाय , उसमें संगणनो पद्धति को अपनाया जाता है । संगणना पद्धति को अपनाने से पूर्व अनुसंधानकर्ता देख लेता है कि अध्ययन - ममस्या की प्रकृति किस प्रकार की है । वह समूह को कई उप - समहों में भी विभाजित कर सकता है । इसके बावजूद भी उन सबके उत्तरों को अनसची में स्थान नहीं दे सकता तो निदर्शन पद्धति को काम में लाया जाता है । निदर्शन पद्धति द्वारा कर उत्तरदातायों का चयन कर उनका साक्षात्कार कर लिया जाता और उनसे प्राप्त मत्रनायों को अनुमचिया म भर दिया जाता है । चने हा व्यक्तियों का ग व्यारा अर्थात् उनके बारे म पागम्भक जानकारी को तुरन्त ही लिख लिया जाना चाहिए । इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि उत्तरदाता उपलब्ध होंगे अथवा नहीं । उनसे सम्पर्क बनाए रखना चाहिए ।


    ( 2 ) जांचकर्ताओं का चयन एवं प्रशिक्षण ( The Selection and Training of Investigators ) - जहाँ कुछ लोगों का साक्षात्कार करना है , वहाँ अनुसंधानकर्ता स्वयं जाकर उनसे अभीष्ट सूचना प्राप्त कर उसे अनुसूची में भर सकता है । यदि साक्षात्कारदाताओं की संख्या अधिक हो तो अनुसंधानकर्ता कुछ ऐसे जाँचकर्ताओं का चयन कर सकता है जो बड़ी ही कुशलता , सूझबूझ , धैर्य और होशियारी से अनुसूची में साक्षात्कार द्वारा सूचना को भर सकता हो । उनके चयन में अनुसंधानकर्ता को बड़ी सावधानी रखनी पड़ती है क्योंकि बिना अनुभव वाले जिन जाँचकर्ताओं का चयन किया जा रहा है वे यदि अनुपयुक्त सिद्ध होते हों तो अनुसंधान कार्य सही रूप में संचालित नहीं हो सकता । अत : उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए । उनके लिए प्रारम्भिक प्रशिक्षण शिविर होने चाहिएं ताकि उन्हें अध्ययन की प्रकृति , क्षेत्र , उद्देश्य , अनुसूचियों को भरने के तरीके , साक्षात्कार के तरीके , कौनसी सूचनाओं को प्राथमिकता देना आदि बातों का पूरा ज्ञान हो सके ।


    ( 3 ) तथ्य - सामग्री का संकलन ( Collection of Data ) - - तथ्य - सामग्री के संकलन के लिए अध्ययनकर्ता या जाँचकर्ता को साक्षात्कार करने के लिए निश्चित स्थान पर पहुंचना पड़ता है । उत्तरदाताओं से सूचना प्राप्त करके उसे अनुसूची में भरना होता है , लेकिन इसके लिए एक क्रमिक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है जो इस प्रकार है - -


    4 ) सूचनादाताओं से सम्पर्क ( Contact with Informants ) - साक्षात्कार द्वारा सूचना प्राप्त करने से पूर्व , सूचनादाताओं से सम्पर्क करना होता है । इस सम्पर्क स्थापित करने में क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं को कुशलता , चतुरता , धैर्य और शान्ति से काम लेना पड़ता है । यदि प्रारम्भ में ही कार्यकर्ता , सूचनादाता को प्रभावित नहीं कर पाया तो उससे सूचना प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है । यदि सूचनादाता के मस्तिष्क में , कार्यकर्ता के प्रति कुछ गलत धारणाएँ बैठ गई या कोई संशय पैदा हो गया तो ऐसी स्थिति में सूचना प्राप्त करना बिल्कुल असम्भव है । अतः कार्यकर्ता को चाहिए कि वह बड़े प्रभावशाली ढंग से अपना परिचय दे , अपनी मधुर वाणी और सौम्य स्वभाव से उसका हृदय जीत ले । उसे बड़े ही विनम्र ढंग से अभिवादन करके उसके स्वभाव , आदतों एवं व्यवहार के साथ तारतम्य स्थापित करना चाहिए । अतः उसे ऐसी स्थिति उत्पन्न करनी चाहिए कि सूचनादाता स्वयं उत्साहित होकर . लेनी चाहिए । कार्यकर्त्ता को यह ध्यान रखना चाहिए कि उससे प्रश्न कव पूछे जाएँ । यदि सूचनादाता किसी काम में व्यस्त हो गया हो तो उसके काम में विघ्न नहीं पहुँचाना चाहिए । उसे धैर्य रखकर समयानुकूल परिस्थिति में ही प्रश्न पूछने चाहिए ।


    5 ) साक्षात्कार ( Interview ) — सूचनादाता से सम्पर्क स्थापित करने के पश्चात् साक्षात्कार का कार्य शुरू किया जाता है । साक्षात्कार करना भी उतना ही कठिन है जितना कि सूचनादाताओं से सम्पर्क स्थापित करना । साक्षात्कार करते समय , अनुसंधानकर्ता को यह विशेष ध्यान रखना चाहिए कि वह प्रश्नों की बौछार एकदम न कर दे । उसका उद्देश्य साक्षात्कारदाता से अधिक से अधिक विश्वसनीय जानकारी प्राप्त करना होता है , यह तभी सम्भव हो सकता है जब अनुसंधानकर्ता एक स्वाभाविक वातावरण में सूचनादाता के मनोभावों को ध्यान में रखते हुए , सूचना प्राप्त करता है । बीच में थोड़ा रुककर कुछ इधर - उधर की बातें करनी चाहिएँ ताकि सूचनादाता की अभिरुचि बनी रहे । साक्षात्कार को रोचक बनाने के लिए कुछ हंसी - मजाक की बात भी कर लेनी चाहिए या कोई उपयुक्त दृष्टान्त दे देना चाहिए , ताकि सूचनादाता , साक्षात्कार को कोई बोझ न समझ कर एक ' रुचिपूर्ण भेट ' समझे ।


    ( 6 ) सूचना प्राप्त करना ( To Obtam Information ) - साक्षात्कार करते समय यह समस्या पैदा हो जाती है कि सूचनादाता से किस प्रकार संगतपूर्ण एवं विश्वसनीय सूचनाएं प्राप्त की जाएं । साक्षात्कारकर्ता को अनुसूची में से एक एक करके प्रश्न कर सूचना प्राप्त करनी चाहिए । लेकिन साक्षात्कारदाता के दिमाग में यह आशंका पैदा न हो कि अनुसंधानकर्ता उससे कोई गुप्त जानकारी प्राप्त कर रहा है या उसे किसी उलझन में डाल रहा है । यदि उत्तरदाता सूचना देते समय मुख्य विषय से हट जाता है तो ऐसी स्थिति में बड़ी सावधानीपूर्वक उसका ध्यान मुख्य विषय की ओर केन्द्रित करना चाहिए या उसे साक्षात्कार के बीच में कुछ अन्य बातें करके , बंद कर देना चाहिए । यह भी सम्भव हो सकता है कि प्रश्नों के स्पष्ट न होने के कारण सूचना पाता उसका कुछ और ही अर्थ समझ बैठे जिसके फलस्वरूप वह मुख्य विषय से विचलित हो जाता हो । अत : अनुसंधानकर्ता या अध्ययनकर्ता को चाहिए कि वे सटीक एवम् स्पष्ट प्रश्नों का निर्माण करें ।












    अनुसूचियों का सम्पादन

    ( Editing of Schedules )


    जब जांचकर्ताओं से सब अनसूचियाँ प्राप्त हो जाती हैं तो उनका सम्पादन किया जाता है जिसकी प्रक्रिया इस प्रकार है


    ( i ) अनुसूचियों की जांच ( Checking the Schedules ) - सर्वप्रथम कार्य कर्ताओं द्वारा भेजी हुई अनुसूचियों की जांच की जाती है । वहाँ यह ध्यान रखा जाता है कि सभी अन्सचियाँ प्राप्त हुई हैं अथवा नहीं । इसके पश्चात् सचियों का वर्गीकरण किया जाता है । यह वर्गीकरण कार्यकर्ताओं या जाँचकर्ताओं के आधार पर किया जाता है । प्रत्येक जाँचकर्ता द्वारा भेजी गई अनुसूचियों की अलग - अलग फाइल तैयार की जाती है और उस फाइल पर चिट लगाकर कार्यकर्ता का नाम , क्षेत्र , सचनादातानों की संख्या ग्रादि लिख दी जाती है ।


    ( ii ) प्रविष्टियों की जांच ( Checking the Entries ) - अनुसंधानकर्ता समस्त प्रविष्टियों की जाँच करता है । यदि कोई खाना नहीं भरा गया हो या गलत खाने में उत्तर लिख दिया गया हो तो उनके कारण का पता लगाकर उस त्रुटि को दूर करने का प्रयत्न करता है । यदि वह स्वयं गलती को ठीक कर सकता है तो उसे उसी समय ठीक कर देता है , अन्यथा अनुसूची को कार्यकर्ता के पास लौटा दिया जाताहै जिसमें या तो वह स्वयं ही संशोधन कर देता है या उत्तरदाता से पुनः मिलकर सही सूचना प्राप्त करता है ।


    ( ii i) गंदी अनुसूचियाँ ( Dirty Schedules ) - अनुसंधानकर्ता , गंदी ' अनुसूचियों को अलग कर देता है । जो पढ़ने योग्य न हों या फट गई हों या अन्य किसी कारण से सूचना देने योग्य न हों , उन्हें कार्यकर्ता के पास भेज दी जाती हैं ताकि यथार्थ सूचना प्राप्त हो सके ।


    iv ) संकेतन ( Coding ) - अनुसंधानकर्ता सारणीयन के कार्य में प्रसुविधा दूर करने के लिए संकेतन का कार्य करता है । वह सभी उत्तरों का निश्चित भागों में वर्गीकरण कर देता है प्रत्येक वर्ग को संकेत सख्या प्रदान की जाती है ।












    अनुसूची निर्माण की प्रक्रिया

    ( Process of Schedule Preparing )


    अनुसूची का निर्माण करना एक कठिन कार्य है । इसकी रचना क्योंकि अनुसन्धान की समस्या के विभिन्न पहलुओं के बारे में प्रमाणित , आवश्यक एवं व्यवस्थित सूचनाएँ संकलन करने के लिए की जाती है । अतः इसका निर्माण करने से पहले समस्या की प्रकृति तथा इसके विभिन्न पहलुओं के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान होना अनिवार्य है ताकि इसमें समस्या के अनुरूप प्रश्नों को सम्मिलित किया जा सके । अनसची की रचना की सम्पूर्ण प्रक्रिया को हम अपनी सुविधा के लिए निम्नलिखित चरणों में विभाजित कर सकते हैं


    1. साहा का ज्ञान ( Knowledge about problem ) - अनसची निर्माण का प्रथम चरण अनुरासाल की समस्या के बारे में जानकारी प्राप्त करना है । यदि समस्या के विभिन्न पहलू ही स्पष्ट नहीं हैं तो हो सकता है कि अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्न छूट जाएँ । व अनसची की रचना करने से पहले अनुसन्धानकर्ता को यह पता होना चाहिए कि या की प्रकति कैसी है अर्थात् इसके विभिन्न पक्ष कौन - से हैं और किस पक्ष को कितना अधिक या कम महत्त्व देना है ।


    2. प्रश्नों की रचना ( Construction of questions ) - अनुसूची का दूसरा चरण सिन्धान की समस्या के विभिन्न पहलुओं के बारे में वास्तविक प्रश्नों की रचना करना है । यदि विभिन्न पहलू ही स्पष्ट नहीं हैं तो फिर अनुसन्धानकर्ता को यह निर्णय लेना चाहिए कि इन पहलुओं के बारे में किन प्रश्नों से सूचना प्राप्त की जा सकती है । इस चरण में प्रत्येक पहलू को अनेक भागों एवं उपभागों में विभाजित करके उनके बारे में जितने भी प्रश्नों का निर्माण किया जा सकता है किया जाना चाहिए । यदि कुछ पहलू ऐसे हैं जिनके बारे में प्रत्यक्ष प्रश्नों द्वारा सूचना एकत्रित करना कठिन है तो उनके बारे में अप्रत्यक्ष प्रश्नों का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि जो प्रश्न ठीक नहीं लगे उन्हें इसी चरण में निकाला जा सके ।


    3 प्रश्नों की भाषा एवं क्रम ( Language and sequence of questions ) अनुसूची निर्माण का तीसरा चरण प्रश्नों की स्पष्टता एवं उनके क्रम के निर्धारण से सम्बन्धित है । प्रश्नों की भाषा यथासम्भव सरल रखनी चाहिए ताकि सूचनादाता इन्हें एक समान अर्थ में समझ सके । साथ ही , प्रश्नों को एक निश्चित क्रम में लिखा जाना चाहिए । प्रश्नों का क्रम इतना अधिक व्यवस्थित होना चाहिए कि इसमें आन्तरिक सम्बद्धता आ जाए ताकि सूचनादाता प्रत्युत्तर देते समय यह अनुभव करे कि उससे धीरे - धीरे अनुसन्धान की समस्या के बारे में सूचना एकत्रित की जा रही है ।


    4 प्रश्नों की वैधता की जाँच करना ( Testing the validity of questions ) - प्रश्नों का स्पष्ट निर्माण कर लेने तथा इन्हें एक व्यवस्थित क्रम में लिख लेने के बाद चौथा चरण प्रश्नों की वैधता की जाँच करना है । इनकी जाँच जिस समग्र का अध्ययन किया जा रहा है , उसमें से कुछ सूचनादाताओं का चयन करके की जा सकती है । जिन प्रश्नों का समझने में सूचनादाताओं को किसी प्रकार की कठिनाई हो रही हो उनको भाषा ठीक कर दी जानी चाहिए । अस्पष्ट प्रश्नों को अनुसूची से निकाल दिया जाना चाहिए तथा प्रश्नों से एकत्रित सचना का एक बार मूल्यांकन करके वह देख लेना चाहिए कि विभिन्न पहलुओं के बारे में जो आवश्यक सूचनाएँ चाहिए वह इन प्रश्नों से प्राप्त हो रही हैं या नहीं


    5 अनुसूची की बाह्य आकति ( Lay - out of schedule ) - अनुसूची का निर्माण करत समय इसकी बाह्य आकृति का भी पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए । प्रश्नों की COMREDMINOTE लेने के पश्चात जिन प्रश्नों को अनुसूची में सम्मिलित करना है उन्हें काज पर छपवाया जाना चाहिए । अनुसूची का आकार सामान्यरूप से 8 . 5 x 11 इंच होता है परन्त इसे सविधानुसार कम या अधिक किया जा सकता है । कागज के साथ - साथ छपाई भी अच्छी होना चाहिए ।













    अनुसूची की अन्तर्वस्तु

    ( Contents of a Schedue )


    अनुसूची का निर्माण करते समय उसकी बाह्य आकृति के साथ - साथ इसकी अन्तर्वस्तु के बारे में भी विशेष ध्यान रखना चाहिए । अनुसूची की अन्तर्वस्तु को तीन भागों में बाँटा जा सकता है


    ( 1 ) प्रारम्भिक भाग ( Introductory part ) - इसमें अन्वेषण की सम्पूर्ण जानकारी होती है एवं सूचनादाता के बारे में सामान्य सूचना प्राप्त करने के बारे में कुछ प्रश्न होते हैं , जिनसे उसका नाम , आयु , लिंग , जाति , शिक्षा , पारिवारिक जीवन तथा परिवार की आर्थिक स्थिति इत्यादि के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सके । समाजशास्त्रीय अन्वेषणों में सभी अनुसूचियों का प्रारम्भिक भाग लगभग एक जैसा होता है ।


    ( 2 ) मुख्य भाग ( Main body ) - इसमें समस्या के विभिन्न पहलुओं के बारे में प्रश्नों को सम्मिलित किया जाता है । यह अनुसूची का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है । अतः इसका निर्माण विशेष सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए । यदि विभिन्न पहलुओं के शीर्षक या उपशीर्षक लिखने जरूरी हों , उन्हें भी लिखा जा सकता है । ।


    ( 3 ) साक्षात्कारकर्ताओं के लिए सामान्य निर्देश ( General instructions for interviewers ) - इसमें साक्षात्कारकर्ताओं के लिए अतिरिक्त सूचना प्राप्त करने सम्बन्धी सामान्य निर्देश होते हैं । यद्यपि अनुसूची द्वारा सूचना संकलन करने से पहले साक्षात्कारकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जाता है फिर भी इस भाग में सामान्य निर्देश दिए जा सकते हैं ताकि वह अवलोकन द्वारा प्राप्त अतिरिक्त सूचना को लेखबद्ध कर सके ।

















    अनुसूची निर्माण में सावधानियाँ

    ( Precautions for Preparing a Schedule )


    यदि अनुसूची का निर्माण करते समय कुछ सामान्य सावधानियाँ रखी जाएँ तो एक सन्तुलित एवं अच्छी अनुसूची की रचना हो सकती है । एक अच्छी अनसची का निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाना अनिवार्य है


    1. भावात्मक अथवा चुनौती देने वाले प्रश्नों को यथासम्भव अनुसूची में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए ।


    2. पथ - प्रदर्शक एवं उत्तर का आभास देने वाले प्रश्नों को भी यथासम्भव अनुसूची में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए । ( 3. अनावश्यक प्रश्नों को अनुसूची में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए । इसमें केवल अनिवार्य प्रश्न ही होने चाहिए ।


    काल्पनिक परिस्थितियों , सूचनादाताओं के व्यक्तिगत जीवन एवं रहस्यमय परिस्थितियों के बारे में प्रश्न अथवा सूचनादाता के मन में किसी प्रकार का सन्देह पैदा करने वाले प्रश्नों को अनुसूची में , यदि अत्यन्त अनिवार्य न हो तो , नहीं पूछना चाहिए ।


    4 प्रश्नों की रचना में अश्लील , आपत्तिजनक एवं संवेदनशील शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए ।


    5. प्रश्न ऐसे होने चाहिए कि उनके उत्तर बिना किसी पूर्वाग्रह के दिए जा सकें ।


    6. यथासम्भव ऐसे प्रश्न अनुसूची में सम्मिलित किए जाने चाहिए जिनके बारे में तुलनात्मक आँकड़े उपलब्ध हैं ।


    7. प्रश्नों की भाषा सरल होनी चाहिए अर्थात् प्रश्नों की रचना इस प्रकार की जानी चाहिए कि सूचनादाता उन्हें एक ही अर्थ में समझें तथा साथ ही उन्हें सरलता से समझ सकें ।


    8. प्रश्नों का आकार सीमित होना चाहिए अर्थात् अधिक लम्बे प्रश्नों की रचना नहीं की जानी चाहिए । का व्यवस्थित क्रम में रखा जाना चाहिए ताकि सम्पूर्ण अनुसूची में सातारक सम्बद्धता आ जाए ।


    9. प्रश्न परस्पर सम्बन्धित होने चाहिए ताकि ऐसा लगे कि वे एक - दूसरे के पूरक या साथ ही ऐसे भी हैं जिनके उत्तरों की प्रामाणिकता की जाँच की जा सकती है ।


    10.अधिकतर प्रश्न संरचित ( Structured ) होने चाहिए अर्थात उनके वैकल्पिक सत्तर भी साथ दिए जाने चाहिए ताकि सूचनादाता सुगमतापूर्वक उनके उत्तर दे सकें ।

    ( 6 ) प्रश्न स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष होने चाहिए अर्थात किसी चीज को घुमा फिरा कर पाने के बजाय स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष रूप से पूछा जाना चाहिए ।










    अनुसूची के प्रकार

    ( Types of Schedule )



    सामाजिक अनुसन्धान में कई प्रकार की अनुसूचियों को प्रयोग में लाया जाता है । मुख्य रूप में सामाजिक अनुसन्धान में प्रयोग की जाने वाली अनुसूचियों को निम्नलिखित श्रेणियों या प्रकारों में विभाजित कर सकते हैं


    ( 1 ) अवलोकन - अनुसची ( Observation Schedule ) - इस प्रकार की अनुसूची के अन्तर्गत अवलोकनकर्ता स्वयं अन सूची को निरीक्षण के समय में अपने पास रखता है और स्वयं निरीक्षण कर तथ्यों को उसमें भर देता है ।


