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श्री पतञ्जलि के योग सूत्रों का परिचय
2 students

श्री पतञ्जलि के योग सूत्रों का परिचय

श्री पतञ्जलि के योग-सूत्र / योगदर्शन पढ़ने से पहले उसका मूल परिचय जानें।
Last updated 9/2024
Hindi

What you'll learn

  • श्रीपतञ्जलि के योगदर्शन का अध्ययन आरंभ करने से पहले उसकी विषयवस्तु जानने के लिए उसका परिचय जानना चाहिए ।
  • जब परिचय हो जाए तो योगसूत्रों का गहराई से अध्ययन कर सकते हैं ।
  • शब्द - 'योग' का उच्चारण करने का सही तरीका ।
  • शब्द - 'योग' की व्युत्पत्ति ।
  • योग के इतिहास का परिचय ।
  • योग की परिभाषाएँ ।
  • योग के विभिन्न प्रकार ।

Course content

10 sections • 14 lectures • 41m total length
  • Introduction - शब्द ‘योग’ का सही उच्चारण2:53
  • Lecture 02 शब्द ‘पातंजलयोगदर्शन’ का सही उच्चारण1:48

Requirements

  • पहले से योग के बारे में ज्ञान की आवश्यकता नहीं है ।
  • आप यहां आरंभ से योग के बारे में सीखेंगे ।

Description

श्री पतञ्जलि के योग सूत्रों का परिचय
श्री पातंजल-योग-दर्शन का अध्ययन आरंभ करने से पहले उसकी विषय वस्तु जानने के लिए उसका परिचय जानना चाहिए । जब परिचय हो जाए तो योगसूत्रों का गहराई से अध्ययन कर सकते हैं ।
इस पाठ्यक्रम को पढ़ने के बाद आप ऋषि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित योगदर्शन को समझ पाएंगे । इसे ऋषि पतंजलि के योग-दर्शन या योग-सूत्र के रूप में जाना जाता है ।

योग का उद्देश्य चित्त, मन की अशुद्धियों को दूर करना है । ऋषि पतंजलि, जो योग को सूत्रबद्ध करने वाले पहले व्यक्ति थे, ने मन को शांत करने के लिए आठ चरण बनाए । ये आठ चरण क्रमबद्ध रूप से मन की अशुद्धियों को धोते हैं, उसे उत्तरोत्तर शुद्ध एवं स्वच्छ बनाते हैं। योग का लक्ष्य संसार परे जाकर स्वयं की ओर जाना है ।

'योग' शब्द के और भी कई अर्थ हैं । योग का अर्थ है जोड़, नियति, संयोग । योग का अर्थ पथ, संबंध या विषय भी है; जैसे, श्रीमद्भगवद्गीता के अध्यायों के नाम; बारहवें अध्याय का नाम भक्तियोग है, पन्द्रहवें का नाम पुरूषोत्तमयोग है । संदर्भ के आधार पर विभिन्न दर्शन 'योग' शब्द के विभिन्न अर्थ लागू करते हैं ।
योग उतना ही पुराना है जितनी मानव जाति । योग के बीज हमें वेदों और उपनिषदों में मिलते हैं। कोई योगी क्यों बनता है? ज्ञान की खोज के कारण. बाहरी दुनिया का नहीं बल्कि स्वयं का ज्ञान। योग अभ्यास वैदिक और यहां तक ​​कि पूर्व-वैदिक काल में भी शुरू हुआ । उनमें वास्तविकता को देखने की ललक थी । इस एहसास के कारण कि कुछ ऐसा प्रकट हो रहा है जो अस्थायी है और उससे परे कुछ स्थायी है । यद्यपि चलायमान संसार दिखाई देता है लेकिन एक अचल आधार है जिसे महसूस किया जाना चाहिए । और इसे जानने के लिए हमें अंदर की ओर मुड़ना होगा, जो योग में दिया गया है ।
कई ग्रंथ योग को अपने-अपने तरीके से परिभाषित करते हैं । श्रीमद्-भगवद्-गीता के अनुसार योग की कुछ परिभाषाएँ हैं - योग 'संतुलन बनाए रखना' और 'कार्य में निपुणता' है, गीता भी योग को 'दुःखसंयोगवियोग’ के रूप में परिभाषित करती है, और यह ऋषि पतंजलि के योग के बहुत करीब आता है ।

Who this course is for:

  • योग के विद्यार्थियों के लिए
  • भारतीय दर्शन के विद्यार्थियों के लिए
  • जो योग के लिए एकदम नये हैं और सीखना चाहते हैं