    ( 2 ) मूल्यांकन अनुसूची ( Rating Schedule ) - - - उत्तरदाताओं की विषय से सम्बन्धित प्रवृत्ति , पसंदगी और मत जानने के लिए इस सूची को प्रयोग में लाया जाता है ।


    ( 3 ) साक्षात्कार अनुसची - क्रमबद्ध रूप में साक्षात्कार लेने के लिए इस सूची को काम में लाया जाता है ।


    ( 4 ) प्रलेखीय अनुसची ( Documentary Schedule ) - - इस प्रकार की अनुसूची को तब काम में लाया जाता है जब लिखित प्रलेखों जैसे डायरियों , पत्रों , आत्मकथाओं आदि से सूचना को एकत्र करना हो ।



    (5) संस्था - सर्वेक्षण अनुसूची ( Institution - survey schedule ) - इस प्रकार का अनुसूची का प्रयोग , जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है , संस्था के सर्वेक्षण अथवा इसकी विभिन्न समस्याओं का अध्ययन करने के लिए किया जाता है । इस प्रकार की अनुसूची , वास्तव में संस्था से सम्बन्धित सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए एक लम्बी प्रश्नों की सूची होती है । पी . वी . यंग के अनुसार संस्था - सर्वेक्षण अनुसूची का प्रयोग किसी संस्था के समक्ष उत्पन्न होने वाली समस्याओं का पता लगाने के लिए किया जाता है । सरकारी संस्थाओं के बारे में अध्ययन करने के लिए इस प्रकार की अनुसूचियाँ मुख्य रूप से उपयोगी हैं । अनसूची में अनेक प्रकार के प्रश्नों की रचना की जाती है तथा किसी अनुसूची में किस प्रकार के प्रश्न होने चाहिए यह अनुसन्धान की समस्या तथा प्रकृति पर तथा उत्तरदाताओं का प्रकृति पर निर्भर करता है । अनुसूची में पछे जाने वाले प्रश्नों को निम्नांकित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है


    a.अप्रतिबन्धित या खुले प्रश्न ( Open - ended questions ) - ये वे प्रश्न हैं जिनके सम्भावित उत्तर प्रश्न के साथ नहीं लिखे जाते अपित जिनका उत्तर देने के बारे में उत्तरदाताओं को पूर्ण स्वतन्त्रता होती है । ऐसे प्रश्नों के उत्तर छोटे भी हो सकते हैं तथा अधिक लम्बे भी । ऐसे प्रश्नों के क

  • SCIENTIFIC METHOD15:58




    वैज्ञानिक पद्धति

    ( SCIENTIFIC METHOD )



    वैज्ञानिक पद्धति का तात्पर्य अनुसन्धान की किसी भी ऐसी पद्धति से है , जिसके द्वारा निष्पक्ष एवं व्यवस्थित ज्ञान को प्राप्त किया जाता है । " ए . वल्फ कहते हैं कि " विस्तृत अर्थों में कोई भी अनुसन्धान विधि जिसके द्वरा विज्ञान का निर्माण एवं विस्तार होता है , वैज्ञानिक पद्धति कही जाती है वैज्ञानिक विधि ( Scientific Method ) आधुनिक युग विज्ञान का युग है । कोई भी घटना कितनी ही सरल और जटिल क्यों न हो , उनका अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से किया जाता है । साधारणतया लोग विज्ञान शब्द से विशिष्ट प्रकार की विषय - सामग्री समझ लेते हैं । उदाहरणस्वरूप - जीव विज्ञान , रसायनशास्त्र , इन्जीनियरिंग , भौतिकशास्त्र इत्यादि । किन्तु ऐसा समझना गलत है । विज्ञान का विषय - सामग्री से कोई सम्बन्ध नहीं है । कोई भी विषय - सामग्री विज्ञान हो सकती है यदि उसे वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा अध्ययन किया जा सके । इसलिए स्टुअर्ट चेज ने लिखा है - " विज्ञान का सम्बन्ध वैज्ञानिक पद्धति से है न कि विषय - सामग्री से । " इसी प्रकार की बात बेनबर्ग और शेबत ने कही है - " विज्ञान संसार की ओर देखने की एक निश्चित पद्धति है । " ? वास्तव में विज्ञान का तात्पर्य उस क्रमबद्ध ज्ञान से है जिसे वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा प्राप्त किया जाता है । अर्थात् व्यवस्थित ज्ञान ही विज्ञान है । वैज्ञानिक पद्धति सभी शाखाओं में केवल एक और वही है सभी विज्ञानों की एकता इसकी पद्धति में है , अकेले इसकी सामग्री में नहीं । वह व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार के तथ्यों को वर्गीकृत करता है , जो इनके पारस्परिक सम्बन्धी को देखता है तथा उनके क्रम का दर्शन करता है , वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करता है और एक विज्ञान का व्यक्ति है । ये तथ्य मानब मात्र के प्रतीत के इतिहास , हमारे महान शहरों की सामाजिक सांख्यिकी , सुदूर तारों के वातावरण से सम्बन्धित हो सकते हैं . ये स्वयं तथ्य नहीं है जो विज्ञान का निर्माण करते हैं बल्कि वह पद्धति है जिसके द्वारा इन पर कार्य किया जाता है ।


    " ' एनसाइक्लोपीडिया विटेनिका ' के अनुसार , " वैज्ञानिक पद्धति एक सामूहिक शब्द है जो उन अनेक प्रक्रियाओं को स्पष्ट करता है जिनकी सहायता से विज्ञान का निर्माण होता है ।



    गुडे एवं हर्ट ने लिखा है - " विज्ञान को प्रचलित रूप से व्यवस्थित ज्ञान से संचय के रूप में परिभाषित किया जा सकता है । " भौतिक शास्त्र भौतिक अंगों का अध्ययन करता है , प्राणिशास्त्र जीवों का अध्ययन करता है और वनस्पति शास्त्र पेड़ - पौधों का अध्ययन करता है । इस प्रकार अन्य विज्ञानों में भी अलग - अलग विषय - सामग्री होते हैं और ये सभी विषय सामग्री एक - दूसरे से भिन्न होते हैं । किन्तु ये सभी विज्ञान कहलाते हैं । अब सवाल उठता है कि वह कौन - सी बात है जो इन सभी को विज्ञान की इकाई के रूप में लाती है ? इसका एक मात्र उत्तर है अध्ययन पद्धति अर्थात् वैज्ञानिक पद्धति ।


    कार्ल पियरसन के अनुसार - " समस्त विज्ञान की एकता उसकी पद्धति में है न कि उसकी विषय - वस्तु में


    लुण्डबर्ग ने भी इसी प्रकार की बात कही है “ समस्त शाखाओं में वैज्ञानिक पद्धति एक ही है । उपर्युक्त विवेचनाओं से स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक पद्धति द्वारा जो अध्ययन किया जाता है उससे प्राप्त ज्ञान को विज्ञान कहते हैं ।


    विजान का अर्थ वैज्ञानिक पद्धति से है , जानने के बाद यह जानना जरूरी है कि किस विधि को बैज्ञानिक पति कहेंगे । साधारणतः उस पद्धति को वैज्ञानिक पद्धति कहा जाता है जिसमें अध्ययनकर्ता तटस्थ या निष्पक्ष रहकर किसी विषय , समस्या या घटना का अध्ययन करता है । इसके अन्तर्गत अवलोकन , तथ्य संकलन . वर्गीकरण सारणीकरण , विश्लेषण तथा सामान्यीकरण आता है ।


    अगस्ट कौम्ट का कहना था कि सम्पूर्ण विश्व का संचालन ' स्थिर प्राकृतिक नियमों द्वारा होता है और इन नियमों की व्याख्या वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ही संभव है । चूँकि सामाजिक घटनाएँ इसी प्रकृति की अंग है इसलिए प्राकृतिक घटनाओं की तरह सामाजिक घटनाओं का भी अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ही सम्भव है । वैज्ञानिक पद्धति भावनात्मक तात्विक चिन्तन पर आश्रित न होकर अवलोकन , परीक्षण , प्रयोग एवं वर्गीकरण की व्यवस्थित कार्य प्रणाली पर आश्रित होती है । विभिन्न विद्वानों ने वैज्ञानिक पद्धति को अपने - अपने शब्दों में परिभाषित किया है ।


    लुण्डबर्ग ने वैज्ञानिक पद्धति के सम्बन्ध में लिखा है - " मोटे तौर पर वैज्ञानिक पद्धति तथ्यों का व्यवस्थित अवलोकन , वर्गीकरण एवं विश्लेषण है ।


    कार्ल पियर्सन ने वैज्ञानिक पद्धति की प्रकृति को बताते हुए लिखा है " वैज्ञानिक पद्धति निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट होती है - ( अ ) तथ्यों का सतर्क एवं यथार्थ वर्गीकरण तथा उनके सह सम्बन्ध एवं अनुक्रम का अवलोकन ( ब ) रचनात्मक कल्पना के द्वारा वैज्ञानिक नियमों की खोज ( स ) आत्म आलोचना तथा सामान्य बुद्धि के सभी व्यक्तियों के लिए समान रूप से उपयोगी । "


    बर्नाड ने वैज्ञानिक पद्धति की परिभाषा देते हुए कहा है , " विज्ञान की परिभाषा उसमें होनेवाली प्रमुख छ : प्रक्रियाओं के रूप में किया जा सकता है - परीक्षण , सत्यापन , परिभाषा , वर्गीकरण , संगठन तथा परिमार्जन जिसमें पूर्वानुमान एवं व्यवहार में लाना सम्मिलित है । " उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक पद्धति एक व्यवस्थित प्रणाली है । इसके अन्तर्गत तथ्यों का संकलन , सत्यापन , वर्गीकरण एवं विश्लेषण किया जाता है । इससे सामान्य नियमों की खोज की जाती है तथा उसके सम्बन्ध में पूर्वानुमान भी किया जाता है ।



    वैज्ञानिक पद्धति की विशेषताएँ

    ( Characteristics of Scientific Method )


    वैज्ञानिक पद्धति की परिभाषाओं के आधार पर इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं । इन विशेषताओं का निम्नलिखित ढंग से समझा जा सकता है


    तार्किकता ( Logicality ) - वैज्ञानिक पद्धति भावना , संवेग अथवा अन्धविश्वास पर आधारित नहीं होती । इसमें तार्किक विचारों पर बल दिया जाता है । वैज्ञानिक पद्धति घटनाओं के काय - कारण सम्बन्धों पर जोर देती हैं । दसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि प्रत्येक घटना का कोई न कोई कारण जरूर होता है और बिना कारण के कोई भी घटना नहीं घटती । वैज्ञानिक पद्धति के अन्तर्गत कार्य - कारण ढूँढने का प्रयास किया जाता है । उदाहरण स्वरूप अन्धविश्वास के तहत किसी बीमारी के पीछे किसी दैवी शक्ति का हाथ न मानकर उसके असली रोगाणओं का खोज करना ही वैज्ञानिक पद्धति की विशेषता है । वास्तव में बीमारी के पीछे रोगाणु विशेष का हाथ होता है । कहने का तात्पर्य यह है कि यहाँ रोगाणु विशेष ही बीमारी का कारण है ।


    सामान्यता ( Generality ) - वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा ऐसे नियमों या तथ्यों को ढूंढने का प्रयास किया जाता है जो कि सदैव समान अवस्थाओं में प्रमाणिक हो सकें । यह पद्धति किसी विशेष घटना अथवा इकाई के अध्ययन पर बल नहीं देता बल्कि सामान्य घटनाओं के अध्ययन पर जोर देता है । अर्थात् वैज्ञानिक पद्धति बिल्कुल विशिष्ट का विज्ञान नहीं हो सकता , यह सामान्य खोज पर बल देता है ताकि विभिन्न तथ्यों के आधार पर सामान्य सिद्धान्त एवं नियमों का प्रतिपादन किया जा सके । यदि किसी विशेष घटना या तथ्य को लेकर किसी सामान्य नियम का प्रतिपादन होता है तो उसका क्षेत्र बहुत ही संकुचित होता है । वैज्ञानिक पद्धति के अन्तर्गत एकत्रित की जाने वाली इकाइयाँ व्यक्ति विशेष का न होकर सम्पूर्ण वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं । इसका मतलब यह नहीं होता कि ये सभी परिस्थितियों एवं अवस्थाओं में बिना शर्त के प्रामाणिक होंगे । ये सामान्य परिस्थिति में ही प्रामाणिक होते हैं । इस अर्थ में एक सामान्य वैज्ञानिक नियम बन सकता है । वैज्ञानिक पद्धति की विशेषता इस अर्थ में भी सामान्य है कि इसका प्रयोग विभिन्न विज्ञानों में एक समान होता है । इस सन्दर्भ में कार्ल पियर्सन ने लिखा भी है " समस्त विज्ञानों की एकता उसकी पद्धति में है न कि विषय - वस्त में । " साधारण तौर पर वैज्ञानिक पद्धति विज्ञान की समस्त शाखाओं में एक समान होती है ।


    . कार्य - कारण सम्बन्धों पर आधारित ( Cause and Effect Relationship ) - वैज्ञानिक पद्धति कार्य - कारण सम्बन्धों पर आधारित होता है । प्रत्येक घटना का कोई कारण होता है । कोई भी धाटना पूर्णतया स्वतन्त्र नहीं होती . उसके घटित होने के पीछे कोई न कोई कारण होता है । वैज्ञानिक पद्धति उन सभी कारणों को ढूँढने का प्रयास करती है जिनके कारण घटनाएँ घटिस होती हैं । अर्थात् विभिन्न घटनाओं के बीच कार्य - कारण सम्बन्धों की व्याख्या करती है । उदाहरण स्वरूप यदि काई व्यकित बीमार है तो वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा उसके बीमार होने के कारण को ढूँढने का प्रयास किया जाता न किसी देवी - देवता का प्रकोप समझा आता है ।


    . अवलोकन ( Observation ) - अवलोकन वैज्ञानिक पद्धति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है । वैज्ञानिक पद्धति के अन्तर्गत तथ्यों के संकलन हेतु अनुसंधानकर्ता प्रत्यक्ष रूप से निरीक्षण करता है । अवलोकन को वैज्ञानिक खोज की शास्त्रीय पद्धति कहा जाता है । वैज्ञानिक पद्धति में अवलोकन के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए गुडे एवं हैट ने कहा है " विज्ञान अवलोकन से प्रारम्भ होता है एवं इसकी पुष्टि के लिए अन्त में अवलोकन पर ही लादना पडता है । इसलिए समाजशास्त्री को सावधानीपूर्वक अवलोकन करने में अपने आप को प्रशिक्षित करना चाहए । अवलोकन में उद्देश्यपूर्ण दृष्टिकोण से घटना का निरीक्षण - परीक्षण करके तथ्य संकलन किया जाता है जो लज्ञा क पद्धति का आधार बनता है । m



    . सत्यापनशीलता ( Verification ) - वैज्ञानिक पद्धति द्वारा प्राप्त निष्कर्ष किसी समय भी सत्यापित किये जा सकते हैं । पूर्व में प्राप्त किया गया सत्य अब कहाँ तक सत्य है . इस बात की जानकारी सत्यापन कबाद होती है । कहने का तात्पर्य यह है कि एक बार जब वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा निष्कर्ष निकाला जाता है , दूसरी बार भी समान निष्कर्ष प्राप्त होता है तो उसे सत्यापित समझा जाता है । अर्थात वैज्ञानिक पद्धति में प्राप्त निष्कर्षों की पुन : परीक्षा की जा सकती है । इस सन्दर्भ में लथर का कहना है कि जिस विधि के द्वारा तथ्यों की पुन : परीक्षा नहीं की जा सकती है वह वैज्ञानिक पद्धति न होकर दार्शनिक अथवा काल्पनिक हो सकती है । अत : वैज्ञानिक पद्धति के लिए सत्यापन अत्यन्त आवश्यक है । वैज्ञानिक पद्धति की विशेषताएँ


    . वस्तुनिष्ठता ( Objectivity ) - वैज्ञानिक पद्धति में वस्तुनिष्ठता का महत्वपूर्ण स्थान है । वस्तुनिष्ठता का अर्थ जो ( Characterstics of Scientific Method ) वस्तु या घटना जैसा है उसे उसी रूप में देखना या जानना | अवलोकन होता है । वैज्ञानिक पद्धति में पक्षपात एवं पूर्वाग्रह का कोईस्थान नहीं होता । अर्थात् व्यक्ति अध्ययन के समय अपनी सत्यापन शीलता व्यक्तिगत इच्छा , पसन्द एवं धारणाओं को महत्व नहीं देता है । ग्रीन के अनुसार ' वस्तुनिष्ठता का तात्पर्य किसी तथ्य 3 . वस्तुनिष्ठता अथवा प्रमाण की निष्पक्षतापूर्वक जाँच करने की इच्छा तथा योग्यता है । ' सामाजिक विज्ञानों में वस्तुनिष्ठता एक कठिन कार्य है । इसलिए अनुसंधानकर्ता को आत्मनियंत्रण केसाथ - साथ ऐसी प्रविधियों का प्रयोग करना चाहिए जिससे कि पक्षपात एवं पूर्वाग्रह की गुंजाइश कम से कम हो । अध्ययनकर्ता को बिल्कुल तटस्थ रहकर अध्ययन करना पड़ता है । उसे किसी प्रकार का नैतिक पक्षपात या मानसिक बेईमानी का सहारा नहीं लेना चाहिए ।


    - निश्चितता वैज्ञानिक पद्धति में निश्चितता होती है । इसके अन्तर्गत निश्चित आधारों पर निश्चित तथ्य ढूंढने का प्रयास किया जाता है । वैज्ञानिक पद्धति में संदेह उत्पन्न करने वाले तत्वों को कोई महत्व नहीं दिया जाता है । वैज्ञानिक अध्ययन में निश्चित पदों का प्रयोग होता है । अनिश्चित पदों के प्रयोग से निश्चित निष्कर्ष प्राप्त होना कठिन है । यदि अध्ययन वस्तुनिष्ठ है और पुन : परीक्षण द्वारा उसका सत्यापन हो सकता है तब उससे प्राप्त निष्कर्ष में निश्चितता अवश्य होगी ।




    भविष्यवाणी करने की क्षमता ( Predictability ) - वैज्ञानिक पद्धति की एक महत्वपूर्ण विशेषता भविष्यवाणी अथवा पूर्वानुमान करने की क्षमता है । कार्य - कारण सम्बन्धों एवं विभिन्न कारकों के अध्ययन के आधार पर किसी वस्तु या घटना की जानकारी होती है । इस जानकारी के आधार पर भविष्य में उस वस्तु अथवा घटना का क्या स्वरूप होगा इस सम्बन्ध में पूर्वानुमान किया जा सकता है । वैज्ञानिक पद्धति के अन्तर्गत किया जानेवाला भविष्यवाणी ज्योतिषी या अन्य भविष्यवाणी से भिन्न होता है । अध्ययनकर्ता जब किसी घटना के कारणों को खोजकर उसके सम्बन्ध में सामान्य नियम एवं सिद्धान्त प्रतिपादित करता है तब जाकर उसके आधार पर वैसी दशाओं में उस प्रकार की घटनाओं के घटित होने के सम्बन्ध में भविष्यवाणी करता है । कहने का तात्पर्य है कि वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर अध्ययन करने से अध्ययनकर्ता में ऐसी क्षमता विकसित होती है जिससे वह समान घटनाओं के बारे में पूर्वानुमान कर सके ।





    वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख चरण

    ( Main Steps in Scientific Method )


    वैज्ञानिक पद्धति एक व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध पद्धति है । इसके अन्तर्गत अनेक प्रक्रियाएँ संलग्न हैं । इन प्रक्रियाओं के क्रमबद्धता के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने अपने - अपने विचार प्रकट किये हैं । इन विद्वानों ने वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख चरणों की चर्चा की है । कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा दिये गये विचार निम्नलिखित हैं

    लुण्डबर्ग के अनुसार वैज्ञानिक पद्धति के चार प्रमुख चरण हैं ( i ) काम चलाऊ उपकल्पना ( the working hypothesis ) , मा तथ्यों का अवलोकन , संकलन एवं अंकन ( the observation and recording of data ) , in संकलित तथ्यों का वर्गीकरण एवं संगठन ( the classification and organisation of data ) ( iv ) सामान्यीकरण ( Generalization ) ।


    पी . बी . यंग ने वैज्ञानिक पद्धति के छ : चरणों की चर्चा की है ( i ) अध्ययन समस्या का चुनाव ( ii ) कार्यकारी उपकल्पना का निर्माण ( iii ) अवलोकन तथा तथ्य संकलन ( iv ) तथ्यों का आलेखन ( v ) तथ्यों का वर्गीकरण ( vi ) वैज्ञानिक सामान्यीकरण ।

    एवालबर्नन ने वैज्ञानिक पद्धति के पाँच स्तरों की चर्चा की है ( 1 ) समस्या का चुनाव तथा उपकल्पना का निर्माता । ( ii ) यथार्थ तथ्यों का संग्रहण ( iii ) वर्गीकरण तथा सारणीकरण । ( iv ) निष्कर्ष निकालना ( v ) निष्कर्षों की परीक्षा एवं सत्यापन ।

    विभिन्न विद्वानों द्वारा दिये गये वैज्ञानिक पद्धति के विभिन्न चरणों के आधार पर कुछ प्रमुख स्तरों का उल्लेख किया जा सकता है । अर्थात् भिन्न - भिन्न विद्वानों ने अपने - अपने दष्टिकोण से वैज्ञानिक पद्धति के चरणों की व्याख्या की है । सभी विद्वानों के विचारों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं


    ( i ) समस्या का चुनाव

    ( ii ) उपकल्पना का निर्माण

    ( iii ) अध्ययन क्षेत्र का निर्धारण

    ( iv ) अध्ययन यन्त्रों का चुनाव Restauी मांग

    ( v ) अवलोकन एवं तथ्य संकलन शाह

    ( vi ) वर्गीकरण एव विश्लेषण गह

    ( vii ) सामान्यीकरण एवं नियमों का प्रतिपादन


    समस्या का चुनाव ( Selection of Problem ) - वैज्ञानिक पद्धति के अन्तर्गत सबसे पहला चरण समस्या का चुनाव होता है । अध्ययनकर्ता सबसे पहले सामयिक महत्त्व , व्यावहारिक उपयोगिता तथा जिज्ञासा के आधार पर विषय का चुनाव करता है । यही विषय वैज्ञानिक खोज का पहला आधार बनता है । समस्या का चुनाव सम्बन्धि त साहित्य एवं सूचनाओं के आधार पर होता है । इसके लिए समस्या से सम्बन्धित जितने लेख , विवरण या विचार , पुस्तकों , संदर्भ ग्रन्थों या पत्र - पत्रिकाओं से मिल सकें उसे एकत्रित किया जाता है । इससे सम्बन्धित व्यक्तियों से भी पूछताछ की जाती है । गुडे एवं हैट ने लिखा है " किसी भी अध्ययन से सम्बन्धित समग्र में बहुत सी घटनाओं का समावेश होता है किन्तु विज्ञान इसमें से कुछ घटनाओं तक ही अपने को सीमित रखता है । " अध्ययनकर्ता . समस्या का चुनाव जागरूकता एवं रुचि के आधार पर करता है ।


    उपकल्पना का निर्माण ( Formulation of Hypothesis ) - समस्या के चुनाव के बाद अध्ययनकर्ता समस्या से सम्बन्धित उपकल्पना का निर्माण करता है । उपकल्पना अध्ययन के पहले कहा गया ऐसा प्राक्कथन है जिसके प्रामाणिकता की जाँच एकत्र की जाने वाली तथ्यों के आधार पर होती है । लुण्डबर्ग ने कहा है " उपकल्पना एक काम चलाऊ सामान्यीकरण है , जिसकी सत्यता की जाँच करना बाकी होता है । " उपकल्पना वैज्ञानिक अध्ययन को दिशा प्रदान करता है । उपकल्पना के निर्माण से समय , शक्ति एवं धन की बचत होती है । इसके आधार पर ही तथ्य संकलित किये जाते हैं और इन्हीं तथ्यों के द्वारा उपकल्पना के प्रामाणिकता की जाँच होती है । उपकल्पना का निर्माण अनुसंधानकर्ता अपने अनुमानों , सूझ , कल्पना तथा अनुभवों के आधार पर करता है । सामान्य संस्कृति , साहित्य , सहृदयता एवं दर्शन भी उपकल्पना के स्रोत बनते हैं ।


    अध्ययन - क्षेत्र का निर्धारण ( Determination of Universe ) - अध्ययन - क्षेत्र से तात्पर्य वैसे क्षेत्र से है जिसे अध्ययन से सम्बन्धित तथ्य संकलित करने के लिए चिन्हित किये जाते हैं । अर्थात् अध्ययनकर्ता स्वयं यह निश्चित करता है कि उसे किस क्षेत्र का अध्ययन करना है । अध्ययन - क्षेत्र निश्चित रहने पर अध्ययनकर्ता । का प्रयास एक सीमा के अन्दर होता है , वह अनावश्यक प्रयासों से बच जाता है । अध्ययन - क्षेत्र यदि बड़ा होता है तब प्रतिनिधि इकाइयों से तथ्य संकलित किये जाते हैं । प्रतिनिधि इकाइयों को चनने के लिए निदर्शन पद्धति का प्रयोग किया जाता है ।


    . अध्ययन यंत्रों एवं विधि का चुनाव ( Selection of Tools & Techniques ) - उपकल्पना एवं अध्ययन क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए यंत्रों एवं प्रविधियों का चुनाव किया जाता है । वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा अध्ययन करने के लिए उपर्यक्त यंत्रों एवं प्रविधियों का चुनाव बहत ही महत्वपूर्ण होता है । विश्वसनाय कर के सकलन के लिए अध्ययनकर्ता विभिन्न पद्धतियों एवं यंत्रों का चनाव करता है । अर्थात् यह निश्चित करता अवलोकन , प्रश्नावली , अनुसूची , वैयक्तिक अध्ययन विधि , साक्षात्कार अथवा अन्य विधियों में से किसके सहारे तथ्य संकलित करेगा । इन यंत्रों एवं प्रविधियों के सम्बन्ध में रूप रेखा तैयार करता है । उदाहरणस्वरूप साक्षात्कार निर्देशिका , प्रश्नावली तथा अनुसूची इत्यादि को तैयार करना ।


    . अवलोकन एवं तथ्य संकलन ( Observation and Data Collection ) — वैज्ञानिक अध्ययन अवलोकन से भी प्रारम्भ होता है । साधारणत : अवलोकन का तात्पर्य देखना होता है । किन्तु वैज्ञानिक पद्धति में अवलोकन का अर्थ होता है किसी भी वस्तु व घटना को उद्देश्यपूर्ण दृष्टिकोण से निरीक्षण परीक्षण करना । अवलोकन में समस्त मानव इन्द्रियों को यथासम्भव प्रयोग में लाया जाता है तत्पश्चात् तथ्य संकलित किये जाते है । तथ्य सकलन में अवलोकन के अतिरिक्त अन्य विधियों जैसे साक्षात्कार , प्रश्नावली , अनुसूची व वैयक्तिक अध्ययन विधि के द्वारा भी तथ्य संकलित किये जाते हैं । उपकल्पना के प्रामाणिकता की जाँच से सम्बन्धित आंकड़े एकत्रित किये जाते हैं । इनके आधार पर कार्य - कारण सम्बन्ध स्थापित किये जाते हैं तथा उपकल्पना के सत्यता की जाँच की जाती है ।


    वर्गीकरण तथा विशेषता ( Classification and Interpretation ) - वैज्ञानिक पद्धति के अन्तर्गत तथ्य संकलन के बाद उन तथ्यों का वर्गीकरण किया जाता है । अर्थात् तथ्यों को उनकी समानता , असमानता एवं अन्य विशेषताओं के आधार पर विभिन्न वर्गों अथवा श्रेणियों में बाँटा जाता है । इस प्रक्रिया से एकत्रित तथ्य सरल , स्पष्ट एवं अर्थपूर्ण बन जाते हैं । जब तथ्यों को विभिन्न वर्गों में बाँट दिया जाता है तत्पश्चात् उनका विश्लेषण किया जाता है । संकलित तथ्यों का पूर्वाग्रह रहित एवं निष्पक्ष भाव से विश्लेषण किया जाता है ताकि कार्य - कारण सम्बन्धों की जानकारी हो ।


    सामान्यीकरण तथा नियमों का प्रतिपादन ( Generalization and formation of Law ) - प्राप्त तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर सामान्यीकरण किया जाता है । अर्थात् सामान्य निष्कर्ष निकाले जाते हैं । इन्हीं निष्कर्षों के आधार पर उपकल्पनाएँ सत्यापित अथवा असिद्ध होती हैं । यहाँ ध्यान देना आवश्यक है कि इन दोनों ही स्थितियों ( सत्यापित अथवा असिद्ध ) में निष्कर्ष वैज्ञानिक होता है । उपकल्पनाएँ सत्यापित नहीं होने पर अध्ययन का वैज्ञानिक महत्त्व कम नहीं होता । तथ्यों के वर्गीकरण , विश्लेषण एवं सामान्यीकरण के द्वारा जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं वे ही सामान्य नियमों एवं सिद्धान्तों के आधार बनते हैं । अर्थात् निष्कर्षों के आधार पर ही नियमों एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन होता है । वैज्ञानिक पद्धति के विभिन्न चरणों में अन्त : सम्बन्ध होता है । अत : विभिन्न चरणों से गुजरने के बाद ही वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति होती है । इस सन्दर्भ में कार्ल पियर्सन ने कहा है " सत्य के लिए कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है विश्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक पद्धति से गुजरने के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं है ।






  • SOCIAL PHENOMENON21:12



    सामाजिक घटनाओं की विशेषताएँ ।

    ( Characteristics of the Nature of Social Phenomena )


    सामाजिक घटना की प्रकृति की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं


    पक्षपात ( Prejudices ) - भौतिक विद्वानों में पक्षपात का अभाव पाया जाता है , क्योंकि मनुष्य निर्जीव वस्तुओं का अध्ययन करता है । दूसरे शब्दों में , वह उन वस्तुओं का अध्ययन करता है , जिसका वह सदस्य नहीं होता है । सामाजिक वैज्ञानिक तटस्थ रहकर सामाजिक घटना का अध्ययन नहीं कर सकता है । इसका कारण यह है कि वह जिसका अध्ययन करता है , उस समूह और समुदाय का स्वयं सदस्य होता है और उसके सम्बन्ध में उसकी व्यक्तिगत रुचि और दृष्टिकोण होता है । एक समाजशास्त्री परिवार , समुदाय और संस्थाओं का अध्ययन इनसे अलग रहकर नहीं कर सकता है । इसका परिणाम यह होता है कि वह अध्ययन - वस्तु से अपने को स्वतन्त्र नहीं रख पाता


    नियन्त्रित परीक्षण का अभाव ( Lack of controlled experiment ) सामाजिक घटना की प्रकृति की यह भी विशेषता होती है कि उसका नियन्त्रित परीक्षण नहीं किया जा सकता है । एक रसायनशास्त्री प्रयोगशाला में 100 ग्राम चीनी आधा किलो पानी में घुलने के लिए कितने डिग्री ताप की आवश्यकता होगी , बता सकता है , किन्तु कोई भी समाशास्त्री यह नहीं बता सकता कि कितने प्रतिशत परिवार का वातावरण दूषित हो जाने पर बालक अपराधी होगा ।


    भविष्यवाणी का अभाव ( Lack of prediction ) - भौतिक वैज्ञानिक अपन अध्ययनों के आधार पर भविष्यवाणी कर सकता है । उदाहरण के लिए . अगर पाना का आँच पर रखा जाये तो यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि यह कितने मिनटान उबल कर भाप बन जायेगा । मोम को आग में डाल दिया जाय तो यह भविष्यवाणा का जा सकती है कि वह पिघल जायेगा , किन्तु इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकता । कि अपने पड़ौसी को गाली देने का परिणाम क्या होगा ? इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सामाजिक घटनाओं की माप नहीं की जा सकता उसका प्रयोग नहीं किया जा सकता है । नाओं की माप नहीं की जा सकती है ,


    सामाजिक घटना की जटिलता ( Complexity of social phenomlena ) सामाजिक घटना की प्रकृति की महत्वपूर्ण विशेषता इसकी जटिलता है । समाज सामानिक सम्बन्धों का जाल है । समाज निरन्तर परिवर्तनशील है । सामाजिक घटनाएँ एक स्थान से दूसरे स्थान में भिन्न होती हैं । समाज में अन्तःक्रियाएँ होती रहती हैं । इसके कारण भी समाज गतिशील रहता है । समाज का एक - एक भाग स्वयं में अत्यन्त जटिल है । उदाहरण के लिए , भारत में परिवार का जो रूप है वह अमेरिका , जापान और इंग्लैण्ड में नहीं है । उत्तरी भारत में विवाह की जो प्रथाएँ हैं , वे दक्षिणी भारत में नहीं हैं । इसका परिणाम यह है कि इन विविध सामाजिक घटनाओं के बीच कार्य - कारण का सम्बन्ध स्थापित करने में असुविधा होती है ।


    सार्वभौमिकता का अभाव ( Lack of universality ) - समाज की प्रकृति सिर्फ जटिल ही नहीं है अपितु इसमें सार्वभौमिकता का गुण भर नहीं है । संस्कृति , व्यवहार , रीति - रिवाज और रहन - सहन के तरीके एक स्थान से दूसरे स्थान में भिन्न हैं । बोली के बारे में ऐसा कहा जाता है कि यह दस मील पर परिवर्तित हो जाती है । यही बात समाज पर भी लागू होती है । इन भिन्नताओं के कारण मानव में सार्वभौमिकता के गुण का अभाव पाया जाता है । सार्वभौमिकता के गुण के अभाव में समाजशास्त्र के नियम या सिद्धान्त सार्वभौमिक नहीं हो पाते हैं । इस प्रकार समाजशास्त्र में सार्वभौमिकता के गुण के अभाव में वैज्ञानिक तटस्थता नहीं पाई जाती है ।


    विषयकता का अभाव ( Lack of objectivity ) - सामाजिक घटना की तीसरी विशेषता यह है कि इन्हें प्रतीकात्मक रूप से ही जाना जा सकता है । मूर्तरूप से इनका ज्ञान प्राप्त नहीं किया जाता है । इसका कारण यह है कि सामाजिक सम्बन्ध अमूर्त होते हैं । उन्हें न तो देखा जा सकता है और न ही छुआ जा सकता है । उनका तो मात्र अनुभव किया जा सकता है ; जैसे - सामाजिक प्रक्रियाएँ , प्रथाएँ , परम्पराएँ आदि । ये मानच समाज की अन्तरंग विशेषताएँ हैं । इस कारण से समाजशास्त्र में तटस्थता का अभाव पाया जाता है ।


    गुणात्मक प्रकृति ( Qualitative nature ) - सामाजिक घटना की प्रकृति की चौथी विशेषता यह है कि उसकी भाप गुण के आधार पर की जा सकती है , मात्रा ( Quantity ) के आधार पर नहीं । पति - पत्नी के सम्बन्ध , अध्यापक और विद्यार्थियों के सम्बन्ध , परिवार में सहयोग , इन्हें मात्रा के आधार पर नहीं मापा जा सकता है । पति और पत्नी के सम्बन्ध को नापकर ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि 75 प्रतिशत सम्बन्ध अच्छे हैं । इसी प्रकार किसी भी सामाजिक घटना की माप मात्रा के आधार पर नहीं कीजा सकती है , जैसा कि भौतिक विज्ञान कहते हैं । इससे भी समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग की कठिनाई होती है ।


    गतिशील प्रकृति ( Dynamic nature ) - समाज निरन्तर परिवर्तनशील है । आज जो समाज है , वह कल नहीं था और आज जो है , वह कल नहीं रहेगा । मनुष्य सूचना क्राँति के युग में है पर उसने अपनी यात्रा शिकारी अवस्था से आरम्भ की थी । इसका अर्थ यह हुआ कि समाजशास्त्र में जिस समाज का अध्ययन किया जाता है , वह निरन्तर परिवर्तनशील है , गतिशील है । इस गतिशीलता के कारण समाजशाम के नियम भी परिवर्तित हो जाते हैं । इनमें स्थिरता और एकरूपता का अभाव पाया जाता है ।







    सामाजिक शोध में कठिनाइयाँ

    ( Difficulties in Social Research )




    अब तक की विवेचना से स्पष्ट है कि ' सामाजिक घटना ' समाज वैज्ञानिक के लिए सबसे बड़ी समस्या है । इससे शोध के लिए वैज्ञानिक भावना के होते हुए भी अध्ययन में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । सामाजिक घटनाओं की इस प्रकति के कारण अनुसंधानकर्ता के सामने जो व्यावहारिक कठिनाइयाँ आती हैं , वे इस प्रकार है नियन्त्रित प्रयोग की समस्या सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में दो मौलिक समस्यायें आती हैं इन पर किसी भी प्रकार का नियन्त्रण नहीं किया जा सकता , और


    इनका प्रयोग नहीं किया जा सकता है । नियन्त्रण और प्रयोग विज्ञान की मौलिक विशेषताएँ हैं । चूँकि सामाजिक घटनाएँ अमूर्त और जटिल प्रकृति की हैं , इसलिए इनका वैज्ञानिक अध्ययन करना प्रायः असम्भव है ।


    माप असम्भव - माप वैज्ञानिक पद्धति की मौलिक विशेषता है । माप के , माध्यम से तथ्यों को सही संख्या और परिणामों में प्रस्तुत किया जाता है , किन्तु समाज की घटनाओं की न तो माप की जा सकती है और न ही इन्हें संख्याओं के आधार पर - प्रस्तुत ही किया जा सकता है ।


    पूर्वानुमान असम्भव - वैज्ञानिक यह बता सकता है कि किस महीने की कौन सी तारीख को मौनसून उत्तर भारत में प्रवेश करेगा । वह यह भी बता सकता है कि मानसून में उस वर्ष कितना पानी गिरेगा । किन्तु समाजशास्त्री यह नहीं बता सकता कि मानव व्यवहार में किस प्रकार का परिवर्तन कब आने वाला है । सामाजिक घटनाओं के बारे में पूर्व - अनुमान नहीं लगाया जा सकता है ।




    वैषयिकता का अभाव - सामाजिक घटनाएं अन्तर्मुखी होती हैं । इन सामाजिक घटनाओं के पीछे व्यक्ति के लगाव और विचार होते हैं । इनका परिणाम यह होता है कि शोध तटस्थ और पक्षपातरहित नहीं हो पाता है । सामाजिक घटनाओं के अध्ययन में उसके विचार और भावनाएँ मिलकर उसे घटा - बढ़ा देते हैं । इसका परिणाम यह होता है कि अध्ययन से जो परिणाम निकलते हैं , उनमें वैषयिकता का अभाव पाया जाता है ।



    सामाजिक घटना और सामाजिक कानून

    ( Social Phenomena and Social Laws )


    उपर्युक्त विवेचना से ऐसा स्पष्ट होता है कि सामाजिक घटना की प्रकृति की जटिलता और अमूर्तता के कारण वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया जा सकता है । आज का युग विज्ञान का युग है । प्रत्येक तथ्य और घटना को हम तभी स्वीकार करते हैं , जबकि वह विज्ञान के माध्यम से प्राप्त की गई हो । जीवन के हर क्षेत्र में वैज्ञानिक भावना को स्वीकार किया जाता है । सामाजिक शोध के द्वारा सामाजिक जीवन सामाजिक समस्याओं और सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करने का प्रयास करते हैं । सामाजिक घटनाओं की प्रकृति के कारण सामाजिक शोध में वैषयिकता और वैज्ञानिकता नहीं आ पाती है । सामाजिक शोध में कठिनाइयों के कारण जो मौलिक समस्या पैदा होती है वह है ' सामाजिक घटनाओं का सामान्यीकरण ' ( Generalization of social phenomena ) | सामान्यीकरण का अर्थ है ' सामाजिक कानूनों ' ( Social Laws ) का निर्माण करना । सामाजिक कानून या सामाजिक नियम समाज के आधार - स्तम्भ होते हैं , इन्हीं कानूनों के आधार पर समाज के सम्बन्ध में निश्चित जानकारी प्राप्त की जा सकती है । उदाहरण के लिए , परिवार से सम्बन्धित नियम ‘ पारिवारिक विघटन , तलाक , आत्महत्या और अपराध का कारण है । इसी प्रकार सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करके समाज से सम्बन्धित नियमों का निर्माण किया जा सकता है । सामाजिक कानूनों का निर्माण तब होगा , जब समाज की घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए समाजशास्त्र में विभिन्न प्रकार की पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है । ये पद्धतियाँ समाज की व्याख्या करती हैं और समाज के सम्बन्ध में नियमों का निर्माण करती हैं ।



















    समाजशास्त्रीय अनुसन्धान में वस्तुनिष्ठता की समस्या

    ( Problem of Objectivity in Sociological Enquiry )


    सामाजिक शोध का मौलिक उद्देश्य किसी सामाजिक घटना का वैज्ञानिक अध्ययन करना है । वैज्ञानिक अध्ययन का कार्य यथार्थता को सामने लाना है । इसके लिए सामाजिक अध्ययन में वस्तुनिष्ठता ( Objectivity ) लाने की आवश्यकता पड़ती है । " वास्तव में जैसा है " उसी रूप में एक घटना विशेष का अध्ययन करना वस्तुनिष्ठ अध्ययन ( Objective study ) कहलाता है । घटनाएं , जिनका अध्ययन वैज्ञानिक करते हैं , मूल रूप में दो श्रेणियों में विभाजित की जाती हैं - प्राकृतिक घटना ( Natural phenomena ) तथा सामाजिक घटना ( Social phenomena ) । एक शोधकर्ता जब प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन करता है तो उसे वस्तुनिष्ठता कायम रखने में किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होती है । परन्तु सामाजिक घटनाओं के मामले में यह बात लागू नहीं होती हैं । उदाहरणार्थ , विद्यार्थियों में पाई जाने वाली अनुशासनहीनता की घटना को एक व्यक्ति जिस रूप में देखता है , यह जरूरी नहीं कि दूसरा व्यक्ति भी उसे उसी रूप में देखे । इसलिए सामाजिक घटना का वास्तविक अध्ययन करना बहुत ही कठिन कार्य है । लुण्डबर्ग ने लिखा है कि , “ अभिनति तथा पक्षपात सभी विज्ञानों में जटिलता उत्पन्न करने वाले तत्व हैं , परन्तु उनका महत्त्व समाज विज्ञानों की अपेक्षा भौतिक विज्ञानों में कम है । "


    प्रत्येक व्यक्ति के अपने विचार और दृष्टिकोण होते हैं , उसके अपने संस्कार और प्रतीक होते हैं । ये विचार और संस्कार व्यक्ति की मानसिक स्थिति को विकत कर देते है । इसका कारण यह है कि घटनाओं के सम्बन्ध में व्यक्तियों के अलग - अलग विचार और संस्कार हैं । जो घटना एक व्यक्ति के लिए अच्छी लगती हैं , वह दसरों के लिए बहत ही दुखदायी प्रतीत होती है । ऐसी स्थिति में यह अत्यन्त ही कठिन कार्य हो जाता है कि घटना के बारे में निष्कर्ष किस प्रकार निकाले जायें । साथ ही , घटनाएँ जटिल भी होती हैं । इन घटनाओं की जटिल प्रकृति के कारण और शोधकर्ता के स्वार्थ के कारण शोध में अभिनति की सम्भावना बढ़ जाती है । इस प्रकार जब शोधकर्ता अभिनति से दूर रहकर तटस्थता के साथ सामाजिक घटना का अध्ययन करता है , तो इसे ही वस्तुनिष्ठता के नाम से पुकारा जाता है ।



    -सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करने के लिए शोधकर्ता सामाजिक घटनाओं और तथ्यों से सम्बन्धित सामग्री का संकलन करता है । यह संकलित सामग्री दो प्रकार की होती है सामाजिक तथ्यों से सम्बन्धित वह सामग्री जिसे शोधकर्ता ने अपने दृष्टिकोण से संकलित की है और उसकी व्याख्या अपने ढंग से की है ।

    -

    - सामाजिक तथ्यों से सम्बन्धित वह सामग्नी जिसे शोधकर्ता ने उसी रूप में देखा है , जिस रूप में वे वास्तव में होती हैं । ऐसा करते समय बह पहली संकलित सामग्री के अलग रखता है । - शोधकर्ता द्वारा किया गया इस प्रकार की अध्ययन वास्तविक अध्ययन कहलाता है । वास्तविक अध्ययन को ही सामाजिक शोध की भाषा में वस्तुनिष्ठता की संज्ञा दी जाती है वस्तुनिष्ठता की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं


    ग्रीन - " वस्तुनिष्ठता प्रमाण का निष्पक्षता से निरीक्षण करने की इच्छा एवं योग्यता है । " न कार - " सत्य की वस्तुनिष्ठता से अभिप्राय यह है कि दृष्टि विषयक संसार किसी व्यक्ति के विश्वासों , आशाओं या भय से स्वतन्त्र एक वास्तविकता है , जिसे हम सहज ज्ञान एवं कल्पना से नहीं , बल्कि वास्तविक अवलोकन के द्वारा प्राप्त करते हैं । "


    फेयरचाइल्ड - " वस्तुनिष्ठता का अर्थ है वह योग्यता जिसमें एक शोधकर्ता स्वयं को उन परिस्थितियों से अलग रख सके , जिसमें वह सम्मिलित है और रोग - द्वेष एवं उद्वेग के स्थान पर अपक्षपात और पूर्वधारणाविहीन प्रमाणों या . उधार पर तथ्यों को उन्हीं की स्वाभाविक प्रष्ठभूमि में देख सकें । "


    इस प्रकार ' वस्तुनिष्ठता को शोध करने वाले व्यक्ति की उस भावना और क्षमत के रूप में परिभाषित किया जा सकता है , जिसके द्वारा वह घटनाओं को उसी रूप देखता है , जैसा कि वे वास्तव में होती हैं ।









    वस्तुनिष्ठता की विशेषताएँ

    ( Characteristics of Objectivity )


    उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर वस्तुनिष्ठता में निम्नलिखित विशेषताएं पाई

    - वस्तनिष्ठता सामाजिक शोध में प्रयुक्त सामग्री संग्रहण का साधन नहीं है अपितु यह स्वयं में एक साध्य है ।

    - वस्तुनिष्ठता कोई भौतिक वस्तु न होकर इसका स्वरूप अमूर्त होता है ।

    - वस्तुनिष्ठता का सम्बन्ध व्यक्ति के विचारों , भावनाओं , मनोवृत्तियों , क्षमताओं और योग्यताओं से है ।

    - वस्तनिष्ठता वह शक्ति है , जिसकी सहायता से व्यक्ति घटनाओं को उनके वास्तविक स्वरूप में दिखाने का प्रयास करता है ।

    - अन्त में वस्तुनिष्ठता वैज्ञानिक भावना का मख्य तत्व है ।








    वस्तुनिष्ठता की आवश्यकता व महत्व

    ( Importance and Need of Objectivity )


    वस्तुनिष्ठता सामाजिक शोध का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है । इसके बिना सामाजिक शोध को विज्ञान सम्मत नहीं कहा जा सकता । निम्नलिखित कारण सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता के महत्व को प्रकट करते हैं


    वैज्ञानिक पद्धति का सफल प्रयोग ( Successful use of scientific method ) - सामाजिक शोध में वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है । इन पद्धतियों के प्रयोग की तभी उपयोगिता है , जबकि वस्तुनिष्टता को इसमें स्थान दिया जाय । यदि वस्तुनिष्ठता को सामाजिक शोध में स्थान प्रदान नहीं किया जाता है , तो चाहे हम कितनी ही अच्छी वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग क्यों न करें , उसकी सहायता से जो निष्कर्ष निकाले जायेंगे वे न तो सत्य होंगे और न ही उनका सत्यापन ही किया जा सकेगा । सामाजिक शोध में वैज्ञानिक विधियों का सफल प्रयोग किया जाय , इसके लिए यह आवश्यक है कि इसमें वस्तुनिष्ठता को स्थान प्रदान किया जाए ।


    नए अनुसंधानों के लिए ( For new investigations ) - व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन ही नवीन ज्ञान से भरा पड़ा है । जीवन के बारे में जितना ज्ञान प्राप्त किया गया है , वह पर्याप्त नहीं है । जीवन के बारे में प्राप्त ज्ञान का आधार सत्यता और उसकी जाँच है । यदि सामाजिक शोध में वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग करते हुए , उसका वास्तविक अध्ययन किया जाता है , तो उससे नवीन ज्ञान की प्राप्ति तो होती है , इसके साथ ही साथ ऐसी परिकल्पना ( Hypothesis ) भी निर्मित हो जाती है , जो सामाजिक शोध के लिए आधार प्रस्तुत करती है । इसलिए नये अनुसंधानों की सम्भावनाओं का विकास करने की दृष्टि से सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता का अत्यन्त ही महत्त्व है ।



    वास्तविक अध्ययन ( Real study ) - अध्ययनकर्ता द्वारा सामाजिक शोध को वास्तविकता की ओर ले जाने के लिए यह आवश्यक है कि इसे वस्तुनिष्ठ बनाया जाय । एक ही वस्तु या घटना का अध्ययन जब भिन्न - भिन्न व्यक्तियों द्वारा किया जाय , तो इस अध्ययन को वस्तुपरक या वास्तविक अध्ययन कहा जाता है । जब एक ही घटना के अलग - अलग निष्कर्ष निकाले जाते हैं , तो इसका तात्पर्य यह होता है कि अध्ययन में वास्तविकता की उपेक्षा की गई है । इसलिए सामाजिक शोध में घटनाओं और तथ्यों में वास्तविकता लाने के लिए दुनिष्ठता अनिवार्य है ।


    मालिक तथ्यों की प्राप्ति ( To get original facts ) - सामाजिक शोध म मालिक तथ्या की प्राप्ति के लिए भी वस्तुनिष्ठता की आवश्यकता है । सामाजिक शाधा 29 का उद्देश्य ही यही है कि सामाजिक जीवन और घटनाओं में निहित मल तथ्यों को प्राप्त किया जाय , किन्तु उन मूल तथ्यों को प्राप्त करना बहत ही कठिन कार्य है , क्योंकि इसमें व्यक्ति अपनी ओर से थोड़ा - बहत जोड - घटाकर उसे अपने अनरूप लाने का कोशिश करता है । इसलिए वह जो अध्ययन करता है और जिन तथ्यों को प्राप्त करता । उन्हें सार्वभौमिक सत्य नहीं माना जा सकता है । अध्ययन के द्वारा प्राप्त तथ्यों को सार्वभौमिक सत्य माना जाय , इसलिए आवश्यक है कि सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता को स्थान दिया जाय । सामाजिक शोध को वास्तविक बनाने और इनके द्वारा प्राप्त तथ्यों को सार्वभौमिक सत्य में परिणित करने की दृष्टि से वस्तुनिष्ठता का अत्यधिक महत्व है ।

    पक्षपातरहित निष्कर्ष ( Unprejudiced conclusions ) - सामाजिक शोधों को सम्पादित करने का एकमात्र उद्देश्य यह है कि जो निष्कर्ष निकाले जायें , वे पक्षपातरहित हों । अर्थात् इसमें शोधकर्ता के व्यक्तिगत विचार और उसके अपने दृष्टिकोण न हों । सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करते समय व्यक्ति के लिए पक्षपात से पूरी तरह से अलग रहना बहुत ही कठिन है । ऐसा सम्भव नहीं है , जबकि वह जो भी अध्ययन करे , उसी में वस्तुनिष्ठता हो । चूँकि शोधकर्ता में पक्षपात की काफी सम्भावनाएँ रहती हैं । इसलिए सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता की और भी अधिक आवश्यकता है ।


    सत्यापन के लिए आवश्यक ( Essential for verification ) - विज्ञान का मौलिक विशेषता यह है कि उसकी सहायता से जो निष्कर्ष निकाले जायें , वे सत्य तो हों ही , इसके साथ ही उनकी कभी भी परीक्षा और पुनःपरीक्षा की जा सके । जब शोधकर्ता अपने विचारों और भावनाओं को अध्ययन की विषय वस्तु के साथ जोड़ देता है , तो सत्यापन सम्भव नहीं है । अर्थात् जो निष्कर्ष निकाल जायेंगे , वे परीक्षा और पुनःपरीक्षा की कसौटी पर खरे नहीं उतरेंगे । इसलिए सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता का महत्व है ।









    वस्तनिष्ठता की प्राप्ति में कठिनाइयाँ

    ( Difficulties in achieving Objectivity )


    _ _ _ सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता आवश्यक है । वस्तुनिष्ठता के अभाव में सामाजिक शोध को वैज्ञानिकता की ओर ले जाना असम्भव है । वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति कैसे की जाय ? अनेक ऐसी व्यावहारिक कठिनाइयाँ आती हैं , जो वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति के मार्ग में बाधा उपस्थित करती हैं । यहाँ सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति में जो व्यावहारिक कठिनाइयाँ आती हैं , वे इस प्रकार हैं



    शोधकर्ता के निजी स्वार्थ ( Vested interest of researcher ) - शोधकर्ता के निजी स्वार्थ भी सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करते हैं । सामाजिक शोध के द्वारा व्यक्ति जो निष्कर्ष निकालता है , उसमें ऐसा प्रयास करता है करता ही उसके स्वार्थो को आघात न पहुंचे । जो निष्कर्ष उसके स्वार्थों के विपरीत होते न्हें स्वीकार नहीं करता है । साथ ही ऐसे तथ्यों को प्राप्त करने का प्रयास जोकि उस व्यक्ति के हितों और स्वार्थों के अनुकूल होते हैं । ऐसी स्थिति में वस्तनिष्ठता को रख सकना , उस व्यक्ति के लिए असम्भव होता है ।


    विरोधी पक्षपातों की सम्भावना ( Possibility of counter - prejudices ) - यदि भकर्ता सामाजिक शोध में पक्षपात से बचने का प्रयास करता है , तो उसे बाध्य होकर उनका विरोध या उनकी आलोचना करनी पड़ती है । इन दो सीमाओं में व्यक्ति यदि किसी का भी चुनाव करता है , तो उसका अध्ययन वैज्ञानिक नहीं हो पाता है । यदि वह पक्षपात न करना चाहे , तो इतना सतर्क रहता है और इतनी तीव्र द्रष्टि रखता है कि आलोचना करना उस व्यक्ति के लिए अनिवार्य हो जाता है । ऐसी स्थिति में वस्तुनिष्ठता का प्रश्न ही नहीं उठता है ।


    शीघ्र निर्णय ( Immediate decision ) - सामाजिक शोध का सम्पादन वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा होता है । इसलिए इसमें समय और साहस की आवश्यकता होती है । शोधकर्ता को अत्यन्त ही धैर्य के साथ निष्कर्षों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है । सामाजिक जीवन से सम्बन्धित सभी शोध ज्ञान की प्राप्ति के लिए ही नहीं किये जाते हैं । कुछ क , उद्देश्य तो किसी विशिष्ट समस्या का समाधान करना होता है । ऐसे शोधों का निपटारा शीघ्र करना पड़ता है । निष्कर्षों की शीघ्रता के कारण भी सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता नहीं आ पाती है ।


    बाह्य हितों द्वारा बाधा ( Difficulties due to external interests ) - शोधकर्ता के निजी स्वार्थ ही वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति में बाधा उपस्थित नहीं करते हैं , अपितु बाह्य कारण और परिस्थितियाँ भी बाधा उपस्थित करती हैं । जब शोधकर्ता अपने ही समूह का अध्ययन कर रहा होता है , तो अनेक बातों के बारे में संक्षिप्त जानकारी देकर वस्तुस्थिति को टालने का प्रयास करता है ; जैसे - विवाह के पूर्व लिंग सम्बन्धों की स्थापना , विवाह से पूर्व मातृत्व आदि । इस प्रकार बाह्य हित भी सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता के मार्ग में बाधा उपस्थित करते हैं ।


    सामाजिक घटना की प्रकृति ( Nature of social phenomena ) - अन्त में , सामाजिक घटना की प्रकृति वस्तुपरक अध्ययन के मार्ग में बाधा उपस्थित करती है । सामाजिक घटनाओं की प्रकृति गुणात्मक होती है । उसमें सामाजिक मूल्य , आदर्श , धर्म , नैतिकता आदि तत्व जुड़े रहते हैं । शोधकर्ता इन तत्त्वों के बारे में वस्तुपरक मत प्राप्त नहीं करता है । इस प्रकार वस्तुनिष्ठता के मार्ग में बाधा उपस्थित होती है ।


    विशिष्ट मूलक भ्रान्ति - डब्लू . आई . थामस के अनुसार , सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति में एक कठिनाई विशिष्ट मूलक भ्रान्ति भी है । विशिष्ट मूलक भ्रान्ति के कारण शोधकर्ता सामाजिक घटना के किसी एक कारण को आवश्यकता सा


    अधिक महत्त्व देता है तथा घटना के किसी एक पक्ष को सबसे महत्वपूर्ण मानकर अपर्याप्त तथा असम्बद्ध तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकाल लेता है , जिससे वस्तनिष्ठता प्राप्ति में कठिनाई आती है । _ _ _


    असत्य प्रतिमाएँ ( False idols ) - फ्रांसिस बेकन ने विशिष्ट वाक्यांश के द्वारा शोधकर्ता द्वारा किसी शोध में की जाने वाली गलतियों को बतलाया है । फ्रांसिस बेकन के अनुसार , " ये प्रतिमाएँ अनेक प्रकार की होती हैं ; जैसे - गुफा की प्रतिमा ( Idols of Cave ) अर्थात् वे गलतियाँ , जिन्हें शोधकर्ता अपने संकीर्ण तथा असम्बद्ध विचारों के फलस्वरूप एक घटना या व्यक्ति के सम्बन्ध में कर बैठता है , ये विचार उसके अपने विचार होते हैं अथवा ऐसे होते हैं , जिनके विषय में कोई दूसरा नहीं जानता है । न्यायालय या वादपीठ की प्रतिमाएँ ( Idols of Forum ) अर्थात् शोधकर्ता केवल शब्दों पर अनावश्यक भरोसा करने की गलती कर बैठता है । बाजार की प्रतिमाएँ ( Idols of the Market place ) अर्थात् प्रथा , परम्परा , रूढ़ि इत्यादि पर अनावश्यक बल देने और उसी के आधार पर निष्कर्षों को निकालने की गलती । जनजाति की प्रतिमाएँ ( The Idols of the Tribe ) अर्थात् शोधकर्ता किसी वस्तु या घटना को अपने ही ढंग से देखने या विचारने की गलती करता है । अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण या जीवन के सम्बन्ध में अपने सीमित ज्ञान के बाहर निकलकर कुछ निष्कर्ष निकालना अक्सर शोधकर्ता के लिए कठिन होता है । इस असत्य प्रतिमाओं के कारण वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति में मुश्किल होती है ।




    अभिनति के विभिन्न स्रोत ( Various sources of bias ) - अभिनति की एक कृत्रिम स्थिति बनावटी स्थिति है । इसके कारण सामाजिक शोधकर्ता अध्ययन विषय की घटना को उसके वास्तविक रूप ( Real Form ) में न देखकर पहले से ही निर्धारित उसके काल्पनिक रूप में देखता है । अभिनति वे स्थितियाँ और कारक हैं , जिनके द्वारा घटनाओं को उनके वास्तविक रूप में देखने में बाधा उपस्थित होती है । ' जब किसी घटना को उसके वास्तविक स्वरूप में प्रस्तुत न करके बाह्य प्रभावों से उसे रंग कर प्रस्तुत किया जाता है , तो ऐसा करने की क्रिया को ही अभिनति के नाम से जाना जाता है । इसलिए सामाजिक शोध में अभिनति के समावेश के कारण वस्तुनिष्ठता नहीं आ पाती है । परिणामस्वरूप अध्ययन में वैज्ञानिकता का अभाव पाया जाता है और जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं , उनमें सत्यापन की कमी पाई जाती है । इस प्रकार अभिनति सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है । अभिनति अनेक स्रोतों से आकर शोध में बाधा उपस्थित करती है । अभिनति के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं


    शोधकर्ता की अभिनति ( Bias of researcher ) - सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति में जो महत्त्वपूर्ण अभिनति बाधा उपस्थित करती है , उसमें शोधकर्ता की स्वयं की अपनी अभिनति महत्त्वपूर्ण है इसका मौलिक कारण यह है कि अध्ययनकर्ता अपने को अध्ययन से अलग रखने में असमर्थ होता है । पी . वी . यंग का विचार है कि सामाजिक घटनाओं का शुद्ध अवलोकन सम्भव नहीं है , इसका कारण यह है कि शोधकर्ता की ज्ञानेन्द्रियाँ धोखा खा जाती हैं । शोधकर्ता के अपने संस्कार , विचार , पर्यावरण , संस्कृति , उसकी सामाजिक विरासत , दृष्टिकोण , मनोवृत्तियाँ और राग - द्वेष होते हैं , जो वस्तुनिष्ठता के प्राप्ति के मार्ग में बाधा उपस्थित करते हैं ।

    सूचनाओं की अभिनति ( Bias of informants ) - वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति में जो दूसरी अभिनति महत्वपूर्ण होती है , उसका सम्बन्ध सूचनादाताओं से है । सामाजिक शोधों की सत्यता सूचनादाताओं के उत्तर पर ही आधारित होती है । यदि उत्तर है , उन्हें सार्वभौमिक सत्य नहीं माना जा सकता है । अध्ययन के द्वारा प्राप्त तथ्यों को सार्वभौमिक सत्य माना जाय , इसलिए आवश्यक है कि सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता को स्थान दिया जाय । सामाजिक शोध को वास्तविक बनाने और इनके द्वारा प्राप्त तथ्यों को सार्वभौमिक सत्य में परिणित करने की दृष्टि से वस्तुनिष्ठता का अत्यधिक महत्व है । (


    पक्षपातरहित निष्कर्ष ( Unprejudiced conclusions ) - सामाजिक शोधों को सम्पादित करने का एकमात्र उद्देश्य यह है कि जो निष्कर्ष निकाले जायें , वे पक्षपातरहित हों । अर्थात् इसमें शोधकर्ता के व्यक्तिगत विचार और उसके अपने दृष्टिकोण न हों । सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करते समय व्यक्ति के लिए पक्षपात से पूरी तरह से अलग रहना बहुत ही कठिन है । ऐसा सम्भव नहीं है , जबकि वह जो भी अध्ययन करे , उसी में वस्तुनिष्ठता हो । चूँकि शोधकर्ता में पक्षपात की काफी सम्भावनाएँ रहती हैं । इसलिए सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता की और भी अधिक आवश्यकता है ।


    सत्यापन के लिए आवश्यक ( Essential for verification ) - विज्ञान का मौलिक विशेषता यह है कि उसकी सहायता से जो निष्कर्ष निकाले जायें , वे सत्य तो हों ही , इसके साथ ही उनकी कभी भी परीक्षा और पुनःपरीक्षा की जा सके । जब शोधकर्ता अपने विचारों और भावनाओं को अध्ययन की विषय वस्तु के साथ जोड़ देता है , तो सत्यापन सम्भव नहीं है । अर्थात् जो निष्कर्ष निकाल जायेंगे , वे परीक्षा और पुनःपरीक्षा की कसौटी पर खरे नहीं उतरेंगे । इसलिए सामाजिक शोध में वस्तुनिष्ठता का महत्व है ।


    वैज्ञानिक पद्धति का सफल प्रयोग ( Successful use of scientific method ) - सामाजिक शोध में वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है । इन पद्धतियों के प्रयोग की तभी उपयोगिता है , जबकि वस्तुनिष्टता को इसमें स्थान दिया जाय । यदि वस्तुनिष्ठता को सामाजिक शोध में स्थान प्रदान नहीं किया जाता है , तो चाहे हम कितनी ही अच्छी वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग क्यों न करें , उसकी सहायता से जो निष्कर्ष निकाले जायेंगे वे न तो सत्य होंगे और न ही उनका सत्यापन ही किया जा सकेगा । सामाजिक शोध में वैज्ञानिक विधियों का सफल प्रयोग किया जाय , इसके लिए यह आवश्यक है कि इसमें वस्तुनिष्ठता को स्थान प्रदान किया जाए ।


    नए अनुसंधानों के लिए ( For new investigations ) - व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन ही नवीन ज्ञान से भरा पड़ा है । जीवन के बारे में जितना ज्ञान प्राप्त किया गया है , वह पर्याप्त नहीं है । जीवन के बारे में प्राप्त ज्ञान का आधार सत्यता और उसकी जाँच है । यदि सामाजिक शोध में वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग करते हुए , उसका वास्तविक अध्ययन किया जाता है , तो उससे नवीन ज्ञान की प्राप्ति तो होती है , इसके साथ ही साथ ऐसी परिकल्पना ( Hypothesis ) भी निर्मित हो जाती है , जो सामाजिक जीवन और घटनाओं से सम्बन्धित होता है । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । इसलिए इन सामाजिक घटनाओं से व्यक्ति का लगाव और पूर्वाग्रह स्वाभाविक होते हैं । समाज की घटनाएँ सामाजिक मूल्यों ( Social values ) और आदर्शों ( Norms ) से सम्बन्धित होती हैं । इन मूल्यों के प्रति व्यक्ति का लगाव उसकी भावनाएँ होती हैं । घटनाएँ गणात्मक प्रकृति ( Qualitative Nature ) की होती हैं । इनका संख्यात्मक अध्ययन ( Quantitative Study ) करना कठिन होता है । भावनात्मक प्रवृत्तियाँ व्यक्ति को बाध्य करती हैं और इस प्रकार वस्तुपरकता की प्राप्ति में बाधा उपस्थिति होती है ।


    नैतिक पक्षपात ( Moral prejudices ) - प्रत्येक व्यक्ति के कुछ अपने नैतिक मूल्य होते हैं । ये नैतिक मूल्य व्यक्ति के जीवन और कार्यों के साथ घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित होते हैं । व्यक्ति इन मूल्यों की रक्षा करता है तथा इनके अनुकूल आचरण करता है । इतना ही नहीं , जो व्यक्ति इन नैतिक मूल्यों की उपेक्षा करता है , उसके बारे में विरोधी दृष्टिकोण को जन्म देते हैं । यदि कोई ऐसा तथ्य है , जो नैतिक मूल्यों से मेल नहीं खाता है , तो व्यक्ति उस ओर उदासीन दृष्टिकोण अपना लेता है । ऐसी स्थिति में जो सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं , वे एकांगी होती हैं और वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति में बाधा उपस्थित करती हैं ।


    सामान्य समझ ( General understanding ) - प्रत्येक व्यक्ति का ज्ञान और उसकी समझ सीमित होती है । एक व्यक्ति की समझ और ज्ञान को सामान्य समाज की समझ और ज्ञान नहीं माना जा सकता है । जो तथ्य हमारे सामान्य समझ के अनुकूल होते हैं , उन्हें अपना लिया जाता है और जो तथ्य मेल नहीं खाते हैं , उन्हें गलत मान लिया जाता है । ऐसी स्थिति में वास्तविक तथ्यों की जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती है और जो सामग्री संकलित की जाती है , उसमें वस्तुनिष्ठता का अभाव पाया जाता है ।


    सांस्कृतिक पर्यावरण ( Cultural environment ) - प्रत्येक व्यक्ति का अपना सांस्कृतिक वातावरण होता है । व्यक्ति जिस सांस्कृतिक वातावरण में पलता है उसी के अनुरूप अपने विचार और

  • SOCIAL RESEARCH20:29




    सामाजिक अनुसंधान

    ( SOCIAL RESEARCH )


    ' अनुसंधान शब्द का सामान्य प्रयोग वस्तुतः वैज्ञानिक अनुसंधान के सन्दर्भ में ही किया जाता है । जे . डब्ल्यू . बेस्ट ने ' रिसर्च इन एजकेशन ' में लिखा है कि " विश्लेषण की वैज्ञानिक विधि को अधिक आकारिक , व्यवस्थित एवं गहन रूप में प्रयोग करने को ही अनुसंधान कहा जाता है । " आगे बेस्ट लिखते हैं " एक व्यक्ति बिना अनुसंधान किए वैज्ञानिक हो सकता है परन्तु कोई भी व्यक्ति बिना वैज्ञानिक बने अनुसंधान नहीं कर सकता । " डॉ . सुरेन्द्र सिंह ने लिखा है ' अनुसंधान ' शब्द का व्युत्पत्तीय अर्थ ' बार - बार खोजने ' से सम्बन्धित है । " प्राग्ल भाषा का शब्द Research ( रिसर्च ) भी दो शब्दों से मिलकर बना है जो क्रमश : Re ( री ) एवं Search ( सर्च ) है । अतः प्रनुसंधान का आशय ' बार - बार की खोज ' या ' पुनः की जाने वाली खोज ' है । सामाजिक अनुसंधान एक वैज्ञानिक पद्धति है । इसके द्वारा सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में नवीन ज्ञान की प्राप्ति तथा विद्यमान ज्ञान में संशोधन होता है । घटनाओं के मल तक पहुँचने के लिए कार्य - कारण सम्बन्धों का पता लगाने का प्रयास किया जाता है । अनसंधान के सम्बन्ध में रेड मैन एवं मौरी ने लिखा है , " नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यवस्थित प्रयत्न को हम अनुसंधान कहते हैं । " अनुसंधान में सफलता मिल भी सकती है और नहीं भी मिल सकती । अनुसंधान की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है । इसके द्वारा प्राप्त ज्ञान से जरूरी नहीं है कि कुछ योगदान हो अथवा लाभ मिले । कहने का तात्पर्य यह है कि इससे प्राप्त ज्ञान से योगदान नहीं भी हो सकता है । किन्तु ज्ञान एवं समझ के निरन्तर प्रयास को ही अनुसंधान कहते हैं । मनुष्य आरम्भ से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति का रहा है । अपने आसपास के चीजों के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता है । अनुसंधान का सम्बन्ध वैज्ञानिक खोज से है । शाब्दिक रूप से ' अनुसंधान ' या Research का अर्थ है बार - बार खोज करना । सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में जब व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ढंग से खोज होता है तो उसे सामाजिक अनुसंधान कहते हैं । इसके सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने अपने - अपने विचार प्रकट किये हैं ।



    दि न्यू सेंचुरी डिक्शनरी ' के अनुसार , अनुसंधान का अर्थ किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के विषय में विशेष रूप से सावधानी के साथ खोज करना , तथ्यों अथवा सिद्धान्तों का अन्वेषण करने के लिए विषय सामग्री की निरन्तर सावधानी पूर्ण पूछताछ अथवा पड़ताल करना है ।


    मोजर के अनुसार , " सामाजिक घटनाओं एवं समस्याओं के सम्बन्ध में नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए किये गये व्यवस्थित खोज को सामाजिक अनुसंधान कहते हैं ।


    बोगार्डस ने परिभाषा देते हुए कहा है , " एक साथ रहनेवाले लोगों के जीवन में क्रियाशील अन्तर्निहित प्रक्रियाओं की खोज करना ही सामाजिक अनुसाधन है । "


    पी० वी० यंग ने सामाजिक अनुसंधान की परिभाषा देते हुए लिखा है , " सामाजिक अनुसंधान एक व्यवस्थित पद्धति है , जिसमें नवीन तथ्यों की खोज एवं पुराने तथ्यों की परीक्षा , उनके क्रमों , पारस्परिक सम्बन्धों , कार्य - कारण व्याख्या तथा उन प्राकृतिक नियमों का विश्लेषण करना होता है जिनसे वे संचालित होती हैं । "


    सामाजिक अनुसंधान के उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि यह एक व्यवस्थित पद्धति है जिसके द्वारा नवीन ज्ञान की प्राप्ति , प्राप्त ज्ञान में परिवर्तन एवं तथ्यों का सत्यापन होता है । इसके अन्तर्गत सामाजिक घटनाओं में कार्य - कारण सम्बन्ध , नियमबद्धता तथा पारस्परिक सम्बन्धों का पता लगाया जाता है ।






    सामाजिक अनुसंधान के प्रेरक तत्त्व

    ( Motivating Factors of Social Research )



    श्रीमती यंग ने सामाजिक अनुसंधान के चार प्रेरक तत्त्वों का वर्णन किया है

    ( 1 ) जिज्ञासा ( Curiosity ) — यंग के अनुसार , “ जिज्ञासा मानव मन का मौलिक गुण है तथा मनुष्य के पर्यावरण की खोज के लिए एक बहुत बड़ी चालक शक्ति है । " जबसे मनुष्य जन्म लेता है उसमें जानने की जिज्ञासा स्वाभाविक होती है । जब वह अपने को नवीन वातावरण में पाता है , नई परिस्थितियों से टकराता है और समुचित वातावरण के धेरे में घिरा रहता है तब नई चीज को समझने का प्रयास करता है । यही बात सामाजिक क्रियाओं और अनुसंधान के पीछे भी है ।


    ( 2 ) कार्य - कारण के सम्बन्धों का पता लगाने की इच्छा ( Desire to find out the relationships between cause and effect ) - मनुष्य में कार्य - कारण के सम्बन्ध का पता लगाने की तीव्र इच्छा होती है । समाज में यदि कोई घटना घटित

    होती है तो वह जन कारणों का पता लगाने की कोशिश करता है जिनके फलस्वरूप वह पहावा घटित हुई , उदाहरण के लिए जघन्य अपराध , चोरी , बलात्कार यादि । इन घटनाबों के पीछे कई कारण हो सकते हैं - जैसे चोरी का कारण गरीबी हो सकता है तो अपराधों के वीके सामाजिक वातावरण उत्तरदायी हो सकता है ।


    ( 3 ) नवीन परिस्थितियों का उत्पन्न होना ( The rise of new conditions ) - जीवन में नाना प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा होती है जिनके फलस्वरूप नवीन समस्याएँ खड़ी हो उठती है । एक समाज - शास्त्री इसके विवेचन एवं विश्लेषण में सक्रिय हो जाता है । वह समुदायों , संघों का अध्ययन करता है , उनकी आदतों और रिवाजों का गहराई से विश्लेषण करता है और अन्त में तथ्यों सहित प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है । इस प्रकार नवीन घटनाएँ और परिस्थितियाँ उसके अनुसंधान की पृष्ठभूमि बन जाती है ।


    ( 4 ) नवीन प्रणालियों की खोज तथा प्राचीन प्रणालियों को परीक्षा ( The discovery of new methods and the examination of old methods ) - - सामाजिक अनुसंधान के अन्तर्गत खोज के साधनों में बराबर अनुसंधान करने की पावश्यकता होती है । इससे अनुसंधान को अधिक शुद्ध एवं उपयोगी बनाया जा सकता है । ऐसा अनुसंधान मात्र सामाजिक घटनाओं का अनुसंधान न होकर सामाजिक अनुसंधान प्रणालियों का अनुसंधान होता है । इसकी अावश्यकता , समाज में उत्पन्न हुई नवीन समस्यायों और प्राधुनिक यंत्रों तथा साधनों की प्रगति के कारण है ।



    सामाजिक अनुसंधान की आधारभूत मान्यताएँ ( Basic Assumptions of Social Research )


    कार्य - कारण का सम्बन्ध ( Relationship of cause and effect ) सामाजिक अनुसंधान में यह मान कर चला जाता है कि सामाजिक घटनाओं के बीच कार्यकारण का सम्बन्ध है । यदि यह कार्य - कारण का सम्बन्ध स्थापित नहीं होता है तो सामाजिक घटनायों को नहीं समझा जा सकता । उदाहरण के लिए जहाँ । निर्धनता होगी वहाँ अपराध भी होंगे । अतः यदि अपराधों को दूर करना है तो सर्वप्रथम गरीबी को दूर करना होगा । यदि जनसंख्या वृद्धि के कारण अज्ञानता व अशिक्षा है तो लोगों को परिवार नियोजन का ज्ञान करवाना होगा , इसके , महत्त्व को समकाना होगा तभी जनसंख्या वृद्धि पर परिवार नियोजन के तरीकों द्वारा रोक लगाई जा सकेगी ।

    निष्पक्षता की सम्भावना ( Passibility of Impartialits ) - सामाजिक अनुसंधान में अनुसंधान कर्ता और विषय दोनों ही सम्मिलित हैं । किसी विषय का अध्ययन तभी सम्भव है जब अनुसंवानकर्ता निष्पक्ष होकर उसकी जानकारी करे । उसकी स्वयं की भावनाएं , पूर्व धारणाएं तथा व्यक्तिगत विचार अनुसंधान में परिलक्षित नहीं होने चाहिए । प्रायः देखा गया है कि अनुसंधानकर्ता अपने निरीक्षण और लेखन में तटस्थ होता है । वह वस्तुस्थिति का अवलोकन कर उसके विभिन्न पहलुमों की बारीकी से छानबीन कर , निर्णय पर पहुंचने की कोशिश



    सामाजिक घटनामों में क्रमबद्धता ( Sequence in Social Events ) - - सामाजिक घटनाएँ अनायास नहीं घटती हैं । इन घटनामों के पीछे निश्चित नियम माद्धता होती है । यदि उनमें ऐसा कोई क्रम न हो तो हम किसी भी प्रकार उनका पूर्वानुमान नहीं लगा सकते । यह कहना बिलकुल गलत होगा कि प्रत्येक घटना एक दूसरे से सर्वथा स्वतन्त्र और पथक है । जैसे ही क्रम का पता लगता है , हम काफी सही रूप में भविष्यवाणियाँ कर सकते हैं । ।


    आदर्श प्रतिरूपों की सम्भावना ( Possibility of Ideal type ) इसमें सामाजिक तथ्यों को आदर्श प्रति रूपों में बाँटा जा सकता है । इन आदर्श प्रतिरूपों के अन्तर्गत कुछ व्यक्तियों का अध्ययन कर उनकी विशेषताओं को समस्त वर्ग पर लागू किया जा सकता है । यदि हम मजदूर वर्ग , विद्यार्थी वर्ग या स्त्री वर्ग को लें तो हमें इन पृथक् - पृथक् वर्गों में उनकी रुचियों के सम्बन्ध मे , व्यवहार व विचारों के सम्बन्ध में काफी समानता एवं सामंजस्य मिलेगा । इस प्रकार एक औसत मजदूर या स्त्री का अध्ययन समस्त मजदूर समुदाय या स्त्री वर्ग के गुणों का ज्ञान करा सकता है ।


    निदर्शन की सम्भावना ( Possibility of Sample ) - प्रतिनिधित्व पर्ण सेम्पल पद्धति के आधार पर निष्कर्ष समग्र पर लागू किए जा सकते हैं । चूंकि मानव समुदाय विशाल है अतः प्रत्येक व्यक्ति का सूक्ष्म अध्ययन और जानकारी विस्तृत रूप में सम्भव नहीं है । निदर्शन प्रणाली के प्रयोग से अनुसंधान कार्य सुगम एवं शीघ्र हो पाता है ।



    सामाजिक अनुसंधान की प्रक्रिया व चरण

    ( Process or Steps of Sorial Research )


    सामाजिक अनुसन्धान की प्राजिम अचारणात्मक विवेचना इसको प्रकृति एवं प्रकार की विधिवत् व्याख्या के उपरान्त पब हम यह समझने का प्रयास करें कि एक सामाजिक अनुसन्धान को किय पर आयोजित किया जाता है । घनेक व्यक्ति जो अनुसन्धान की अवधारणा से परिनित होते हैं , लेकिन वे वस्तुतः सामाजिक अनुसन्धान की वैज्ञानिक प्रक्रिया से अनभिज्ञ ही होते हैं । अतः तथ्यों के संकलन , वर्गीकरण एवं विश्लेषण के रष्टिकोण से अनुसन्धानकर्ता को अनुसन्धान की प्रक्रिया की सम्पूर्ण जानकारी आवश्यक है । सामाजिक अनुसन्धान की प्रक्रिया अनेक चरास होकर गुजरती है एवं पग - पना विधानों ने इन विभिन्न चरणों का उल्लेख भी अलग - अलग ढंग से किया है ।

    पी . वी . यंग ने सामाजिक अनुसन्धान का प्रक्रिया का प्रमुख चरणों का उस्लेख किया है जो कि निम्नांकित है

    1 . अध्ययन - विषय का निश्चित रूप से सूचीकरण ,

    2 , कार्यकारी उपकल्पना का निर्माण ,

    3 . वैज्ञानिक प्रविधियों से समस्या का अन्वेषण एवं प्रबलोकन ,

    4 . तथ्यों का एकरूपता में पालेखन ,

    5 . पालेखित तथ्यों का श्रेणियों अथवा क्रमों में वर्गीकरण ,

    6 . वैज्ञानिक सामान्यीकरणों का निर्माण ।


    जॉर्ज नुवर्ग ने अपनी प्रमुख कृति ' सोशयल रिसर्च ' में अनुसन्धान की प्रक्रिया कचार चरणों की व्याख्या की जो कि निम्नलिखित


    1 . कार्यकारी उपकल्पना का निर्माण ,

    2 . तथ्यों का अवलोकन एवं संकलन ,

    3 . संकलित तथ्यों का वर्गीकरण एवं संगठन ,

    4 . सामान्यीकरण ।


    गिल बानर ने अपनी कृति ' इनवेस्टीगेशन प्रॉफ बिजनेस प्रोब्लम ' में सामाजिक अनुसन्धान के पांच मूल चरणों का उल्लेख किया है जो कि निम्नांकित है


    1 . समस्या की व्याख्या एवं अनुसन्धान को दिशा प्रदान करने हेतु कार्यकारी उपकल्पना का निर्माण

    , 2 . यथार्थ तथ्यों का संकलन ,

    3 . वर्गीकरण एवं सारणीकरण ,

    4 . निष्कर्ष निकालना ,

    5 . निष्कर्षों की परीक्षा ।



    नाणाणा पार . जी . फ्राँसिस के अनुसार सामाजिक अनुसन्धान के बारह प्रमुख चरण हैं जो कि निम्नलिखित हैं


    1 . समस्या क्षेत्र का चयन ,

    2 . उस अध्ययन क्षेत्र के बारे में नवीनतम सिद्धान्त तथा ज्ञान की जानकारी ,

    3 . समस्या की परिभाषा ,

    4 . प्राक्कल्पनाओं का निर्माण ,

    5 . औपचारिक तर्कों का निर्माण ,

    6 . तथ्यों के स्रोतों का सीमांकन ,

    7 . शोध के उपकरणों ( प्रश्नावली , मापन तथा आलेखन के तरीकों ) का निर्माण ,

    8 . कल्पित तर्कों का लेखन ,

    9 . शोध उपकरणों की पूर्व - जाँच तथा उनमें सम्भावित संशोधन ,

    10 . तथ्यों का व्यवस्थित रूप से संकलन ,

    11 . तथ्यों का विश्लेषण ,

    12 . प्राप्त किए गए निष्कर्षों को लिखना ।



    सामाजिक अनुसधान का विशषताए

    (Characteristics of Social Research )





    1-सामाजिक अनुसंधान एक निरन्तर चलनेवाली प्रक्रिया है । ज्ञान प्राप्त करने के लिए सदैव प्रयास चलता रहता है ।

    -2सामाजिक अनुसंधान की सफलता या असफलता से कोई सम्बन्ध नहीं होता ।

    3-सामाजिक अनुसंधान में वैज्ञानिक उपकरणों , प्रविधियों एवं पद्धतियों का सिर्फ उपयोग ही नहीं होता बल्कि नयी प्रविधियों के विकास पर भी जोर दिया जाता है ।

    4-सामाजिक अनुसंधान एक तरफ विशुद्ध ज्ञान - प्राप्ति पर जोर देता है तो दूसरी तरफ व्यावहारिक हल भी ढूँढने का प्रयास करता है ।

    5-सामाजिक अनुसंधान एक वैज्ञानकि विधि है ।

    6- इसके द्वारा सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में नवीन ज्ञान की प्राप्ति ही नहीं बल्कि प्राप्त ज्ञान का सत्यापन होता है ।

    7- यह विभिन्न सामाजिक घटनाओं या तथ्यों के बीच कार्य - कारण सम्बन्ध स्थापित करता है ।

    8-सामाजिक अनुसंधान के द्वारा उपकल्पना को सत्यापित किया जाता है ।

    9- इससे प्राप्त निष्कर्षों से नियमों अथवा सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता है ।








    सामाजिक अनुसंधान के उद्देश्य

    ( Aims and objectives of Social Research )




    सार्वभौमिक नियमों की खोज - सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य उन नियमों की खोज करना होता है जिनसे सामाजिक जीवन एवं सामजिक घटनाएँ नियमित एवं निर्देशित होती है । सामाजिक घटनाएँ भी स्वाभाविक नियमों पर आश्रित होती है । शोध के द्वारा इन नियमों को जानने का प्रयास होता है ।


    . सिद्धान्तों का विकास - सामाजिक अनुसंधान द्वारा प्राप्त तथ्यों के आधार पर वैज्ञानिक अवधारणाओं एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता है । व्यावहारिक उद्देश्य - इसका सम्बन्ध ज्ञान के उपयोग से होता है । पी . वी . यंग ने इस सन्दर्भ में लिखा है , “ अनुसंधान का तत्कालीन उद्देश्य सामाजिक व्यवहार को नियन्त्रित करना है । " सामाजिक अनुसंधान में ज्ञान प्राप्त करके इनके द्वारा समस्याओं के कारणो का पता लगाया जाता है ताकि उसे समाप्त किया जा सके ।


    व्यावहारिक एवं उपयोगितावादी दृष्टिकोण का तात्पर्य यह नहीं है कि सामाजिक अनुसंधान का सम्बन्ध विभिन्न सामाजिक समस्याओं से होता है । सामाजिक घटनाओं के बारे में ज्ञान - वृद्धि से इन पर नियंत्रण किया जा है या कल्याणकारी लक्ष्य भी प्राप्त किये जा सकते हैं ।

    सामाजिक अनुसंधान के व्यावहारिक एवं उपयोगितावादी उद्देश्य को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है


    समस्याओं का हल - सामाजिक अनुसंधान द्वारा समस्याओं के समाधान में सहायता मिलती है । ज्ञान - वृद्धि एवं कार्य - कारण सम्बन्धों के विश्लेषण से समस्या के हल का रास्ता निकलता है ।


    . सामाजिक विकास - सामाजिक अनुसंधान सामाजिक योजनाओं की रूपरेखा तैयार करता है जिसे सफलतापूर्वक लागू किया जा सके । सामाजिक विकास इस बात पर निर्भर करता है कि लोगों का सक्रिय सहयोग कितना होता है । इन सारी बातों की जानकारी अनुसंधान से प्राप्त होती है ।

    . प्रशासन कार्य में सहायता - मानव सम्बन्धों को बिना जाने प्रशासन कार्य चलाना कठिन होता है । सामाजिक अनुसंधान द्वारा प्रशासन सम्बन्धी विधियों का विकास किया जाता है । इससे प्रशासन के रास्ते में आनेवाली कठिनाइयों का पता चलता है । इस प्रकार सामाजिक अनसंधान प्रशासन कार्य में सहायता देता है ।


    सामाजिक घटनाओं पर नियंत्रण - सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में हमारा ज्ञान बहुत सीमित है । सीमित ज्ञान के आधार पर सामाजिक घटनाओं को नियंत्रित करना मश्किल काम है । अनुसंधान के द्वारा हमारे ज्ञान में • वृद्धि होती है जिससे सामाजिक घटनाओं पर नियंत्रण किया जा सकता है । इस प्रकार सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य सामाजिक घटनाओं पर नियंत्रण प्राप्त करना होता है ।


    . विकल्पों की खोज - सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य सही विकल्पों की खोज करना होता है । किसी भी कार्य को करने तथा समस्या को हल करने के तरीके होते हैं । इन तरीकों से अधिक कुशल और बेहतर तरीके को ढूँढने का काम सामाजिक अनुसंधान के द्वारा होता है । अतः , सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य सत्य विकल्पों की खोज करना है ।


    भविष्यवाणी में सहायक - भविष्यवाणी के द्वारा भविष्य में आनेवाली कठिनाइयों से सामना करना आसान होता है । सामाजिक अनुसंधान के द्वारा भविष्य के बारे में अनुमान किया जा सकता है । परिणामस्वरूप भविष्य में उत्पन्न होनेवाली बाधाओं से समायोजन स्थापित करने में सुविधा होती है ।





    नवीन ज्ञान की प्राप्ति - सामाजिक अनुसंधान का सबसे प्रमुख उद्देश्य सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना है । इसके अन्तर्गत विशुद्ध रूप से सामाजिक जीवन के बारे में नवीन तथ्यों पर प्रकाश डालना तथा सत्य की खोज करना होता है ।


    . सत्यापन एवं पुनः परीक्षण - सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य पुराने तथ्यों का सत्यापन तथा पुन : परीक्षण होता है । अर्थात् पहले से प्राप्त तथ्य वर्तमान स्थिति में ठीक उसी प्रकार हैं अथवा उनमें कोई परिवर्तन हुआ है इसकी जाँच सामाजिक अनुसंधान द्वारा होता है । इससे भ्रांति पैदा करनेवाले धारणाओं से छुटकारा मिलता है ।


    कार्य - कारण सम्बन्ध - सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य विभिन्न घटनाओं के बीच कार्य - कारण सम्बन्ध तथा प्रकार्यात्मक सम्बन्धों की खोज करना है । जब तक इस प्रकार के सम्बन्धों की जानकारी नहीं होती तब तक सामाजिक घटनाओं को नहीं समझा जा सकता ।









    सामाजिक अनुसंधान तथा सर्वेक्षण में अन्तर

    ( Difference between Social Survey and Social Research )


    सामाजिक अनुसंधान और सामाजिक सर्वेक्षण दोनों वैज्ञानिक पद्धति है । दोनों में समानता के साथ - साथ विभिन्नताएँ भी पायी जाती है । पहले दोनों में पायी जानेवाली समानताओं की चर्चा करेंगे ।


    सेमानताएँ ( Similarities ) :

    1 . सामाजिक अनुसंधान तथा सामाजिक सर्वेक्षण दोनों के द्वारा सामाजिक घटनाओं का अध्ययन होता है । दोनों अध्ययन की वैज्ञानिक पद्धति है जिसकी मुख्य विशेषता , अवलोकन , सत्यापन , वस्तनिष्ठता , विश्वसनीयता मक एवं सामान्यीकरण है । 3 . दोनों में नवीन तथ्यों की खोज की जाती है । इससे ज्ञान में वृद्धि होती है । 4 दोनों के द्वारा कार्य - कारण सम्बन्धों को जानने का प्रयास होता है । 5 . दोनों में समान अध्ययन प्रविधि जैसे ; साक्षात्कार , प्रश्नावली , अनुसूची , निदर्शन तथा अवलोकन का उपयोग होता है । 6 . दोनों में पुराने तथ्यों का सत्यापन होता है ।


    विभिन्नताएँ ( Differences )


    सामाजिक अनुसंधान तथा सर्वेक्षण में समान होने के साथ - साथ इनके बीच कुछ अन्तर भी है । कुछ प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं


    - सामाजिक अनुसंधान सैद्धान्तिक विषय पर जोर देता है । इसका सामाजिक सुधार एवं समस्याओं के समाधान एवं कल्याण से प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता । इसके विपरीत सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध सामाजिक समस्या , व्याधिशास्त्रीय परिस्थिति एवं उसके समाधान एवं कल्याण से होता है । इसके अन्तर्गत कारणों का विश्लेषण किया जाता है ताकि उनका समाधान हो सके ।

    - सामाजिक अनुसंधान दीर्घकालीन होता है । इसका सम्बन्ध क्षणिक अथवा वर्तमान समस्याओं से नहीं होता । सामाजिक सर्वेक्षण तत्कालिक होता है । यह समाज के अविलम्ब समस्याओं से सम्बन्धित होता है ।

    - सामाजिक अनुसंधान गहन एवं सूक्ष्म अध्ययन होता है जबकि सामाजिक सर्वेक्षण विस्तृत अध्ययन होता है । सामाजिक सर्वेक्षण में घटना को गहराई से नहीं देखा जाता

    - सामाजिक अनुसंधान से प्राप्त ज्ञान कल्याणकारी हो भी सकता है और नहीं भी इसका उपयोगिता से कोई सम्बन्ध नहीं होता । किन्तु सामाजिक सर्वेक्षण समाज कल्याण से सम्बन्धित होता है ।

    - सामाजिक अनुसंधान व्यक्तिगत रूप से सम्पन्न किये जाते हैं । सामाजिक सर्वेक्षण व्यक्ति के अलावे विभिन्न संगठनों तथा सरकारी विभागों द्वारा भी किया जाता है । कुछ संगठन व्यावसायिक रूप से सर्वेक्षण कार्य करते हैं ।

    - सामाजिक अनुसंधान दलीय कार्य ( Team work ) नहीं है । यह प्राय : व्यक्तिगत रूप से आयोजित किये जाते हैं । किन्तु सामाजिक सर्वेक्षण दलीय कार्य हैं । सामान्यतः यह अध्ययन दल द्वारा आयोजित किये जाते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि सामाजिक सर्वेक्षण सामूहिक एवं सहयोगी प्रयास है ।


    - सामाजिक अनुसंधान का अध्ययन क्षेत्र सामान्य होता है जबकि सर्वेक्षण का सम्बन्ध विशेष क्षेत्र से होता है । अनुसंधान सामान्य अमूर्त एवं सार्वभौमिक अवस्थाओं से सम्बन्धित होता है । दूसरी ओर सर्वेक्षण का सम्बन्ध विशिष्ट व्यक्तियों . स्थानों एवं अवस्थाओं से होता है ।

    - सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य शैक्षणिक एवं सैद्धान्तिक होता है जबकि सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य व्यावहारिक एवं उपयोगितावादी होता है । प्रायः सामाजिक अनुसंधान में नवीन ज्ञान हेतु तथ्य संकलित किये जाते हैं । इनका फायदा या नुकसान से कोई सम्बन्ध नहीं होता । किन्तु सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध व्यावहारिक लक्ष्य से होता है ।

    - सामाजिक अनुसंधान में घटना या समस्या से सम्बन्धित उपकल्पना का निर्माण अवश्य किया जाता है । किन्त सामाजिक सर्वेक्षण में उपकल्पना का निर्माण आवश्यक नहीं होता । इस सन्दर्भ में पार्क का कहना है कि सामाजिक सर्वेक्षण कभी भी उपकल्पना की परीक्षा नहीं करता बल्कि एक विशेष क्षेत्रों में विद्यमान समस्याओं का केवल विवेचना करता है । इस प्रकार दोनों के प्रकृति में अन्तर है ।





    सामाजिक घटनाओं की प्रकृति

    ( Nature of Social Phenomena )



    संसार में अनेक प्रकार की घटनाएँ घटित होती हैं । इन समस्त घटनाओं को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में रखा जा सकता है - प्राकृतिक घटनाएँ ( Natural Phenomena ) तथा सामाजिक घटनाएँ ( Social Phenomena ) । प्राकृतिक घटनाओं का नियन्त्रण प्रकृति के हाथों में रहता है । प्राकृतिक घटनाएँ भौतिक और स्थूत प्रकृति की होती हैं । इनका निरीक्षण और परीक्षण वैज्ञानिक पद्धति से किया जा सकता है । प्राकृतिक घटनाओं के विपरीत जो घटनाएँ होती हैं , वे सामाजिक घटनाएँ कहलाती हैं । इन घटनाओं का सम्बन्ध मानव से है और इन घटनाओं का कारण भी मानव ही है । मानवीय व्यवहार को नियन्त्रित करने में मनुष्य को अभी तक पूर्ण सफलता नहीं मिली है । समाजशास्त्री मानवीय व्यवहार को स्वयं भी समझ नहीं पाता है । इसीलिए समाजशास्त्री प्राकृतिक घटनाओं की तरह वैज्ञानिक पद्धति से सामाजिक घटनाओं का निरीक्षण - परीक्षण करके भविष्यवाणी करने में पूरी तरह से असमर्थ हैं । समाज का निरन्तर विकास व प्रगति हो रही है । लोगों की जीवन शैली और आचार - विचार बदल रहे हैं । साथ ही साथ सामाजिक घटनाओं में भी वृद्धि हो रही है । आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि सामाजिक घटना पर वैज्ञानिक पद्धति को कैसे लागू किया जाए और इन पर इस पद्धति का कैसे प्रयोग किया जाए । इस मौलिक समस्या के अध्ययन के लिए हमें सामाजिक घटनाओं की प्रकति तथा इसके प्रकारों का आलोचनात्मक विवेचन करना होगा । यहाँ यह जानना आवश्यक है कि सामाजिक घटना की प्रकृति क्या है ? इसकी कौन - कौन सी विशेषताएँ हैं ?


    कुछ विद्वानों का कथन है कि सामाजिक घटनाओं की अनोखी प्रकृति समाज - विज्ञान या समाजशास्त्र के लिए यथार्थ विज्ञान के रूप में विकसित होने के रास्ते में एक बहुत बड़ी बाधा है । इसका कारण यह है कि सामाजिक घटनाओं में पाई जाने वाली जटिलता , परिवर्तनशीलता , व्यक्तिनिष्ठता ( subjectivity ) आदि इसमें बाधक हैं । इन्हें लाँघना वैज्ञानिक पद्धति के लिए सम्भव नहीं होता । इसीलिए समाजशास्त्र के लिए यह भी सम्भव नहीं है कि वह यथार्थ सामाजिक नियमों का प्रतिपादन करे । इन भ्रान्त - धारणाओं के मुख्य स्रोत ( sources ) मुख्यतया दो हैं । पहला - सामाजिक घटनाओं की प्रकृति को तोड़ - मोड़कर देखने और उसकी प्रकृति पर नियन्त्रण पाने के सम्बन्ध में विज्ञान की शक्ति को न समझने की प्रवृत्ति ; और दूसरा - वैज्ञानिक नियम की वास्तविक प्रकृति को गलत समझना । सामाजिक घटनाओं में जटिलता , विविधता , व्यक्तिनिष्ठता आदि विशेषताएँ हैं , पर ये कोई ऐसी अड़चनें नहीं हैं कि जिन्हें विज्ञान कभी लाँघ ही नहीं सकता हो । समाज - विज्ञान एक प्रगतिशील विज्ञान है और अपनी प्रगति के साथ - साथ अड़चनों को दूर करना उसके लिए सरल होता जा रहा है । उसी प्रकार यह कहना भी गलत है कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति की विचित्रता के कारण यथार्थ वैज्ञानिक नियमों का प्रतिपादन सम्भव नहीं है । इस प्रकार की भ्रान्ति इस कारण होती है कि लोग वैज्ञानिक नियम की यथार्थ प्रकृति को ही नहीं समझते हैं । अक्सर सिद्धान्त और नियम को एक मानने की गलती हम कर बैठते हैं । वैज्ञानिक नियम के अर्थ के सम्बन्ध में एक और गलत धारणा यह है कि वैज्ञानिक नियम समस्त अवस्थाओं में ( under all conditions ) अनियन्त्रित व्यवहार का एक यथार्थ कथन ( an exact statement ) है । पर वास्तव में वैज्ञानिक नियम इस प्रकार का कुछ भी नहीं है । वैज्ञानिक नियम केवल यह बताता है कि कोई घटना वर्णित अवस्थाओं में ( under stated conditions ) किस प्रकार का व्यवहार करती है । सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध में भी इस प्रकार का कथन या नियम सम्भव है । अतः स्पष्ट है कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति और वैज्ञानिक अध्ययन व नियम के बीच इस प्रकार का कोई सह - सम्बन्ध नहीं है कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति का विशिष्टताएँ वैज्ञानिक अध्ययन या वैज्ञानिक नियमों के प्रतिपादन में अनुल्लंघनीय बाधा की सृष्टि करती हैं या कर सकती हैं । इस विषय को और भी स्पष्ट रूप से समझना लिए सामाजिक घटनाओं की प्रकृति की विशेषताओं पर ध्यान देना होगा ।








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    सामाजिक सर्वेक्षण

    ( SOCIAL SURVEY )


    सामाजिक सर्वेक्षण एक वैज्ञानिक विधि है । इसके द्वारा सामाजिक घटनाओं का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है । सबसे पहले ली प्ले ( Le Plav ) और उसके साथियों ने सामाजिक सर्वेक्षण विधि का उपयोग किया । इनके पहले भी सर्वेक्षण विधि का उपयोग हुआ था किन्तु उनमें वैषयिकता एवं वैज्ञानिकता का अभाव था । किन्तु सामाजिक सर्वेक्षण के प्रमाण काफी प्राचीन काल से प्राप्त होते हैं । सामाजिक सर्वेक्षण विधि को आरम्भ में जोन होबार्ड , फ्रेडरिक ली प्ले , चार्ल्स बूथ , राउन्ट्री तथा बोबले से बहुत सहायता मिली है । जॉन होवार्ड ( 1726 - 1799 ) ने इंगलैंड की जेल व्यवस्था का सर्वेक्षण किया । फ्रेडरिक ली प्ले ( 1806 - 1882 ) ने 19वीं शताब्दी के मध्य में फ्रांस में आय - व्ययक ( budgets ) का अध्ययन किया । इस सर्वेक्षण में ली प्ले का मुख्य उद्देश्य यूरोप के श्रमिक वर्गों का उनके आय - व्ययक के आधार पर विभिन्न आय स्तर के अनुसार जीवन स्तर का निर्धारण करना था । एंजिल ने भी ली प्ले के समान परिवार के आय - व्ययक का अध्ययन किया । चार्ल्स बूथ ( 1840 - 1916 ) ने सर्वेक्षण द्वारा लन्दन की निर्धनता का सूक्ष्म और क्रमबद्ध अध्ययन करके ' दी लाइफ एण्ड लेबर ऑफ दी पीपुल ऑफ लंदन ' में प्रकाशित किया । इसी सन्दर्भ में राउन्ट्री ने निर्धनता का सर्वेक्षण करके अपनी पुस्तक ' पोवर्टी ' में प्रकाशित किया । बाँवले ने 1912 ई० में इसी प्रकार का अध्ययन करके अपनी पुस्तक ' लाइवीहूड एण्ड पोवर्टी ' में प्रकाशित किया । हस्ट का सर्वेक्षण , औद्योगिक नगरों का तुलनात्मक अध्ययन भी उल्लेखनीय है । इंगलैंड और फ्रांस के समान अमेरिका में भी सर्वेक्षण आन्दोलन हुआ । जेकब रीज ने 1890 में न्यूयार्क की गन्दी बस्तियों का सर्वेक्षण किया । लिंकन स्टिफेन्स ( 1904 ) ने भी औद्योगिक नगरों में पूँजीपतियों एवं मजदूरों का सर्वेक्षण किया । पॉल केलोग ने ( 1909 ) में पिट्सबर्ग नगर का अध्ययन किया । इसमें उन्होंने अन्तरानुशासनीय विधि का प्रयोग किया । ईटन और हैसीसन ने अमेरिका में किये गये सर्वेक्षणों की सूची तैयार कर प्रकाशित किया । यह सामाजिक सर्वेक्षण आन्दोलन के दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुआ । शिकागो विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग द्वारा सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया । अमेरिका में सामाजिक सर्वेक्षण आन्दोलन 1930 ई० में अपने चरमोत्कर्ष पर था । वहाँ आज भी सर्वेक्षण द्वारा अध्ययन हो रहे हैं । प्राचीन भारत में भी सर्वेक्षण के प्रमाण मिलते हैं । कौटिल्य , अकबर तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के द्वारा किये गये अध्ययनों का उल्लेख प्राप्त हुए हैं । कौटिल्य तथा अकबर के समय के सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण तथा ईस्ट इन्डिया कम्पनी द्वारा ' गजेटियर्स ' तैयार करवाया गया था । भारत में आज भी अनेक नगरों एवं क्षेत्रों का सामाजिक सर्वेक्षण हो रहा है । सरकार द्वारा किया गया जनगणना रिपोर्ट सामाजिक सर्वेक्षण का बढिया उदाहरण है । इसके अतिरिक्त विभिन्न संस्थाओं एवं एजेन्सियों द्वारा विभिन्न विषयों एवं घटनाओं से सम्बन्धित सर्वेक्षण होते रहते हैं । उदाहरणस्वरूप ' National Institute of Sample Survey ' , बैंकों , विश्वविद्यालयों तथा विभिन्न Research Institute द्वारा सर्वेक्षण किया जाता है । सामाजिक सर्वेक्षण का अर्थ एवं परिभाषा A ( Meaning and Definition of Social Survey ) सर्वेक्षण शब्द अंग्रेजी भाषा के ' Survey ' शब्द का हिन्दी रूपान्तर है । Survey शब्द दो विभिन्न स्थानों के शब्दों को मिलाकर बना है । पहला शब्द ' sur ' की उत्पत्ति फ्रेंच भाषा से हुई है और दूसरा शब्द ' veeir ' लैटिन भाषा से लिया गया है । दोनों का क्रमश : अर्थ ' ऊपर ' तथा ' देखना ' है । इस प्रकार curvey का मालिक अर्थ ' ऊपर देखना ' । ( to look over ) है । '

    डिक्शनरी ऑफ सोशियोलोजी ' के अनसार " एक जीवन या उसके किसी एक पक्ष के सम्बन्ध में व्यवस्थित और पूर्ण तथ्य संकलन और तथ्य विश्लेषण का नाम ही सर्वेक्षण के सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त तथ्यों के आधार पर सामान्यीकरण किये जाते हैं . उसके बाद सामान्य एवं वैज्ञानिक नियमों का प्रतिपादन किया जाता है । वेबस्टर शब्दकोष के अनुसार " वास्तविक सचना प्राप्त करने के लि किया लसनामक अवलोकन ही सामाजिक सर्वेक्षण है । " सामाजिक सर्वेक्षण के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने अपने - अपने शब्दों में परिभाषा दिया है । कुछ प्रमुख विद्वानों के विचार इस प्रकार हैं

    हैरिसन ( Harrison ) के अनुसार , " सामाजिक सर्वेक्षण एक सहकारी प्रयत्न है जिसके अन्तर्गत किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में पायी जानेवाली सामाजिक दशाओं तथा समस्याओं के अध्ययन और विश्लेषण के लिए वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है । ।


    मोर्स ( H . N . Morse ) ने लिखा है , " संक्षेप में सामाजिक सर्वेक्षण वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित विश्लेषण की एक पद्धति है जिसके द्वारा निश्चित एवं सुपरिभाषित उद्देश्यों के अनुरूप किसी सामाजिक घटना , समस्या अथवा जनसंख्या का अध्ययन किया जाता है ।


    बोगार्डस ( Bogardus ) ने सर्वेक्षण की परिभाषा देते हुए लिखा है , " विस्तृत अर्थ में , सामाजिक सर्वेक्षण का तात्पर्य किसी विशेष समुदाय के लोगों के जीवन और कार्य की दशाओं से सम्बद्ध तथ्यों का संकलन करना है । " म अब्रामस ( Abrams ) के अनुसार , “ एक सामाजिक सर्वेक्षण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक समुदाय की संरचना एवं क्रियाओं के सामाजिक पक्ष के बारे में ऋणात्मक तथ्य एकत्रित किये जाते हैं । "


    बर्गेस ( Burgess ) के अनुसार " एक समुदाय का सर्वेक्षण सामाजिक विकास की रचनात्मक योजना प्रस्तुत करने के उद्देश्य से किया गया इसकी दशाओं एवं आवश्यकताओं का अध्ययन है । "


    पी . वी . यंग ( P . V . Young ) ने सामाजिक सर्वेक्षण का बहुत ही लम्बा एवं स्पष्ट परिभाषा देते हुए लिखा है , " सामाजिक सर्वेक्षण किसी सामाजिक व्याधिशास्त्रीय प्रकृति की वर्तमान अथवा तात्कालिक दशाओं , जिनकी निश्चित भौगोलिक सीमाएँ एवं निश्चित सामाजिक अर्थ तथा सामाजिक महत्व है , के सुधार एवं उन्नति हेतु एक रचनात्मक कार्यक्रम के निमाण से सम्बन्धित है । " इस परिभाषा से तीन बातें स्पष्ट होती हैं जिनका सम्बन्ध सामाजिक सर्वेक्षण से है । पहला , सामाजिक सर्वेक्षण निश्चित भौगोलिक सीमा में अध्ययन से सम्बन्धित है । दूसरा , सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध महत्वपूर्ण सामाजिक व्याधिशास्त्रीय समस्याओं से है । तीसरा , सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध समस्याओं के समाधान एवं सामाजिक सुधार के लिए रचनात्मक कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने से है । इन सारी बातों से प्रतीत होता है कि सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक व्याधिशास्त्रीय समस्याओं के अध्ययन एवं उनके समाधान तथा सुधार से अधिक सम्बन्धित है । 1 .


    उपर्युक्त सभी परिभाषाओं में सामाजिक घटना या सामाजिक समस्या का उल्लेख किया गया है किन्तु सभा सामाजिक घटना या समस्या को सामाजिक सर्वेक्षण के अध्ययन का विषय नहीं बनाया जा सकता । केवल व ही घटनाएँ या सामाजिक समस्याएँ सामाजिक सर्वेक्षण की विषय - वस्तु बन सकती हैं जो भौगोलिक रूप से सीमित अथवा निश्चित है जिससे अध्ययनकर्ता स्वयं क्षेत्र में जाकर सम्बन्धित तथ्यों को संकलित कर सके । इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक अध्ययन की एक वैज्ञानिक पद्धति है जिसके अन्तर्गत एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में किसी समस्या से सम्बन्धित तथ्यों का बिना पक्षपात के संकलन होता है तथा तथ्यों के आधार पर ऐसे निष्कर्ष निकाले जाते हैं जिनकी सहायता से सामाजिक विकास तथा जन - कल्याण कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू किया जा सके । -












    सामाजिक सर्वेक्षण की विशेषताएँ

    ( Characteristics of Social Survey )


    सामाजिक सर्वेक्षण के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों द्वारा दिये गये परिभाषाओं के विश्लेषण से कुछ विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं । ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं


    1.. समस्याओं का अध्ययन एवं उपचार ( Study and Solution of the Problems , ॥ स्त्राय समस्याओं का अध्ययन होता है । इसके अन्तर्गत सिर्फ समस्याओं का अध्ययन ही नहीं उपचार का रूपरेखा तैयार करता है । समस्याओं के अध्ययन के द्वारा उसके कारणों को जानने का प्रयास किया जाता है ताकि उनके उपचार व सधार के लिए योजनाएँ बनाने में सुविधा हो । बगस बताया कि सर्वेक्षण से प्राप्त निष्कर्षों द्वारा समस्या के समाधान तथा सधार के लिए सुझाव दिया जाता हा अर्थात् सर्वेक्षण समस्या के अध्ययन से ही नहीं बल्कि उसके सुधार से भी सम्बन्धित होता है ।


    .2. परिमाणात्मक अध्ययन ( Ouantitative Study ) सामाजिक सर्वेक्षण एक परिमाणात्मक अध्ययन है । इसके द्वारा जो तथ्य संकलित किये जाते हैं उन्हें परिमाणात्मक रूप में प्रकट किया जाता है । सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा गुणात्मक तथ्य संकलित होते हैं किन्तु इसके अन्तर्गत संख्यात्मक तथ्यों को एकत्रित करने का प्रयास किया जाता है । वर्तमान समय में सामाजिक सर्वेक्षण एवं अनुसंधानों में सांख्यिकीय विधियों एवं सांख्यिकी का प्रयोग दिनों - दिन बढ़ता ही जा रहा है । कहने का अभिप्राय यह है कि आँकडे विभिन्न प्रकार से संकलित किये जाते हैं किन्तु निष्कर्ष सांख्यिकी के रूप में प्रस्तुत होता है ।


    3. तुलनात्मक अध्ययन ( Comparative Study ) - सामाजिक सर्वेक्षण एक प्रकार का तुलनात्मक अध्ययन है । वर्तमान समय में तुलनात्मक अध्ययन करना सामाजिक सर्वेक्षण की महत्वपूर्ण विशेषता बन गई । सामाजिक सर्वेक्षण में पर्यावरण के साथ सामाजिक समस्याओं एवं दशाओं का सम्बन्ध जोड़ा जाता है । तुलनात्मक अध्ययन का उद्देश्य किसी समस्या अथवा घटना का दूसरे तथ्यों की तुलना में जानकारी प्राप्त करना होता है ।

    4.. सामाजिक जागरूकता ( Social Awareness ) - सामाजिक सर्वेक्षण के अन्तर्गत सिर्फ सम्बन्धित तथ्यों का संकलन ही नहीं बल्कि उनके सम्बन्ध में जागरूकता पैदा करना होता है । सामाजिक घटनाओं अथवा समस्याओं की उचित व सही जानकारी से तथ्यों का प्रचार - प्रसार होता है । इससे इनके प्रति लोगों में जागरूकता उत्पन्न होती है और जनसहयोग भी मिलता है ।


    5.. सामाजिक सर्वेक्षण एक वैज्ञानिक पद्धति सामाजिक सर्वेक्षण की विशेषताएँ है ( Social Survey is a scientific method ) वास्तव में सामाजिक सर्वेक्षण एक वैज्ञानिक पद्धति है सामाजिक सर्वेक्षण एक वैज्ञानिक विशेषता है । जिसके द्वारा किसी विशेष सामाजिक परिस्थिति , समस्या अथवा समूह का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है ।


    6. सामान्य सामाजिक घटनाओं का अध्ययन सामाजिक सर्वेक्षण एक वस्तुनिष्ठ ( Study of General socials अध्ययन है । इसमें पक्षपात एवं पूर्वाग्रह से बचने का हर संभव प्रयास किया जाता है । प्रश्नावली , साक्षात्कार , निश्चित भौगोलिक क्षेत्र अनुसूची आदि विधियों के द्वारा अध्ययनकर्ता तथ्य संकलित करता है । इन तथ्यों के आधार पर विभिन्न

    सहकारी - प्रक्रिया घटनाओं के बारे में कार्य - कारण सम्बन्धों का पता लगाया जाता है । प्राप्त निष्कर्षों से सामान्यीकरण

    समस्याओं का अध्ययन एवं उपचार किया जाता है तथा नियमों व सिद्धान्तों का प्रतिपादन भी होता है । अर्थात् सामाजिक सर्वेक्षण में वैज्ञानिक विधि के विभिन्न चरणों द्वारा क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है । सामाजिक सर्वेक्षण के अन्तर्गत सामान्य सामाजिक घटनाओं का अध्ययन किया जाता है । अर्थात् यह किसी वैयक्तिक घटना का अध्ययन नहीं करता । सामाजिक सर्वेक्षण सामान्य सामाजिक घटनाओं , जीवन दशाओं , समस्याओं , उनके कारणों इत्यादि का अध्ययन करता है ताकि सामाजिक जीवन एवं सामाजिक घटनाओं को सही रूप में जान सके ।


    .7. निश्चित भौगोलिक क्षेत्र ( Definite Geographical Area ) सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में निवास करनेवाले समूह अथवा समुदाय से होता है । सामाजिक सर्वेक्षण के अन्तर्गत केवल उन्हीं सामाजिक घटनाओं अथवा समस्याओं का अध्ययन किया जाता है जो भौगोलिक रूप से सीमित होती है । सर्वेक्षण के लिए एक विशेष गाँव , नगर अथवा क्षेत्र को चुना जाता है ताकि अध्ययन वैज्ञानिक विधि द्वारा किया जा सके । इस सन्दर्भ में हैरिसन ने कहा है , " सम्पूर्ण समाज को सामाजिक सर्वेक्षण का विषय - वस्तु नहीं बनाया जा सकता । बल्कि वैसी समस्याएँ एवं घटनाएं का विषय - वस्तु बनाया जा सकता है जो भौगोलिक रूप से सीमित एवं निश्चित सामाजिक सर्वेक्षण एक सहकारी प्रक्रिया है ।


    8.सहकारी प्रक्रिया ( Aco - operative undertaking ) सामाजिक सवक्षण एक आमतौर पर सामाजिक सर्वेक्षण का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत एवं व्यापक होता है । इस पर का क्षत्र बहुत ही विस्तृत एवं व्यापक होता है । इस स्थिति में एक व्यक्ति द्वारा काम करना सम्भव नहीं होता । इसके लिए एक दल की आवश्यकता होती है । विभिन्न विषया कवि अध्ययनकर्ता का समूह बनाते हैं और अध्ययन - कार्य को सम्पन्न करते हैं । इस दृष्टिकोण से सामाजिक को एक सहकारी प्रयत्न कहा जाता है । सामाजिक सर्वेक्षण में आजकल अन्तरानशासनीय विधि का प्रयोग ज्यादा हो रहा है । विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शकाण स तथ्य संकलित करते हैं और अन्त में एक साथ मिलकर सामान्य निष्कर्ष देते हैं ।


















    सामाजिक सर्वेक्षण के उद्देश्य

    ( Aims and Objectives of Social Survey )


    सामाजिक सर्वेक्षण के कुछ प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं



    1 . कार्य - कारण सम्बन्ध ( Cause and Effectrelationship ) विभिन्न सामाजिक घटनाओं एवं परिस्थितियों के बीच कार्य - कारण सम्बन्ध स्थापित करना होता है । वैज्ञानिक मान्यता है कि प्रत्येक घटना के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है । कोई भी घटना आकस्मिक रूप से घटित नहीं होती । इनके पीछे कोई न कोई नियम और क्रमबद्धताका हाथ होता है । सामाजिक सर्वेक्षण के द्वारा इनके कारणों एवं प्रभावों को जानने का प्रयास किया जाता है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सामाजिक सर्वेक्षण में सामाजिक घटनाओं में कार्य - कारण सम्बन्ध की खोज की जाती है ।


    2.. उपकल्पना का निर्माण एवं परीक्षण ( Formulation and Testing of Hypothesis ) - सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य उपकल्पना का निर्माण तथा उसका परीक्षण करना भी होता है । सामाजिक सर्वेक्षण से प्राप्त वास्तविक तथ्यों के आधार पर उपकल्पनाओं का निर्माण किया जाता है तथा पुनः सर्वेक्षण के द्वारा उसका सत्यापन भी होता है । किन्तु ऐसा हमेशा नहीं होता कुछ सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य सिर्फ अध्ययनकर्ता की उपकल्पनाओं का परीक्षण करना मात्र होता है । इस प्रकार के सर्वेक्षण अनुसंधान के महत्वपूर्ण अंग बन जाते हैं । यही कारण है कि सर्वेक्षण को अनुसंधान की एक पद्धति कहकर पुकारा जाता है । उपकल्पनाओं के निर्माण एवं सत्यापन के सम्बन्ध में मोजर ने कहा है , " सर्वेक्षण की उपयोगिता दुहरी होती है - उपकल्पनाओं का निर्माण तथा आगे जाकर उनका परीक्षण । "


    3.. सामाजिक सिद्धान्तों का सत्यापन ( Verification of Social Theories ) सामाजिक घटनाओं की प्रकृति परिवर्तनशील होती है । इन घटनाओं की प्रकृति में परिवर्तन होने से सिद्धान्तों में भी परिवर्तन की सम्भावना होती है । सामाजिक सर्वेक्षण के द्वारा यह जानने का प्रयास किया जाता है कि पूर्व में किया गया अध्ययन आज के परिस्थिति में कहाँ तक सही है । प्रविधियों एवं उपकरणों में भी परिवर्तन होता रहता है । इन प्रविधियों एवं कयों पयोगिता के मूल्यांकन - सम्बन्धी भी सर्वेक्षण होते हैं । इस प्रकार सामाजिक सर्वेक्षण सामजिक विकास एवं ज्ञान का प्रमुख आधार माना जाता है ।


    4.सामाजिक पक्षों से सम्बन्धित तथ्य संकलन ( Collection of data related to social aspect ) सामाजिक सर्वेक्षण का प्रमुख उद्देश्य समाज के किसी विशेष घटना , समस्या और परम्परा से सम्बन्धित तथ्यों का संकलन करना है । तथ्यों का संकलन किसी संस्था द्वारा स्वयं अपने लिए किया जाता है अथवा यह कार्य किसी सरा व्यक्ति अथवा संगठन के लिए भी किया जाता है । आजकल ऐसे संगठनों की संख्या बढ़ रही है जो दसरों श्रण का काम करते हैं । आमतौर पर ऐसे सर्वेक्षण गैर - सरकारी संस्थाओं द्वारा किये जाते हैं । सरकारी क्षेत्र में जनगणना सर्वेक्षण विस्तृत सूचनाएँ प्राप्त करने का प्रयास करता है । कहने का सरकारी एवं गैर - सरकारी दोनों क्षेत्रों में किये जाते है । इस सन्दर्भ में मोजर ने लिखा है , " अधिकांश सर्वक्षण का उद्देश्य सूचना का संकलन है । " ।


    5. सामाजिक समस्याओं का अध्ययन ( Study of Social Problems याओं का अध्ययन करना होता है । ए० एफ वेल्स के अनुसार सामाजिक सर्वेक्षण का गाटाय की समस्याओं एवं श्रमिक वर्ग की गरीबी से है । चूंकि गरीब लोगों में ही प्रमख । संबन्ध मुख्य रूप से समुदाय की समस्याओं एवं श्रमिक नगी लेती हैं जैसे गरीबी , बेरोजगारी , अपराध , बाल - अपराध , अशिक्षा इत्यादि । इन्हीं OK सामाजिक समस्याएँ जन्म लेती हैं जैसे गरीबी , बेरोजगारी अपराध समस्याओं से सामाजिक सर्वेक्षण का सम्बन्ध होता है । इस प्रकार की सभी समस्याओं में घनिष्ठ सम्बन्धमा जाता है । उदाहरणस्वरूप जहाँ बेकारी हैं वहाँ गरीबी है । जहाँ गरीबी है वहाँ अपराध एवं बाल अपराध का समस्या है । इसलिए सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य निर्धन एवं श्रमिक वर्ग की समस्याओं का अध्ययन करना होता है ।


    6.. सामाजिक समस्याओं का समाधान ( Solution of Social Problems ) - - सामाजिक सर्वेक्षण का । उद्देश्य सिर्फ सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करना ही नहीं बल्कि उसका समाधान ढूँढना भी होता है । इस दृष्टिकोण से सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य व्यावहारिक सामाजिक सर्वेक्षण के उद्देश्य अथवा उपयोगितावादी होता है । के अन्तर्गत सामाजिक घटना अथवा समस्या के विषय में जानकारी हासिल कर उसका उपयोग समस्या के समाधान में किया जाता है । यहाँ यह aspect ) जानना जरूरी है कि सर्वेक्षणकर्ता सामाजिक सामाजिक समस्याओं का अध्ययन नियोजनकर्ता नहीं होता । उसका काम सिर्फ सर्वेक्षण ( Study of social problems ) द्वारा प्राप्त तथ्यों को प्रस्तुत करना होता है । इन तथ्यों सामाजिक समस्याओं का समाधान के आधार पर समाजसुधारक , नियोजनकर्ता एवं नीति निर्माता समस्या के समाधान के लिए कार्यक्रम ( Solution of social problems ) तैयार करते हैं । पी०वी० यंग तथा बर्गेस ने भी

    सामाजिक सर्वेक्षण के सुधारात्मक एवं रचनात्मक उद्देश्य पर ज्यादा जोर दिया है । 5 . उपकल्पनाओं का निर्माण एवं परीक्षण







    सामाजिक सर्वेक्षण की उपयोगिता अथवा महत्व

    ( Utility or Importance of Social Survey )



    1 . समस्याओं का समाधान एवं पुनर्निर्माण ( Solution of problems and social re - organiza tion ) - सामाजिक सर्वेक्षण के द्वारा सामाजिक समस्याओं के कारणों का पता लगाकर समाधान के लिए कार्यक्रम तैयार किये जाते हैं । इन कार्यक्रमों के द्वारा समाज के व्याधिकीय समस्या को दर करके समाज के पनर्निर्माण का कार्य होता है । सामाजिक सर्वेक्षण समस्याओं के समाधान के लिए रचनात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं जिनके उपयोग से समाज की बुराइयों के खत्म किया जाता है ।


    2 . सरल विधि ( Simple Method ) सामाजिक सर्वेक्षण वैज्ञानिक अध्ययन की सबसे सरल विधि है इसके प्रयोग के लिए अध्ययनकर्ता के विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती । इसके द्वारा विशाल अध्ययन क्षेत्र का बडे ही सरलता से अध्ययन किया जा सकता है । अध्ययनकर्ता स्वयं या अपने दल के साथ अध्ययन कार्य को सम्पन्न करता है । सामाजिक सर्वेक्षण की उपयोगिता समाज को संगठित एवं संतुलित रखने में भी है । समाज में व्याप्त समस्याओं का हल ढूँढकर समाज को विघटित होने से बचाया जाता है । व्यापारिक संस्थाएँ भी बाजार का सर्वेक्षण करवाती है । श्रमिक की समस्याओं को हल करने के लिए चुनाव में लोगों के मनोवति इत्यादि को जानने के सम्बन्ध में भी पाकिते हैं ।

    भारत क सन्दर्भ म सामाजिक सर्वक्षण की उपयोगिता और अधिक है । यहाँ समाज में बहुत तरह की गम्भार समस्याएँ हैं । इन समस्याओं के प्रति लोग जागरूक नहीं हैं । सर्वेक्षण से प्राप्त निष्कर्षों के द्वारा लोगों में जागरूकता लाया जा सकता है । अर्द्धविकसित एवं विकासशील देशों में सर्वेक्षण करके लोगों को जानकारी दी जाती है तथा उन्हें नियोजित परिवर्तन के लिए तैयार किया जाता है । भारत जैसे विशाल देश में विभिन्न धर्म , भाषा , विश्वास तथा संस्कृति के लोग एक साथ रहते हैं । सामाजिक सर्वेक्षण इन विभिन्न वर्गों का अध्ययन करके उन्हें विकास का समुचित अवसर प्रदान करते हैं । इस प्रकार सामाजिक सर्वेक्षण का महत्व दिनों - दिन बढ़ता जा रहा है । सामाजिक सर्वेक्षण एक महत्वपूर्ण विधि है । सामाजिक घटनाओं के अध्ययन में इसकी उपयोगिता को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है


    3.समस्या से प्रत्यक्ष सम्बन्ध ( Direct rela tion to the Problem ) - सर्वेक्षण के अन्तर्गत सामाजिक सर्वेक्षण की उपयोगिता एवं महत्व अध्ययनकर्ता व्यक्तिगत एवं सीधे सम्पर्क के द्वार तथ्य संकलन करता है । परिणामस्वरूप इससे प्राप्त निष्कर्ष अधिक विश्वसनीय , वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ होते हैं ।


    4 . वस्तुनिष्ठ अध्ययन ( Objective study) - सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा यथार्थ तथ्यों को संकलित किया जाता है । तथ्य संकलन के समय व्यक्तिगत पक्षपात एवं पूर्वाग्रह को यथासम्भव दूर करने का प्रयास होता है । वस्तुनिष्ठता के लिएअध्ययनकर्ता , तटस्थ होकर अध्ययन करने का प्रयास करता है ।


    5.. उपकल्पना के निर्माण में सहायक ( Help ful in the formulation of hypothesis ) सामाजिक सर्वेक्षण से जो जानकारी प्राप्त होती है) उनके आधार पर उपकल्पनाओं का निर्माण होता हैं । 16 . सरल विधि सामाजिक सर्वेक्षण से प्राप्त तथ्यों के आधार पर जिनउपकल्पनाओं का निर्माण होता है वे अधिक व्यावहारिक होती है । इसके अन्तर्गत सिर्फ उपकल्पनाओं का निर्माण ही नहीं होता बल्कि उनका सत्यापन भी होता है ।


    6. वैज्ञानिकता ( Scientific Accuracy ) - सामाजिक सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिक विधियों , यन्त्रों एवं नियमों का प्रयोग किया जाता है । परिणामस्वरूप इसके द्वारा एकत्र किये गये तथ्य अत्यधिक यथार्थ होते हैं । इनके आधार पर निकाले गये निष्कर्ष भी वैज्ञानिक होते हैं ।








    सामाजिक सर्वेक्षण की सीमाएँ

    ( Limitations of Social Survey )


    : सामाजिक सर्वेक्षण एक उपयोगी विधि है किन्तु इसकी सीमाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता । यहाँ कुछ प्रमुख सीमाओं का उल्लेख निम्नलिखित हैं –


    1. खर्चीली प्रणाली ( Expensive method ) सामाजिक सर्वेक्षण में समय , शक्ति एवं धन का काफी खर्च उठाना पड़ता है । सर्वेक्षण को कई चरणों से गुजरना पड़ता है तथा सर्वेक्षण कई वर्षों तक चलता है । समय के पैसों सच भी सहना पड़ता है । सर्वेक्षण में सम्बन्धित लोगों के वेतन , यात्रा तथा अन्य चीजों विध अति बार राशि के अभाव में सर्वेक्षण का कार्य बीच में ही बन्द हो जाता है ।


    2. सामान्यीकरण का अभाव ( Lack of Generalization ) सामाजिक सर्वेक्षण बिखरे एवं असम्बद्ध होते हैं । इसका प्रयोग किसी विषय की प्रारम्भिक जानकारी के लिए किया जाता है । आमतौर पर सर्वेक्षण किसी तात्कालिक समस्या के निराकरण - से सम्बन्धित होता है । परिणामस्वरूप इनके आधार पर सिद्धान्तों का निर्माण करना सम्भव नहीं होता ।


    3 . प्रशिक्षित लोगों की कमी ( Lack of Trained Persons ) - प्रायः सर्वेक्षण बड़े पैमाने पर आयोजित होते हैं । इसके लिए अनेक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है । इनके प्रशिक्षण एवं आपसी तालमेल में कठिनाइयाँ उत्पन्न होती है । अधिकांश कार्यकर्ता अध्ययन कार्य में सिर्फ औपचारिकता निर्वाह करते हैं उनमें अध्ययन के प्रति निष्ठा एवं निष्पक्षता का अभाव पाया जाता है । ऐसी स्थिति में सर्वेक्षण के लिए प्रशिक्षित एवं अनुभवी कार्यकर्ताओं को इकट्ठा रखना कठिन कार्य बन जाता है ।


    4. सीमित क्षेत्र ( Limited Scope ) सामाजिक सर्वेक्षण का अध्ययन क्षेत्र सीमित होता है । यह सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों का अध्ययन नहीं करता । इनके द्वारा ऐसी घटनाओं का अध्ययन नहीं किया जाता जो बहुपक्षीय हों । ऐसी घटनाएँ जिनमें तेजी से परिवर्तन होता है उनका भी सर्वेक्षण करना कठिन होता है । प्राय : सामाजिक सर्वेक्षण 3 . विश्वसनीयता में कमी द्वारा घटना के एक पक्ष का अध्ययन किया जाता है ।


    5 . गरीबी से सम्बन्धित ( Related to Pov सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा प्रायः गरीब लोगों से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन किया जाता । इसका अर्थ यह नहीं है कि सर्वेक्षण मध्यम एवंउच्च वर्ग के लोगों का अध्ययन नहीं करता । किन्तु इसका उपयोग अधिकतर निम्न वर्गों की दशाओं के अध्ययन में होता है ।


    6 . विश्वसनीयता में कमी ( Lack of Reliabil) सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त निष्कर्ष हमेशा 8 . प्रशिक्षित लोगों की कमी विश्वसनीय नहीं होता । एकत्रित तथ्य में पक्षपात एवं पूर्वाग्रह की सम्भावना बनी रहती है । उत्तरदाता भी बहुत सी सूचनाएँ गलत देते हैं । परिणामस्वरूप प्राप्त निष्कर्ष अवैज्ञानिक एवं दोषपर्ण हो जाते हैं ।

    3

    7 . वर्तमान अध्ययन तक सीमित ( Limited to Immediate Problems ) - सामाजिक सर्वेक्षण सिर्फ वर्तमान घटनाओं के अध्ययन तक सीमित होता है । इसके द्वारा दूरस्थ सामाजिक समस्याओं का अध्ययन नहीं किया जा सकता । इससे प्राप्त निष्कर्ष सभी स्थानों एवं समयों के लिए उपयोगी सिद्ध नहीं होते ।


    8 . गहन अध्ययन के योग्य नहीं ( Not fit for intensive study ) - - सामाजिक सर्वेक्षण के द्वारा गहन एवं सक्ष्म अध्ययन नहीं किया जा सकता । इसके द्वारा प्राप्त सूचनाएँ सतही होते हैं । परिणामस्वरूव सूक्ष्म विश्लेषण सम्भव नहीं हो पाता । इसका उपयोग प्रायः विस्तृत अध्ययनों में किया जाता है ।






    समाजशास्त्र में क्षेत्र - कार्य

    ( Field work in Sociology )


    समाजशास्त्रीय अध्ययनों में क्षेत्र कार्य का विशेष महत्त्व है । अधिकांश समाजशास्त्री इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि जिक घटनाओं के अध्ययन के लिए क्षेत्र - कार्य का उपयोग विशेष रूप में किए जाते हैं । क्षेत्र - कार्य के आधार पर किए वाले सामाजिक अध्ययन को आनुभविक अध्ययन कहते हैं । यह अध्ययन व्यावहारिक समाजशास्त्र ( Applied Biology ) का आधार हा व्यावहारिक समाजशास्त्र वह है जिसका उद्देश्य समहों व समदायों के जीवन से उपयोगी एकत्रित कर उसके आधार पर सामाजिक जीवन को अधिक स्वस्थ बनाए रखना है । - कार्य का अभिप्राय उन अध्ययनों से है जो अध्ययनकर्ता द्वारा अध्ययन विषय से सम्बन्धित व्यक्तियों से प्राथमिक सचनाएँ एकत्र कर किया जाता है । सूचनाओं का एकत्रीकरण एक व्यवस्थित विधि - अवलोकन व साक्षात्कार आदि के माध्यम से किया जाता है । इसके द्वारा सामाजिक घटनाओं के घटित होने के कारणों और परिणामों को ज्ञात किया जाता है । इस प्रकार समाज विज्ञानों में क्षेत्र - कार्य प्रयोग ( Experiment ) का विकल्प है ।

    थोमस एवं जैननिकी ( Thomas and Znaniecki ) ने सर्वप्रथम पौलैण्ड के किसानों का अध्ययन क्षेत्र - कार्य के द्वारा या । इसीलिए थामस एवं जैननिकी को क्षेत्र - कार्य पर आधारित अध्ययन का सूत्रधार माना जाता है । आज सामाजिक जीवन से सम्बन्धित अनेक विषय हैं - जनसंख्या , नगर व ग्राम से जुड़ी समस्याएँ , अपराध व शिक्षा आदि हैं जिनके सन्दर्भ में विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित सूचनाएँ क्षेत्र - कार्य द्वारा प्राप्त किए जाते हैं । क्षेत्र - कार्य की प्रकृति को निम्न रूप में समझा जा सकता है

    1 . क्षेत्र - कार्य के माध्यम से व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होते हैं ।

    2 . किसी समूह व समुदाय के व्यक्तियों के विचारों को क्षेत्र कार्य के माध्यम से ही जाना जा सकता है ।

    3 . क्षेत्र कार्य वह विधि है जिसके माध्यम से सामाजिक घटनाओं के कारणों व परिणामों की विवेचना सम्भव है ।

    4 . क्षेत्र - कार्य का आधार अध्ययन की निगमन विधि है ।

    5 . क्षेत्र - कार्य के माध्यम से किसी तथ्य का सांख्यिकीय विवेचन सम्भव है ।

    6 . क्षेत्र - कार्य ऐतिहासिक अध्ययन में विश्वास नहीं करता ।

    7 . क्षेत्र - कार्य के अन्तर्गत किसी समूह के जीवन को वर्तमान में प्राप्त होने वाले तथ्यों के आधार पर ही समझा जा सकता है ।

    8 . क्षेत्र - कार्य की मान्यता है कि सामाजिक घटनाएँ परिवर्तनशील होती हैं ।




    क्षेत्र कार्य के प्रकार

    ( Types of Field Work )


    क्षेत्र कार्य को दो मुख्य भागों में बाँटा जाता है — क्रियात्मक क्षेत्र कार्य व बोधपूर्ण क्षेत्र - कार्य । इसे निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है

    ( 1 ) क्रियात्मक क्षेत्र - कार्य ( Sematic Field Work ) : क्रियात्मक क्षेत्र कार्य का अभिप्राय विभिन्न सामाजिक घर के कारणों व परिमाणों को समझने से होता है । इसकी सहायता से विभिन्न समस्याओं को समझकर उसके निदान के पास मिल पाते हैं । यह इस मान्यता पर आधारित है कि जब तक हम किसी समूह के लोगों की क्रियाओं व व्यवहारों वास्तविक अर्थ को न समझ लें , तब तक उस समूह के वास्तविक व्यवहारों की विवेचना नहीं की जा सकती ।

    ( 2 ) बोधपूर्ण क्षेत्र - कार्य ( Epistemic Field Work ) : जब ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य से सामाजिक घटनाओं से सम्बन्धित तथ्यों के लिए क्षेत्र - कार्य किए जाते हैं , तब उसे बोधपूर्ण क्षेत्र - कार्य कहा जाता है । यह क्षेत्र - कार्य इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्यक्ष अनुभव के बिना सामाजिक घटनाओं की व्याख्या सम्भव नहीं है ।




    समाजशास्त्र में क्षेत्र - कार्य का महत्त्व

    ( Importance of Field Work in Sociology )


    सामाजशास्त्रीय अध्ययनों में क्षेत्र - कार्य एक उपयोगी विधि है । अधिकांश समाजशास्त्रीय ज्ञान क्षेत्र - कार्य से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है । सामाजिक घटनाओं व परिवर्तन का ज्ञान , सामाजिक नीतियों व सामाजिक नियोजन का निर्धारण , ग्रामीण व नगरीय अध्ययनों , तथ्यों का सत्यापन व वैज्ञानिक अनुसंधान आदि में क्षेत्र - कार्य की भूमिका विशेष रही है । समाजशास्त्र में क्षेत्र - कार्य के महत्त्व को निम्नांकित रूप में समझा जा सकता है

    ( 1 ) सामाजिक समस्याओं का ज्ञान ( Knowledge of Social Problems ) : क्षेत्र - कार्य के माध्यम से सामाजिक समस्याओं की वास्तविक प्रकृति , उनके कारणों व परिणामों को समझा जा सकता है । भारत में व्याप्त घरेलू हिंसा , अन्तर - पीढी संघर्ष , स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार व जातिवाद आदि जैसी समस्याओं की सही जानकारी क्षेत्र - कार्य से मिल सकती है । इसी के आधार पर समस्याओं का निराकरण सम्भव हो सकता है ।

    ( 2 ) सामाजिक परिवर्तन की जानकारी ( Understanding of Social Change ) : परिवर्तन एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है । क्षेत्र - कार्य के माध्यम से इन परिवर्तनों की सही जानकारी मिल पाती है । भारत में एम . एन . श्रीनिवास ( M . N . Srinivas ) ए

  • TYPES OF SAMPLING9:39

Requirements

  • Basic knowledge of Social science.

Description

प्रिय मित्रों


यह कोर्स कॉलेज और यूनिवर्सिटी के छात्रों बीए/एमए/यूजीसी नेट/आईएएस, पीसीएस के लिए बहुत ही आसान शब्दों में बताया गया है जो नए छात्रों को समझने में आसान होगा,


सामाजिक अनुसंधान  की अवधारणा जिज्ञासु पाठकों को विभिन्न सिद्धांतों, कार्यों, प्रभावों, कारकों और विभिन्न प्रक्रियाओं से अच्छी तरह परिचित कराना है। इन सिद्धांतों और प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से समझाने के लिए, आवश्यकतानुसार उपयुक्त उदाहरण भी दिए गए हैं। इस तरह भाषा और शैली को अपनाया गया। यह है कि विषय का प्रारंभिक ज्ञान अवधारणा से छात्रों तक पहुंच सकता है। मुख्य ध्यान रखा गया है कि छात्र विषय वस्तु को ठीक से समझ सकें। छात्रों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विषय को सरल भाषा में दिया गया है।


अंत में, परीक्षा प्रश्न MCQ दिए गए हैं।


प्रस्तुत पाठ्यक्रम न केवल विश्वविद्यालय स्तर के पाठकों के लिए बल्कि संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) और विभिन्न राज्यों के लोक सेवा आयोग (पीसीएस) के छात्रों के लिए भी उपयोगी होगा, मेरा मानना ​​है। यह प्रयास किस हद तक सफल होता है, यह तय है कि पाठक उनके हाथ में हैं। इसे और बेहतर बनाने के लिए आपके सुझावों का स्वागत है। इस पाठ्यक्रम में निम्नलिखित बिंदुओं को अच्छी तरह से समझाया गया है।


बीए/एमए/नेट के कॉलेज के छात्रों के लिए उपयोगी, समझने में आसान तरीके से चर्चा किए गए सभी विषयों से संबंधित सामाजिक विचार की बुनियादी अवधारणाएं।


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इन सिद्धांतों और प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से समझाने के उद्देश्य से आवश्यकतानुसार उपयुक्त उदाहरण भी दिए गए हैं।


Who this course is for:

  • This course is for all academic and competetive exam is like graduate students , master students and those who want to prepare for ugc net and ias , pcs etc.